ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2019 jul
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एक दो - जितेन्द्र वेद
एक दो - जितेन्द्र वेद एक क्यों छीना जा रहा है प्यार और प्यास भीछीनने को आतुर वे जीवन की आस भी पंजों में फँसा लिया है, उन्होंने जहाँ कोकब्जा कर रोटी पर, छीन ली है साँस भी आदिवासी भी धकियाये जा रहे जंगल सेछिन गए हैं उनसे पेड़ और तुच्
आलाप नैना रे
आलाप नैना रे आलाप शृंगार रस सभी गाते हैंविरह किसी को नहीं भाता हैइस जहाँ में मैं ही एक पगली हूँजिसे दर्द में ही मजा आता है। लोग फूलों की बाते करते हैंहम सिर्फ कांटों पे चला करते हैंमिलन के गीत कैसे गाऊँजब बिछोह
लौटती चेतना अमानुष
 लौटती चेतना अमानुष लौटती चेतना उड़ जाएगा पुतलियों से निषाद निराशा प्रभाव न छोड़ पाएगीबोझल हृदय की ये स्थिति भला कब तक ठहर पाएगी? पलकों को मूँद कल्पना सजा हाथों में सिमटा जादू जागायदि पल भी बीते आशा-छाँव में तो यथार्थ म
शांत बहने दो अकेला मुसाफिर
शांत बहने दो अकेला मुसाफिर शांत बहने दो मैं मुसाफिर हूँ अकेलाएक पथ पर चल रहा सुबह उठकर जिधर जाऊँकष्ट-दुख क्या-क्या न पाऊँपक्षियों की भाँति डेराकुछ ठिकाना है न मेराआज तेरे द्वार पर हूँउस द्वार पर भी कल रहा थामैं मुसाफिर
भारत को भाषाओं के माध्यम से समझना
भारत को भाषाओं के माध्यम से समझना नयी शिक्षा नीति के प्रारूप में भारतीय भाषाओं से संबंधित व्यापक सुझाव दिए गए हैं। इनमें भाषाओं की शिक्षा और भाषाओं द्वारा शिक्षा विषयक चार आधारभूत मान्यताएं हैं। प्रथम, भाषा संज्ञानात्मक विकास का साधन है और बच्चे स्वभावतः एक से अधिक भाषाओं को सीखने
शिक्षा नीति : बुनियादी सवाल
शिक्षा नीति : बुनियादी सवाल सिंगापुर के जन्मदाता ली क्वान अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि मैं जब विदेश में पढ़ रहा था तब पहली बार मुझे अपनी भाषा, अपनी मातृभाषा कम जानने और इसीलिए पिछड़ जाने का एहसास हुआ। लौटकर सबसे पहले मैंने अपने बच्चों को उनकी मातृभाषा में शि
शिक्षा नीति प्रारूप में भाषाई संस्तुतियां
शिक्षा नीति प्रारूप में भाषाई संस्तुतियां हमारे समाज में भाषाओं को लेकर अपनी-अपनी धारणाएं मौजूद रही हैं। इनसे सावधानी और विवेकपूर्ण निर्णय लेना अपेक्षित होता है। तभी इस मसौदे से हिन्दी शिक्षण की अनिवार्यता को हटा दिया गया। यदि हम व्यापक परिदृश्य में समझने की कोशिश करें त
शिक्षा : अतिक्रमण और अनुसरण का द्वंद्व
 शिक्षा : अतिक्रमण और अनुसरण का द्वंद्व जब गाँधी जी कहते हैं कि जो शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के योग्य बनाती है वह निकृष्ट है। यह वैसी ही एक अतिवादी उक्ति है जैसे कि वह शिक्षा जो केवल शाब्दिक और वैचारिक वाग्विलास तक सीमित रह जाती है। जीवन रूपी धारा इन दोनों किनारों के बी
हिंदी के पास न लोक है न शास्त्र
हिंदी के पास न लोक है न शास्त्र जितने बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी है उसे दो चार सौ ग्रियर्सनों, रामचंद्र शुक्लों और रामविलास शर्माओं की आवश्यकता थी परंतु हम किए क्या? रामविलास शर्मा के "भाषा और समाज" को प्रकाशित हुए 60 साल हो चुके हैं, हम उससे कितना आगे बढ़े? हिं
मलखान सिंह की कविताओं से उभरते प्रश्न
मलखान सिंह की कविताओं से उभरते प्रश्न मलखान सिंह (जन्म 1948, जिला हाथरस, उ.प्र.) की कविताएँ आत्मकथा हैं। वे आत्मकथा हैं, इसलिए सच्ची हैं। इनकी शैली आत्मकथात्मक है, इसलिए कथन में विश्वसनीयता है। मलखान जी पर भरोसा हो जाता है कि इनकी कविताओं के चित्र सच्चे हैं। इन चित्रों के कई रंग हैं।
दूरदेश में कविता के टेर
दूरदेश में कविता के टेर हिंदी काव्य तरंग एक ऐसी काव्य-धारा है जो विश्व के हर सम्भाव्य स्रोत से निकलकर बहती हुई साहित्य निधि में अनुवृद्धि कर रही है। भिन्न स्रोतों से बहती हुई चेतन काव्य-धारा की चुनिंदा काव्य तरंगों को जोड़कर इस संकलन पुस्तक रूप में समाहित करना एक प्रायोगि
सैद्धांतिकता के पीछे एक व्यावहारिक पहलू पाठ्यक्रम-पाठन-पठन
सैद्धांतिकता के पीछे एक व्यावहारिक पहलू  पाठ्यक्रम-पाठन-पठन विज्ञान में जिस तरह थ्योरी को समझाने के लिये प्रेक्टिकल कक्षाओं की अनिवार्यता तार्किक है वैसे ही शिक्षण संस्थानों से जुड़ी कई सैद्धांतिक संहिताएँ अपने व्यावहारिक पहलुओं के साथ एक नये रूप में उजागर होती हैं। भारत में विक्रम विश्वविद्यालय से शिक्षा प
गांधी और भारतीयता के प्रश्न
गांधी और भारतीयता के प्रश्न उन्नीस सौ नौ में गांधी ने एक महत्वपूर्ण कथन अपनी गुजराती में लिखी पुस्तिका "हिन्द स्वराज" में किया था कि अंग्रेज भी चाहें तो वे यहां रह सकते हैं, शर्त केवल एक है कि उन्हें अपनी अंग्रेजियत छोड़नी होगी। इसी पुस्तिका में उन्होंने यह भी कहा कि पाश्चात्
हम क्यों करते हैं भाषा की चिंता
हम क्यों करते हैं भाषा की चिंता केवल भारत में ही नहीं दुनिया के किसी भी देश में किसी के भी घर में कोई बेटा या बेटी पैदा हो और वह एक वर्ष के भीतर अगर बोलना शुरू न करे तो मां-बाप चिंतित हो उठते हैं कि बच्चा क्यों नहीं बोल रहा है। दुनिया के किसी भी घर में पहली चिंता यह नहीं होती कि
"विदेशी/द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी" लिस्बन (पुर्तगाल) में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी 7-9 जून - एक मूल्यांकन
लिस्बन में ऐसे सौ तथाकथित हिंदी के विशेषज्ञ मिले थे। मतलब भाषाविज्ञान, वाङमय, साहित्य और हिंदी शिक्षा के विशेषज्ञ। यानी ऐसे लोग जो हिंदी प्रेमी और अक्सर हिंदी के प्रचारक और विश्वभाषा हिंदी के प्रेरक भी समझे जाते हैं। सब हिंदी के अध्यापक, प्राध्याप
लिस्बन में हिंदी विमर्श
लिस्बन में हिंदी विमर्श संगोष्ठी में दुनिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आये सौ से भी अधिक हिंदी भाषा एवं साहित्य के विशेषज्ञों एवं भाषा-वैज्ञानिकों, अनुवादकों, साहित्यकारों एवं भारत-विद्या के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। इसे विरोधाभाष नहीं तो क्या कहा
रक्त कमल
रक्त कमल रक्त कमल नाम था उसका। हालांकि इस नाम के साथ "था" लगाने में दिल और दिमाग दोनों को ही सख़्त ऐतराज़ है। न ही हाथों को यह कबूल है कि उसकी कोई नई पुरानी तस्वीर एक अच्छे से फ़्रेम में जड़कर दीवार पर लटका दी जाए। हां आंख और कान चाहे खुले हों या बंद वो स्टैटन
अकादमीका आनंददायी प्रशिक्षण
अकादमीका आनंददायी प्रशिक्षण मसूरीकी लाल बहादुर शास्त्री प्रशासकीय अकादमी में चलनेवाला प्रशिक्षण कई अर्थोमें संस्मरणीय एवं आनंददायी था। करीब आधे लोग ऐसे थे जो मेरी तरह सीधा विद्यार्थी जीवनसे या एकाध वर्षकी लेक्चररी करके यहाँ आये थे लेकिन लगभग आधे ऐसे भी थे जो जीवनकी अगली गतिव
सौभाग्य से मैं उनसे मिल सका
सौभाग्य से मैं उनसे मिल सका अपने एक नाटक "नागमंडला" के बारे में बात करने वे वाशिंगटन विश्वविद्यालय आए थे। कार्यक्रम की समाप्ति पर मैं उनके पास पहुँचा। अधिकांश लोग तब तक जा चुके थे। मैंने उनसे अपने साथ तस्वीर लेने का अनुरोध किया। वे सहर्ष तैयार हो गए। मैं उ
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