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2019 dec
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अनुभूतियाँ
अनुभूतियाँ 1.देखो मान लोकल राततुम मेरेसपनों मेंआई थीं वरनासुबह-सुबहमेरी आँखों कीनमी का मतलबऔर क्याहो सकता है? 2.चलोअब उठ जाओऔरजमाने कोअपने चेहरे कीज़
दिया एकान्त लखनऊ
दिया एकान्त लखनऊ दिया आज मैं पानी में भिगोये तुम्हारे मिट्टी के दियों की सौंधी महक़ में हूँ तुम जब सजाकर उन्हें जलाओगी मैं हवा में टिमटिमाती थिरकती लौ बन जाऊँगा भागकर मेरे क़रीब तुम देखोगी मैं बुझा तो नहीं तुम्ह
साल के साल बीत गए
साल के साल बीत गए साल के साल बीत गए दफ़्तर जाते, कुर्सी तोड़ते सपनों को तोड़ते मरोड़तेजीने के लिए पैसे चाहिएआखिर कब तक सपने जोड़ते दिवस रात से जीत गएसाल के साल बीत गए मीलों नापे पर यह ठौर न बदलाभागमभाग का दौर न बदला
संतोष चौबे, निदेशक, विश्वरंग तथा कुलाधिपति, रबींद्र नाथ टैगोर विश्वविद्यालय से आत्माराम शर्मा, संस्थापक-संपादक, गर्भनाल-पत्रिका की बातचीत
संतोष चौबे, निदेशक, विश्वरंग तथा कुलाधिपति, रबींद्र नाथ टैगोर विश्वविद्यालय से  आत्माराम शर्मा, संस्थापक-संपादक, गर्भनाल-पत्रिका की बातचीत भोपाल में विश्व रंग का जलसा कैसा रहा?मुझे लगता है, कि इस सवाल का जवाब प्राप्त करने के लिए आपको मीडिया में प्रकाशित रिपोट्र्स, विश्व रंग के अखबारों में प्रकाशित समाचार, विश्व रंग के डेली बुलेटिन, आमंत्रित अतिथियों के वक्तव्य तथा विदेशी रचनाका
माननीय ब्रजेन्द्र सिंह राठौर, मंत्री, वाणिज्यिक कर विभाग, म.प्र. शासन से प्रख्यात प्रवासी साहित्यकार उमेश ताँबी की बातचीत
माननीय ब्रजेन्द्र सिंह राठौर, मंत्री, वाणिज्यिक कर विभाग, म.प्र. शासन से प्रख्यात प्रवासी साहित्यकार उमेश ताँबी की बातचीत उमेश ताँबी : सबसे पहले मैं विश्व-रंग के दौरान आपके हाथों सम्मानित हुए प्रवासी साहित्यकारों की ओर से कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूं। आपने जिस स्नेह से हम लोगों का सम्मान किया, वे क्षण हमारी स्मृति में जीवनपर्यंत यादगार क्षणों के तौर पर दर्ज हो गये
हिन्दी के अंतर्विरोध-2 भाषा इतनी बड़ी है तो साहित्य संकुचित क्यों?
हिन्दी के अंतर्विरोध-2 भाषा इतनी बड़ी है तो साहित्य संकुचित क्यों? हिन्दी इस देश की बड़ी भाषा है। इस देश की ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी दो-तीन भाषाओं में से एक है। पर भाषा की तरह क्या, हिन्दी का साहित्य भी बड़ा है? बड़ा या विशिष्ट होने के अनेक स्तर हो सकते हैं। क्षेत्र, गुणवत्ता, विविधता, पहुंच, समाहार शक्ति, ल
प्रवासी साहित्य : एक विकास यात्रा
प्रवासी साहित्य : एक विकास यात्रा हमारी तीव्र इच्छा थी कि अमरीका में दूसरे लिखने वाले भी खोजे जाये और तब मैं सोचती थी कि हिंदी के लेखक कहलाने लायक लोग वही हैं जो भारत में छपने वाली मुख्य साहित्यिक पत्रिकाओं में छपते हैं, वही असली कसौटी है और जो नहीं छपते वे खुद क
काग़ज़ी है पैरहन मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी अनुवाद - डॉ. आफ़ताब अहमद
काग़ज़ी है पैरहन मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी अनुवाद - डॉ. आफ़ताब अहमद यह एक चित्रकार के चित्रों पर होने वाली व्यंग्यात्मक परिचर्चा है जो मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की पहली पुस्तक चिराग़-तलेे के तेरह खटमिट्ठे निबंधों में शामिल है। यह परिचर्चा कला पर आलोचकों की बहस की पैरोडी है। इसमें लेखक ने कला की विषयवस्तु में पुरुष की काम
अप्प दीपो भव
अप्प दीपो भव बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा- अप्प दीपो भव। अपना मार्ग चुनने के योग्य बनो। अपने विवेक के प्रकाश में अपना मार्ग स्वयं तय करो। गुरु का काम एक वैचारिक दिशा देना होता है, लेकिन उस ज्ञान का परिस्थिति के अनुसार उपयोग करना शिष्य के अपने विवेक पर निर्भर क
कम्प्यूटरों में द्विभाषिकता और यूनिकोड
कम्प्यूटरों में द्विभाषिकता और यूनिकोड कम्प्यूटरों में द्विभाषिकता की आवश्यकता शुरू से बनी रही है। भारत में कम्प्यूटरों में अंग्रेजी के अतिरिक्त जहां हिंदी की आवश्यकता है, वहां अन्य भारतीय भाषाओं की भी। परंतु हम कम्प्यूटरों में अंग्रेजी देखने के इतने अधिक अभ्यस्त हैं कि हमें लगता है कि
गॉड ब्लैस यू...
गॉड ब्लैस यू... क् या वह बीमार था? कैसे हुई होगी उसकी मौत? क्यावह उस समय अकेला होगा? क्या उसने मुझे भी यादकिया होगा? ऐरन, उसके कुत्ते का क्या हुआ होगा?उससे मेरी मुलाकात, सेंट्रल लायब्रेरी में अचानक ही हो गई। मैं इंग्लैंड में तब नई नई आई थी। बच्च
पब्लिक सेक्टरकी भूमिका
पब्लिक सेक्टरकी भूमिका हमारे देशमें सरकारी संस्थाएँ हों या नहीं, विशेषकर सरकारी उद्योग हों या नहीं, यह विगत कुछ वर्षोंसे चर्चाका विषय रहा है। एक ओर पचासके दशकसे स्थापित पीएसयू - पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्ज हैं, उनकी अकार्यक्षमताका रोना है। दूसरी ओर निजीक्षेत्रके उद्योग ह
एक विदुषी पतिता की आत्मकथा
एक विदुषी पतिता की आत्मकथा मानदा कब किन हालातों में अनुवाद हुई, जब मैं सोचता हूँ इस बारे में तो ये जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक लड़की जिन दस्तूरों में पैदा हुई - सन् 1900 में और 1929 में यानी उनतीस बरस में उसने अपनी जिन्दगी की सारी लड़ाइयों को एक जुबान दे दी। उस जुबान में रची
विश्वरंग : यादगार साहित्यिक यात्रा
विश्वरंग : यादगार साहित्यिक यात्रा मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित "विश्व रंग" कई अर्थों में स्मरणीय है। यह स्मरणीय ही नहीं अद्वितीय भी है। यह आयोजन कला, साहित्य एवम् तकनीकी के संवाद की अनूठी पहल है। यही पहल कालान्तर में समाज को नई सोच व नई दिशा देने में भी अहम भूमिका निभाये
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