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2019 feb
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देवनागरी या रोमन हिंदी?
देवनागरी या रोमन हिंदी? एक बार फिर देवनागरी बनाम रोमन चर्चा में है। इस कंप्यूटर-टैबलेट-मोबाइल के युग में अक्सर यह बात जोर-शोर से उठाई जाती है कि अपनी हिंदी की लिपि देवनागरी की जगह रोमन क्यों नहीं अपनाई जाए। प्रथम दृष्टया यह मुझे सांस्कृतिक हमला नज़र आता है, वह इस तरह कि म
भविष्य की भाषा और भाषा का भविष्य
भविष्य की भाषा और भाषा का भविष्य जो पराधीन है, जो विवश है, जो निष्प्राण है, जो मूक है या जिसे बोलने का अवसर नहीं है, उसका क्या भविष्य और क्या वर्तमान। "लायी हयात आए, कज़ा ले चली चले", वाली स्थिति है। बकरी का क्या भविष्य और मुर्गे क्या मुस्तकबिल? किसान का क्या भविष्य? उसे तो खेती क
कारखाने में नहीं बनती भाषा
कारखाने में नहीं बनती भाषा मनुष्य आरंभ से ही अपने वजूद को लेकर सचेत रहा है। उसकी चेतना ज्यों-ज्यों विकसित होती गयी अपने अस्तित्व को लेकर उसका चिंतन भी प्रबल होता गया। शायद "मनुष्य" और "व्यक्ति" शब्द की सार्थकता यानी मनुष्य का होना उसके मनन करने और खुद को अभिव्यक्त करने की क
महाप्राण निराला कुछ स्मृतियाँ
महाप्राण निराला  कुछ स्मृतियाँ प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी पर मुझे याद आता है कि आज महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी का जन्मदिन है। उसके साथ ही न जाने कितनी और स्मृतियाँ उभर आती हैं। दारागंज, इलाहाबाद में बिताये हुए बचपन के वे सुहाने दिन, जिनकी उन दिनों कोई महत्ता आभासित नही
डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री राजभाषा को समर्पित व्यक्तित्व
डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री राजभाषा को समर्पित व्यक्तित्व एक ऐसा व्यक्तित्व जिसमें सरलता थी, सौम्यता थी, स्पष्टवादिता थी, निडरता थी, कर्मठता थी, सादगी थी और ऐसे ही व्यक्तित्व का नाम था डॉ. रवीन्द्र अग्निहोत्री जो विगत 15 जनवरी 2019 को हमारे बीच नहीं रहे। अग्निहोत्री जी उस दौर में बैंकिंग जगत् के राजभाषा-
कृष्णा सोबती के बिना कुछ कम दुनिया रह गई हमारी दुनिया
कृष्णा सोबती के बिना कुछ कम दुनिया रह गई हमारी दुनिया पिछले दिनों देहरादून में अपने बेटे के फ़्लैट में हमने देखा कि उसकी मेज पर एक उजला टेबल लैंप रखा हुआ है। हमें कुछ संतोष और अभिमान हुआ। यह टेबल लैंप हिंदी की प्रख्यात लेखिका कृष्णा सोबती ने हमें उपहार में दिया था। हमने इसे अपने बेटे के पास भेज दिया-
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-25 दूत हनुमान : भाग-4
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-25 दूत हनुमान : भाग-4 हनुमान सुग्रीव का मन्त्री था। सीता की खोज में सुग्रीव ने हनुमान को दक्षिण दिशा की ओर भेजा था। दक्षिणी ओर में सुग्रीव का दख़ल नहीं था। उसने यह भी सुना था कि दक्षिण के अधिवासी रुक्ष थे। यद्यपि सीता की खोज हनुमान का पहला काम था, दक्षिणी दिशा के अधिवास
छाँटा हुआ पेड़
छाँटा हुआ पेड़ भारत में दो तरह के पेड़ आमतौर पर दिखलाई पड़ते हैं - हरा-भरा अथवा ठूँठ पेड़, बिल्कुल कम्पूटर के द्विआधारी गणित की तरह। मुझे अति प्रसन्नता हुई होती जब कोई भारतीय वैज्ञानिक दशमलव प्रणाली की तरह इन पेड़ों को परखकर द्विआधारी गणित की आधारशिला भूत में कभी रख
दीघा का मोहना तट शिमला में साँझ
दीघा का मोहना तट शिमला में साँझ दीघा का मोहना तट यहां वृंदावन की सुगंधित गलियां नहीं नहीं है इत्रों का कारोबार यहां राधा-कृष्ण ने कभी नहीं रचाया महारासगोपियों की करतल ध्वनियों से नहीं गूंजा कभी मोहना तक फिर भी सुंदर है इस तट
समय की शिला पर नए साल! अब के जो आना
समय की शिला पर नए साल! अब के जो आना समय की शिला पर यह समय की शिला हैइससे छेड़छाड़ मत करनाजो कुछ भी फुसफुसाओगेइस पर खुद जाएगादिल में कितना गहरा छिपा होजगजाहिर हो जायेगादेना पड़ेगा हर प्रश्न का उत्तरहर प्रश्न कचहरी हो जाएग
नौ दशक का सुरीला सफर
नौ दशक का सुरीला सफर आज से 92 साल पहले भारत में मुंबई से रेडियो प्रसारण की पहली स्वर लहरी गूंजी थी। प्रसारण की इस मोहक और ऐतिहासिक यात्र में रेडियो ने सफलता के कई आयाम तय किए हैं। भारत में रेडियो प्रसारण का नाम "आकाशवाणी" विश्व भर में विशिष्ट है। इसकी "परिचय धुन" भी अ
रेडियो की कहानी
रेडियो की कहानी रेडियो की आवाज़ और हवाओं में तैरती उद्घोषक और उद्घोषिकाओं की आवाज़, आवाज़ें अब भी हैं लेकिन शालीनता सौम्यता और मधुरता खो गयी है, रेडियो का कोना पहले टेलिविज़न ने हथिया लिया फिर टेलिविज़न कोने से दीवार पर जा लगा, कोना अब भी है लेकिन खाली, क्या रेड
अभिशप्त
अभिशप्त उन दिनों मैं आकाशवाणी में प्रोड्यूसर था और झुग्गी-झोंपड़ी कॉलनियों में रहनेवाले लोगों के जीवन पर एक कार्यक्रम तैयार कर रहा था। मैंने ट्रांसपोर्ट सैक्शन के इंचार्ज दक्षणी को एक दिन पहले ही कार का इंतजाम करने के लिये कह दिया था। मैंने सोच रखा था कि द
वो शबो-रोज़ो-माहो-साल कहां कुछ यादें, रेडियो के बीते दिनों की
वो शबो-रोज़ो-माहो-साल कहां कुछ यादें, रेडियो के बीते दिनों की कुछ नाते होते हैं, जिनकी स्मृतियां समय के अंतराल से हार नही मानतीं। आकाशवाणी से विदा हुए दशकों हो गए, लेकिन वहां बिताए हुए बरस जैसे कल की बात हों। यह नहीं कि काफ़ी कुछ स्मृति से उतर न गया हो, पर बहुत कुछ ऐसा है, जो अभी-अभी देखी किसी अच्छी फ़िल्म के
पाठकीय टिप्पणी
पाठकीय टिप्पणी ताराशंकर बंद्योपाध्याय बंगाल के एक सुप्रसिद्ध लेखक हैं। कुछ दिन पूर्व इनका साहित्य पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। साहित्य अच्छा है, गहन दृष्टि है। ग्रामीण जीवन का अत्यंत बारीकी से चित्रण भी किया है। विशेषकर अति निम्न वर्ग का। स्वाभाविक है बंगला संस्
लिपि रक्षा अभियान गर्भनाल-न्यास की "इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड सीखो" कार्यशाला सम्पन्न
लिपि रक्षा अभियान गर्भनाल-न्यास की विगत 19 जनवरी 2019 को भोपाल में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की लिपियों की रक्षा और संरक्षण के अभियान में संलग्न गर्भनाल-न्यास की "इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड सीखो" कार्यशाला, हिंदी भवन के महादेवी कक्ष में सम्पन्न हुई। कार्यशाला में केंद्रीय सरकार तथा बैं
सिस्टर रोजी
सिस्टर रोजी बन्द कमरे से अनिता की चीखें स्पष्ट सुनाई दे रही थीं, साथ ही सिस्टर रोजी का डपटता हुआ कर्कश स्वर मेरे सीने पर हथोड़े मार रहा था। बार-बार जी चाहता था, दरवाजा तोड़ कर अन्दर घुस जाऊं, पर साथ खड़ी मीनाक्षी ने मुझे रोक रखा था। अचानक दरवाजा खोल मुझ पर आग्ने
अमीर आग़ा कज़लबाश उर्दू का बेहतरीन शायर
अमीर आग़ा कज़लबाश उर्दू का बेहतरीन शायर मेरी एक फास्ट फ्रेंड हुआ करती थी। गज़ब की सुन्दरी थी। वह रेडियो में नौकरी करती थी। जब मुझे रेडियो में कॉन्ट्रैक्ट पर काम मिला था, तभी इस सखी को भी कॉन्ट्रैक्ट पर काम मिला था। फिर यह वहाँ स्थायी हो गई और मैं उसी मंत्रालय के अन्य विभाग में स्थायी नौक
तरक्की की राह पर चालीस कदम
तरक्की की राह पर चालीस कदम चीन पर कोई हुक्म नहीं चला सकता और न ही चीन को प्रगति से कोई रोक सकता है। 18 दिसंबर 2018 को बीजिंग के विशाल कक्ष में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को संबोधित करते हुए चीन के राष्ट्रपति शीं जिन फ़िंग के ये शब्द पूरी दुनिया विशेषकर अमेरिका को एक खुली च
आशिक़ी.कॉम
आशिक़ी.कॉम जी हाँ ये बात सौ फ़ीसदी सही है। जिस किसी को प्रेम का रोग लग जाता है उसका इलाज हक़ीम लुकमान भी नहीं कर सकते। इस बीमारी के बारे में सिर्फ़ शायरों ने ही नहीं बल्कि विशुद्ध पंडित कवियों ने भी लिखा है -कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय व खाये ब
ये आकाशवाणी है...
ये आकाशवाणी है... सुना है कि पिछले बत्तीस सालों से संध्याकाल छह बजे से प्रातःकाल छह बजे तक चलाया जा रहा ऑल इंडिया रेडियो का कार्यक्रम अब बंद किया जा रहा है। इस रेडियो चैनल पर उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी में भी जो नाटक, कविता और वार्ताओं के रोचक कार्यक्रम प्रसारित किये
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