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2019 jun
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कार्यस्थल पर गांधी
कार्यस्थल पर गांधी "जब मैं निराश होता हूं, और मनन करता हूं तो पाता हूं कि इतिहास में अंततः सत्य और प्रेम की विजय होती है।" गांधी के इस सूत्र को सत्य मान लेने का लाभ है कि बदलाव की संभावना और आशावादिता बनी रहती है। आज के दौर में राजनीति, समाज, शिक्
गाँधी और उनके आलोचक
गाँधी और उनके आलोचक गाँधी, दुनिया के उन बिरले लोगों में हैं जिन पर सबसे ज्यादा जीवनियाँ लिखी गयी हैं। एक अनुमान के अनुसार करीब दो सौ जिनमें आधे से ज्यादा दुनियाभर के प्रतिष्ठित लेखकों, पत्रकारों द्वारा लिखी गयी हैं। हिन्दुस्तान में यह सम्मान अन्य किसी को प्राप्त नहीं
हिंदी की चुनौतियों का सच
हिंदी की चुनौतियों का सच आजकल देश में हिंदी का सन्दर्भ अचानक राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय हो गया है। जो भी सेमिनार होते हैं वे सभी अंतर्राष्ट्रीय होने लगे हैं। यह अलग बात है कि वे कितने अंतर्राष्ट्रीय होते हैं और कितने एकांगी और स्थानीय, इस सच को उसमें शा
हिन्दू, हिन्द, हिन्दी और नदी संस्कृति
हिन्दू, हिन्द, हिन्दी और नदी संस्कृति तमिल से लेकर संथाली, खासी तक, मणिपुरी से लेकर मलयालम तक सब विशाल हिंदी जाति में समाहित हों और हम व्यवहार के स्तर पर स्थापित करें कि हिन्दी इन सभी भाषाओं को गले लगा रही है। किसी भी भाषा का विकास उसके क्षेत्र और परिवेश विशेष से गह
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-27 दूत हनुमान : भाग-6
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-27 दूत हनुमान : भाग-6 घरको वापिस आनेका रास्ता सबको मालूम रहता है। कामयाब होने पर वापसी हल्की होती है। घर जाना, साथियोंसे मिलना, अपने घरमें भोजन करना - प्राणियोंके मनकी पुकार होती है। हनुमानके मनमें भी। वह तेजीसे घर पहुँच गये। जाते समय समुन्दर पर निगाह कर करके कूद-कूद क
परंपरा और आधुनिकता की समझ
परंपरा और आधुनिकता की समझ बीसवीं सदी में आधुनिकता की बात खूब हो चुकीं, जिसका यह पैमाना बनाया गया था कि दुनिया के जो विकसित देश हैं उनकी तुलना में दुनिया के अविकसित देश किस तरह उनकी बराबरी करेंगे। यानि परिवहन, तकनीक, बिजली के उत्पादन और सुखोपभोग में दुनिया के अविकसित देश कब
बटेश्वर एक सौ आठ शिव मन्दिरों की काशी
बटेश्वर एक सौ आठ शिव मन्दिरों की काशी आगरा का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में जो छवि उभरती है, वह ताजमहल, लाल किला या अकबर की बसाई फतेहपुर सीकरी के विशाल दुर्ग और महल की होती है। पर न जाने हमारा दुर्भाग्य है अथवा इन स्मारकों की जरूरत से ज्यादा चर्चाओं का कि कुछ बेहतर स्मारक और प्राचीन
उनके बोल
उनके बोल वे लोग गाँव में घर की दूसरी मंजिल की छत पर चढ़ आये थे। इन लोगों में से किसी ने भी अपने जीवन में, भानु के घर की दहलीज के भीतर, कभी कदम नहीं रखा था। फिर भी सभी बड़े आधिकारिक भाव से अपना अपना पक्ष रख रहे थे। गली में सहज रूप से चुप्पी भी सहमी-सहमी सी मह
चीन के विश्वविद्यालयों में हिंदी
चीन के विश्वविद्यालयों में हिंदी जब दो मित्र एक साथ बैठते हैं, तो वे क्या चाहते हैं? वे एक-दूसरे से अपने हृदय की बात कहना चाहते हैं, जो महसूस करते हैं उसे साझा करते हैं। और इसके लिए हमें एक भाषा की आवश्यकता होती है। जब आप बोलते हैं, तो मुझे चीनी में समझने में सक्षम होना चाहिए, और
शिवमूर्ति निर्दाग लेखक की दागी कहानी
शिवमूर्ति निर्दाग लेखक की दागी कहानी सबकी चुनरियाँ दाग-दगीली नहीं होतीं। अब शिवमूर्ति को ही देख लीजिए। हालाँकि मैं इन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती और यह स्तम्भ लिख रही हूँ व्यक्तिगत रूप से जाने गए लेखकों पर ही। मैं न इनसे कभी मिली हूँ, न कभी मिलूँगी, इसलिए ये तो इसमें कहीं फ़िट होत
हिंदुस्तान के बाहर भी हिंदी से मज़ाक
हिंदुस्तान के बाहर भी हिंदी से मज़ाक जर्मनी या जर्मनभाषी दूसरे देशों में अपनी भाषा से सीधे भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने वाले व्यक्तियों का अकाल क्यों है, इस प्रश्न का उत्तर देने का आंशिक प्रयास भारत में गोएटे संस्थान, दक्षिण ऐशिया संस्थान, प्रो. हेल्वेत्सिया, जर्मन बुक ऑफिस तथा ऑस्ट
देवदासी समस्यासे आमना-सामना
देवदासी समस्यासे आमना-सामना मसूरी प्रशिक्षणके क्रमसे हटकर मैं आज वह घटना याद कर रहीं हूँ जब देवदासी समस्यासे मेरा आमना-सामना हुआ। यह घटना 1984 की है, महाराष्ट्रके सांगली जिलेकी।स्कूल कॉलेजके दिनोंमें आचार्य चतुरसेन शास्त्रीका उपन्यास पढ़ा था - जय सोमनाथ। उसमें देवदासी प
महाभारत और ताओ द चिङ का चिंतन तुलनात्मक अध्ययन
महाभारत और ताओ द चिङ का चिंतन  तुलनात्मक अध्ययन धर्म और ताओ एक वस्तुगत नियम है, जिसका पालन लोग ठोस काम करने से करते हैं। जैसे ब्रह्माण्ड एक क्षण के लिए भी नहीं रुकता है, वैसे ही मनुष्य को भी निरंतर कर्म साधना में लीन रहना चाहिए। यद्यपि आधुनिक युग में चीन और भारत के मध्य राजनी
मजबूत होता लोकतंत्र
मजबूत होता लोकतंत्र यूँ तो भारत स्वतंत्रता के बाद से ही एक लोकतांत्रिक देश है और हर स्तर पर सरकार का चयन जनता के द्वारा होता है। इस लोकतंत्र की खातिर ही तो लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बहुत लम्बी लड़ाई लड़ी, कठिन यातनायें सहीं और हजारों ने अपने प्राणों को आहुत
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