ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2019 mar
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अंतद्र्वंद
अंतद्र्वंद फिर से वो ही आग जलेगीफिर से वो पानी बरसेगाबबली का दिल रो रोकर फिर से पापा को तरसेगा।माँ के सूखी छाती भी सोचे मुन्ना कैसा होगाशायद निंदा करते नेता के मन में जिंदा होगा। फिर से आंगन में टूटी चूड़ी के
कैसा सफ़र राह देख रही हूँ
कैसा सफ़र राह देख रही हूँ कैसा सफ़र माचिस की तीली-सा जीवन जला बुझाजो दिखलाती थी ख़्वाब उन रातों का क्या हुआज़िंदगी ने मुझे डाला किस उलझन मेंन दौड़ ख़त्म हुई न जीत ही सकाअपनी मर्जी से किस्मत कैसे लिखवातेएक अधूरापन मेरा हम सफर
वरदान
 वरदान दुखी दिख रहे थे पंडित जी, हुयी दोस्त को चिंता भारीउसने कहा कहो पंडितजी, तुम्हे हो गयी क्या बीमारी?पंडित जी ने कहा कि मेरी पत्नी से हो गयी लड़ाईपूरे हफ्ते कुछ न बोलने की उसने सौगंध उठाई। कहा दोस्त ने कठिन नहीं कुछ, शपथ श्रीम
सुसंस्कार की कठिन डगर पर...
सुसंस्कार की कठिन डगर पर... भारतीय संस्कृति की चर्चा हम सब आए दिन सुनते रहते हैं। कभी मंचों से, तो कभी चाय-वार्ताओं में या घरों की बैठक में। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि हममें से अधिकांश यह नहीं जानते कि हमारी संस्कृति क्या है। इस अज्ञान के पीछे, हमारी सोच की जड़ों में बैठा वह न
काल-चेतना और साहित्य
काल-चेतना और साहित्य पश्चिम की दुनिया में परम्परा के प्रति तीव्र असंतोष के अपने ऐतिहासिक कारण हैं परंतु भारत की स्थिति भिन्न है। अंग्रेज़ी राज एक विजयी संस्कृति को व्यक्त करता था, अंग्रेज़ी शिक्षा ने हमारे मनोभाव को बदला, हम पिछड़े देश, विकासशील देश और
समय माँगेगा सवालों के जवाब
समय माँगेगा सवालों के जवाब पंकज चतुर्वेदी, जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दों पर खोजी पत्रकारिता का सुस्थापित नाम है। वे स्वयं विज्ञान के छात्र रहे हैं, शिक्षा अभियान से जुड़े हुये हैं, बुंदेलखण्ड की मिट्टी से जुड़े हुये हैं अतः प्रकृति से जुड़े समसामयिक ज्वलंत विषयों पर उनकी गहरी
जीवन संघर्ष की गाथा
जीवन संघर्ष की गाथा उसके जीवन में दो जीवन रहते हैं, एक विवाह से पहले का और एक विवाह के बाद का। बहुत मुश्किल होता है कि वह विवाह के बाद इन दोनों धाराओं में एक साथ रहकर जी सके। नए को अपनाने में पुराना बहुत कुछ छूट जाता है। उपन्यास "बंद मुट्ठी" पूर्ण
हिंदी के "नामवर" यानी हिंदी के प्रकाश स्तम्भ
हिंदी के यह हिंदी के प्रतिमानों की विदाई का त्रासद समय है। सोलह महीनों के छोटे से अंतराल में कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, कृष्णा सोबती और अब नामवर सिंह के निधन से जो जगहें खाली हुई हैं वे हमेशा खाली ही रहेंगी। इनमें से कई लोग नब्बे वर्ष के परिप
भगवान बुद्ध का देश सिक्किम
भगवान बुद्ध का देश सिक्किम इन पंक्तियों को गुनगुनाती हुई मैं अपने ड्रीम टूरिज्म हॉट स्पॉट की तलाश में भारत के नक्शे में सुदूर उत्तर से दूर दक्षिण तक और सुदूर पूर्व से पश्चिम तक "बकोध्यानम" की भांति दृष्टि लगाए हुई थी कि मेरी नजर पश्चिम बंगाल के ऊपर मुकुट की भांति चमकते हुए
यारों का यार, बड़ा दिलदार
यारों का यार, बड़ा दिलदार वे दिल्ली में उसी कॉलोनी में रहते थे, जहाँ मैं रहती थी। उन्होंने बहुत चाहा कि मैं भी उनकी भीड़ का हिस्सा बनूँ, शायद इसलिए कि उनके इर्द-गिर्द जो भी लोग थे, वे उन्हें कम लगते थे। उनके चौखटे में हर कोई फ़िट हो सकता था। लेकिन तब तक मैं
होली कूल-कूल
होली कूल-कूल दिसम्बर की कड़कड़ाती ठंड में घने कोहरे के बीच होली ने पैग़ाम भिजवाया। इस बार मैं मार्च में नहीं जनवरी में आऊँगी। यह सुनकर ऐसा लगा जैसे रजाई में बैठे-बैठे ही बारिश हो गई हो, लेकिन क्या किया जा सकता था। होली को तो आना ही था अब उसकी मर्ज़ी जब आए। होली मे
प्रशासक और नेता 30 वर्षोंकी बात
प्रशासक और नेता 30 वर्षोंकी बात वर्ष 1978। एक नया नया आईएएस अधिकारी। असिस्टंट कलेक्टरकी पोÏस्टग, उत्साही युवा मन। अच्छा काम करनेको उत्सुक। कोई गलत काम नही करूँगा, चाहे जितना भी दबाव हो, वगैरह विचारोंसे उत्साहित। एक दिन एक एमएलए से झड़प हो गई। एमएलए ने कहा यह काम मेरे आदमियों
दोहे फागुन के
दोहे फागुन के मुरली तौरी बांस की, फिर भी अति इतरातबांस के जंगल काट दूं तो निपटंू तौसे नाथ होठ भले प्रभु तौरे हो उनमें मेरी मिठासतीन लोक का क्या करूं तुम न मौरे पास कहां देवर की फब्तियां कहां भौजी की गारएसएमएस से मना रहे होली का त
भारत मेरे सपनों का देश
भारत मेरे सपनों का देश 11 फरवरी, 1947 को भारत के मुम्बई महानगर में जन्मी डॉ. कुलसुम बशर मजूमदार वहीं पली-बढ़ी और वहीं उन्होंने शिक्षा ग्रहण की है। विवाह के बाद वे बांग्लादेश आ गईं, लेकिन आज भी भारत में बीते दिनों को वे अपना स्वर्णिमकाल मानती हैं। ढाका विश्वविद्यालय से उर
इंसानी बिरादरी का ख़्वाब
इंसानी बिरादरी का ख़्वाब जब भी दुनिया में छोटे-बड़े संघर्ष और जंग होती है तब एक सुर सुनाई देता है कि लड़ने से पहले बातचीत कर लो। संवाद से ही रास्ता निकलेगा। क्योंकि यह दुनिया ही ऐसी है कि इसमें बहुत दिनों तक दुश्मनी स्थायी रह ही नहीं सकती। दोस्ती की तरफ हाथ बढ़ाये बिना ये दु
नवाचारों की राह पर हिंदी
नवाचारों की राह पर हिंदी आज प्रसार माध्यमों का महासंगम मोबाइल और इंटरनेट के जरिए हो रहा है। पत्रकारिता, साहित्य, कविता, ज्ञान-विज्ञान, शोध, दर्शन के क्षेत्रों में पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तकें पिं्रट और डिजिटल रूप में साथ-साथ बढ़ रही हैं। टेलीविज़न, फिल्म और संगीत
फिसल-फिसल जाता है रेशम
फिसल-फिसल जाता है रेशम फिर अपनी ही एक पंक्ति से बात प्रारंभ करने की धृष्टता के लिए क्षमा। पंक्ति है : फिसल-फिसल जाता है रेशम तन-मन छूती खादी देना। पता नहीं, मनुष्य ने जब पहले-पहल तन ढांपना शुरू किया था तब वह लज्जावश था या ठिठुरन के कारण लेकिन ऊन, रेश
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