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2019 may
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चाहत बोलती तस्वीर
चाहत बोलती तस्वीर चाहत तू आना आधी रात को जब चांद चमकता होऔ रजनीगंधा रातरानी फूल महकता होजो सारा जग सोया हुआ औ आसमां भी सोयातू ऐसे में आना सनम अरमान तड़पता हो। यूं सुनसानी रातों में जुगनू चमचमा रहा हैमैं मर ना जाऊं हाय जब दिल जोर
सम्भाल पैबंद
सम्भाल पैबंद सम्भाल ठेले पर बिकते छोटे बड़े झुमके खरीदने का बहुत शौक था मुझेवैसे ही जैसेकिराने की दुकान पर मिलने वाले लोगों से बतियाने का विदेश में ना तो ठेले लगते हैना ही किराने की दुकानें मिलती हैं पुरानी झुम
दोस्ती के क्षण
दोस्ती के क्षण दोस्ती में कुछ है जो क्षणभंगुर है जिस तरह से यह शुरू होती हैजैसे क्षण वह लाती है जिस अंतरिक्ष में वह होती हैऐसा लगता है कि दोस्ती हमेशा चल रही है हमेशा बदल रही है या जैसे-तैसे दौड़ रही है लेकिन दोस्ती कभी प
अट्ठानवे प्रतिशत
अट्ठानवे प्रतिशत आज मुझे अट्ठानवे प्रतिशत मिले और यह अच्छा महसूस करवाता है ऐसा महसूस होता है जैसे कुछगर्व करने लायक है यह मुझे मान्यता देता है। काश मैं बता सकतीकि मैंने यही उम्मीद किया थालेकिन मैं नहीं कह सकतीकाश मै
विवादों में रहकर निर्विवाद
विवादों में रहकर निर्विवाद श्रद्धेय नामवर सिंह (93 वर्ष) के निधन से हिन्दी साहित्य जगत ने एक ऐसा महान सृजनशील साहित्यकार खो दिया है जो हिन्दी साहित्य के सृजन और मार्गदर्शन मूलक समीक्षा के प्रति बेहद समर्पित व्यक्तित्व था। कुछ लेखक जो भी नया करते हैं, विवादों में रहते हैं या
हिन्दी आलोचना के डिक्टेटर नामवर सिंह
हिन्दी आलोचना के डिक्टेटर नामवर सिंह नामवर सिंह असाधारण प्रतिभा संपन्न आलोचक थे। असाधारण इसलिए कि उनकी पुस्तक "बकलम खुद" 1951 में छपी जब वे सिर्फ 24 साल के थे। "हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग" 1952 में छपी जब वे 25 साल के थे, "आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँँ" 1954 में छपी जब वे 2
किसका सत्य ही जयते?
किसका सत्य ही जयते? आज बात एक किस्से, एक लोककथा से शुरू करना चाहता हूँ : एक राजा था। उसके सिर पर सींग थे जिन्हें वह अपने बालों, ताज और मुकुट से पीछे छुपाए रहता था। लेकिन जिन पंथों में शरीर का एक भी बाल काटने, कटाने, तोड़ने और रंगने को धर्म-विरुद्ध माना जाता है उनके अन
भाषाओं का परिवारवाद और हिंदी
भाषाओं का परिवारवाद और हिंदी हिंदी, भारत की राजभाषा है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 50 करोड़ है। एक बड़ा तबका इसे राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देता है। यह भी तथ्य है कि भारत के बाहर अनेक देशों में हिन्दी का उपयोग होता है और नये संचार माध्यमों के आने के बाद यह तेजी से अहिन्
नीलाभ अश्क निरंकुश बवाल, जी का जंजाल
नीलाभ अश्क निरंकुश बवाल, जी का जंजाल नीलाभ के बारे में कुछ लिखना, मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ डालने के समान है। आ बैल, मुझे मार। मेरी हिम्मत की भी दाद देनी पड़ेगी।मैं नीलाभ के बारे में क्या जानती हूँ? मुझे नहीं ध्यान कि मैं नीलाभ से कभी मिली होऊं। वे जब अपने दिल्ली के किस्से बय
विदेशी कलेवर में भारतीयता
विदेशी कलेवर में भारतीयता यूरोप प्रवास (पोलैंड) में हिंदी भाषा और साहित्य को नए सिरे से देखने का अवसर मिला है। यह देख पढ़कर आश्वस्ति का भाव प्रगाढ़ हुआ है कि हिंदी की भाषायी और साहित्यिक ताकत समाज में प्रभावी स्थान बनाए हुए है। विशेषकर सुदूर सात समुद्र पार से प्रवासी साहित्य
मसूरी प्रशिक्षणका आरंभ और मेरा बिहारी अख्खडपन तीसरी किस्त
मसूरी प्रशिक्षणका आरंभ और मेरा बिहारी अख्खडपन तीसरी किस्त तेरह जुलाईको मसूरी अकादमी पहुंचनेवाले प्रशिक्षणार्थियोंमें मैं और राजी बिलकुल शुरुआती थे। रिसेप्शनपर पहले कमरा बताया गया और कहा गया कि सामान रखवाकर, आरामसे 1 बजेके बाद आना - कई कागजात भरवाने हैं। यहीं मुलाकात होती है अगमचंदसे - अगले वर्ष तकका हमार
गांधी का पुनर्पाठ
गांधी का पुनर्पाठ पहला सवाल यह उठता है कि गांधीजी को "सत्याग्रह" की जरूरत क्यों पड़ी? दूसरा सवाल यह कि क्या मौजूदा दौर में "सत्याग्रह" प्रासंगिक है? क्या सत्याग्रह का मौजूदा दौर में मानवाधिकारों की रक्षा और विस्तार के संघर्ष के साथ कोई संबंध है। गांधीजी के "सत्याग्र
बेटे से एक मुलाकात (कहानी का एक अंश) रूसी से हिंदी अनुवाद - किरण सिंह वर्मा
बेटे से एक मुलाकात (कहानी का एक अंश) रूसी से हिंदी अनुवाद - किरण सिंह वर्मा बूढ़ा चोरदोन कुछ अजीब से असमंजस में घर लौटा था। किसी वजह से वह या तो बहुत ज्यादा परेशान था या बहुत उदास और दुखी था। उसकी पत्नी तुरंत ही समझ गई थी कि कुछ न कुछ ज़रूर हुआ है। और जब उसे वस्तुस्थिति का पता चला, स्तब्ध रह गई। फिर उसे समझ नहीं आया कि क्या
साहित्य, राजनीति और समाज
साहित्य, राजनीति और समाज उन्नीस सौ छत्तीस ईसवी से पहले भारत के हिंदी साहित्य के परिदृश्य को राजनीति से संचालित नहीं माना जाता था। 1883 ईसवी से जब भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि कवियों के नेतृत्व में हिंदी खड़ी बोली ने नयी चाल में ढलना शुरू किया तब से खड़ी बोली और उसमें रचा जा रहा
किताबों का बोझ कम करने के नाम पर
किताबों का बोझ कम करने के नाम पर इतिहास की किताब का बोझ कम करने की दिशा में एनसीईआरटी ने दसवीं की कक्षा के इतिहास की किताब से तीन पाठ हटा दिए हैं। पहले यह पुस्तक 200 पेज की थी। अब 72 पेज हटा दिए गए हैं। पाठ्यपुस्तकों का बोझ कुछ तो कम हुआ ही होगा। गौरतलब हो कि 2017 में भी एनसीईआरट
लेखक के निर्माण की प्रक्रिया पर दृष्टि
लेखक के निर्माण की प्रक्रिया पर दृष्टि रावसाहेब कसबे मराठी के बहुत बड़े विचारक-लेखक हैं, उनका समग्र साहित्य हिंदी अनुवाद में संवाद से प्रकाशित हो रहा है। दो पुस्तकें पहले छप चुकी हैं -- आंबेडकर और माक्र्स, मनुष्य और धर्मचिंतन। चार किताबें जनवरी, 2019 में प्रकाशित हो गई हैं। भारत में साम
जागृति खबरदार!
जागृति खबरदार! जागृति दरवाजे पर पीठ टिका कर खड़ी थी। उसके बाएं हाथ में स्टील का एक चमचा था और दायें हाथ में मीट काटने वाला चाकू और वह एकदम सीधा कहीं घूर रही थी। वह एक हिंदू देवी की तरह तैयार खड़ी थी, घरेलू हथियारों से लैस और मार्शल-आर्ट का अभ्यास सा करती हुई। उसकी
ड्यूक विश्वविद्यालय में व्यापार की पढ़ाई
ड्यूक विश्वविद्यालय में व्यापार की पढ़ाई हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल और वार्टन के बारे में सभी लोग जानते हैं लेकिन बहुत से लोग अभी भी ड्यूक विश्वविद्यालय से परिचित नहीं है।ड्यूक अमेरिका का एक बहुत प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है। ड्यूक हर बार देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक माना
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