ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2019 aug
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हां, बच्चों को छुट्टियां दें और सचमुच छुट्टी की तरह दें!
हां, बच्चों को छुट्टियां दें  और सचमुच छुट्टी की तरह दें! विगत माह मध्यप्रदेश विधानसभा में सर्वानुमति से जो पारित हुआ, वह था तो अशासकीय संकल्प पर वास्तव में इसे लोक संकल्प होना चाहिए। राज्य सरकार को भी इसे खानापूर्ति न मानकर इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि इस संकल्प के माध्यम से कांग्रेस विधाय
भारतीय भाषाओं का हाशियाकरण
भारतीय भाषाओं का हाशियाकरण मैथिली के महान महाकवि विद्यापति की पंक्ति ज़रा देखें और समझें "हम नहि आजु रहब अहि आंगन जं बुढ होइत जमाय, गे माई। एक त बैरी भेल बिध बिधाता दोसर धिया केर बाप। तेसरे बैरी भेल नारद बाभन। जे बुढ आनल जमाय। गे माइ।।" विद्यापति की काव्य संपदा से जो बेहद सह
शिक्षा, भूख और भय
शिक्षा, भूख और भय जीवन का क्या महान लक्ष्य है, किसी को पता नहीं। लेकिन यह तय है कि जीवन की पहली शर्त और आवश्यकता इसे कायम रखना है। तभी अधभूखे रहकर, कंद-मूल फल खाकर चिंतन करने वाले, जीवन को नश्वर तथा पानी का बुदबुदा और माया को भ्रम बताने वाले, आत्मा-परमात्मा से कम प
भाषाओं का नस्लवाद और 8वीं अनुसूची
भाषाओं का नस्लवाद और 8वीं अनुसूची यह बात लगभग सर्वमान्य है कि भाषा और बोली में कोई भेद नहीं होता, इसलिए अगर किसी बोली का उपयोग लाख और हजार लोग नहीं बल्कि केवल दो व्यक्ति भी करते हों तो उसे भाषा कहना ही उचित होता है। कुछ साल पहले अंडमान की बोआ सिनियर की मृत्यु के साथ "बो" भाषा समाप
भाषा की इज्ज़त का सवाल
भाषा की इज्ज़त का सवाल गत शताब्दी के अंतिम वर्षों में हैदराबाद से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र "दक्षिण समाचार" में मैंने एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें मैंने मत प्रकट किया था कि आज के युग में यदि कोई आधुनिक शूद्र हैं तो वे हैं हिंदी वाले या भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने वाले
विश्वभाषा हिंदी : उद्देश्य, कल्पना, माया?
विश्वभाषा हिंदी : उद्देश्य, कल्पना, माया? हिंदी बहुत कुछ है। भारत की औपचारिक भाषा, क़ौमी आवाज़, हिंदुस्तान की पहचान का महत्त्वपूर्ण स्वरूप, 22 राष्ट्रीय भाषाओं में से एक, घर की बोली, गंगा-जमुनी तहज़ीब का मज़हर, संस्कृत की सुपुत्री, उर्दू की छोटी या तो बड़ी बहिन, अंग्रेजी की अपने को छिपाती हुई
कलयुग गड़ासे सा तना है समय मेरी गर्दन पर
 कलयुग गड़ासे सा तना है समय मेरी गर्दन पर कलयुग यह उस युग की बात हैजब भाषा सेसौम्यता, उदारता और विनम्रता जैसे शब्दों का लोप हो गया था सहनशीलता और सहिष्णुता - बस राजनैतिक अनुष्ठानों में बाकी थे हर आदमी के हाथ मेंएक पुरातन लोकना
माछेर झोल
माछेर झोल माछेर झोल जब ओडिशा मेंचलें ठंडी हवाएंतट को छूने वालीतब तुम आना मुझे यादबंगाल में मैं चख लूँगातुम्हारे हाथ की बनीमाछेर झोलजब उदास होनासाहिर को सुननामैं तुम्हें अमृता-सामहसूस
घर वाला चेहरा - बाहर वाला चेहरा
घर वाला चेहरा - बाहर वाला चेहरा घर से बाहर निकलने से पहले आईने में देखती हूँ बाहर वाला चेहरा - अपनी जगह पर है न? दुरुस्त करती हूँ , आँखें, मुँह, हाव-भाव सीधी करती हूँ पीठ, सामना करने के लिए बाहर वाले संसार का एक हल्की मुस्कराहट सहेजे, निकलती
महात्मा गांधी का भाषा चिन्तन
महात्मा गांधी का भाषा चिन्तन महात्मा गांधी अपनी प्रकृति में आदर्शवादी पर अपने चिन्तन में व्यावहारिक थे। इसलिए उन्हें एक व्यावहारिक चिन्तक और विचारक माना जा सकता है। उनके आदर्श थे स्वराज्य, समतामूलक समाज, सादा जीवन, घरेलू उद्योगों का विस्तार, जिसे स्वदेशी आन्दोलन के दौरान बल म
बोली, राष्ट्र-भाषा और विश्व-भाषा
बोली, राष्ट्र-भाषा और विश्व-भाषा दुनिया के सारे समाजशास्त्री और भाषा वैज्ञानिक यह भलीभांति जानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की अभिव्यक्ति सबसे पहले बोली में हुई। बोली प्रकृति और मनुष्य के गहरे अनुभूतिमूलक सम्बन्ध से पैदा होती है। उसकी शुरुआत वनवासीजनों से हुई है जो अपने स्वभाव के अनुर
सर्द रात का सन्नाटा
सर्द रात का सन्नाटा नेहा बिस्तर पर पड़ी-पड़ी करवटें बदलती रही। नींद को न जाने किस बात की शिकायत थी, जो उसके पास आने-भर से क़तरा रही थी। जनवरी की गहराई रात काफ़ी ठंडी थी। सुबह से ही रुई-सी कोमल श्वेत बर्फ़ झर-झर गिरती हुई सड़क पर बिछी जा रही थी। स्कॉटलैंड के पहाड़ बर्फ़ से ढक
अफसर बनकर निकलना मसूरीसे
अफसर बनकर निकलना मसूरीसे मसूरीके प्रशिक्षणका घोषित उद्देश्य तो यही है कि सरकरी सेवामें उच्चपदसे ही अपनी नौकरीका आरंभ करनेवाले अधिकारियोंको उनके आनेवाले वर्षोंके उत्तरदायित्व लिये तैयार करना। उन्हें बताना कि ग्रामीण स्तरसे लेकर अत्युच्च केंद्रस्तरतक सारे काम कैसे चलते हैं,
पानी केरा बुदबुदा रिश्तों की परिधि का यथार्थ
पानी केरा बुदबुदा  रिश्तों की परिधि का यथार्थ सुषम बेदी वर्तमान की उन कथाकारों में प्रमुख हैं जिन्होंने भारत और पश्चिमी परिवेश को बड़े नज़दीक से देखा है। यही कारण है कि उनकी कथाभूमि के केंद्र में भी दोनों संस्कृतियाँ रहीं हैं। अपने सद्यः प्रकाशित उपन्यास "पानी केरा बुदबुदा" के माध्यम से सुषम जी
लतीफ़े सिर्फ़ ख़वातीन पर
लतीफ़े सिर्फ़ ख़वातीन पर चुटकुले सुनना और सुनाना एक बड़ा अच्छा शग़ल है। किसी भी महफ़िल में दो लोग हीरो बन जाते हैं - एक तो गाना गाने वाला अगर वो सुर में गाता हो और वाक़ई अच्छा गाता हो; दूसरा जोकर मतलब जोक सुनाने वाला - बशर्ते कि एक तो वो पुराने लतीफ़े न सुनाये, दूसरे पंच लाइन
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