ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
काफ़ी का कप मुझे भी पेड़ बना देता
काफ़ी का कप  मुझे भी पेड़ बना देता काफ़ी का कप टेबल पर कॉफ़ी का कपमेरी तरह चुपचाप सापंखे का शोर मेरे अंदर के मौन-सासीने के अंदर एक उमसबिल्कुल इस मौसम के जैसी जानती हूँ कप के तल मेंबची थोड़ी-सी कॉफ़ी सूख जाएगीकप भी धुल करअपनी जगह पहुँच जाएगापर मैं? मेरा क्या, चुप के शोर मेंउमसता अंतस लिएमैं भी कप की बची कॉफ़ी-सी सूख जाऊ
गुजिश्ता वक्त की तस्वीर पढ़ना आना चाहिए
 गुजिश्ता वक्त की तस्वीर पढ़ना आना चाहिए गुजिश्ता वक्त की तस्वीर किसी रतजगे को पार करके आया मुसाफिर आंखों में फैली थकान की चादर को समेटे हुए नींद का इंतजार नहीं करतानींद चली आती हैसफेद घोड़ों पर सवार होकर। स्याह आसमान की छाती पर गहरा समुंदर सिलवटें लिए फिरता है लहर आती है लहर जाती है चांदनी की बारिश में मुस्कुराती हुईतुम्
सुनो नदी उसने कहा
सुनो नदी उसने कहा सुनो नदी नदी तुम यूँ ही बहती रहनानदी तुम कभी भी कुछ मत कहनानदी तुम नहीं हो सिर्फ नदीतुम्हें कहा है हमने "माँ"माँ की तरह तुम सब कुछ सहनानदी तुम कभी भी कुछ मत कहनाबूँद-बूँद मरनाबस पाप हरनाखबरदार, एक शब्द न कहनादेवी हो तुम, चुप ही रहनाचुपचाप यूँ ही बहती रहनानदी तुम कभी भी कुछ मत कहना।
स्वाद श्रेय
स्वाद श्रेय स्वाद क्या हो रहा?कोई पूछता है मुझसे अक्सरहंसती हूं मैंकभी मुस्कुराती भी हूंक्या कहूं हमेशाकि यूं ही बैठी हूंया कि लेटी हूंया कि रसोई में रोटियां बेल रहीपहली रोटी गाय के लिएआखिरी रोटी कुत्ते के लिएबीच की गिनी हुई रोटियां तीन बच्चों के लिएलेकिन उस दिन उसके पूछने परकि क्या हो रहामैंन
अशोक का उद्धार
अशोक का उद्धार समीक्षक का प्रश्न : हे अशोक के वृक्ष सुघनकह दो मुझसे कुछ सजल नयनवैदेही जब तेरी छाँव रहीकैसे बीते तुझ पर वो क्षण रावण सीता हर लाया थासारी सृष्टि थी उबल पड़ीहुआ प्रलय का नाच प्रचंडकैसे बीते तुझ पर वो क्षण रवि का क्रोध महान हुआऔर चार पहर अंगार बहेझुलसे थे सारे जीवित जनकैसे बीते तुझ पर वो क्षण मेघ श्
अंतर्राष्ट्रीय पैठ बनाते हिंदी के शब्द
अंतर्राष्ट्रीय पैठ बनाते हिंदी के शब्द डार्विन और उसके सहयोगी हक्सले, विजविड और कोनिनफार का यह मानना था कि भाषा ईश्वर का दिया हुआ उपहार नहीं है, भाषा शनै:-शनै: ध्वन्यात्मक शब्दों और बोली से उन्नति करके इस दशा को पहुँची है। इसी तरह कई भाषा विज्ञानियों का मत है कि मनुष्य बहुत काल तक गूँगा रहा, संकेत से काम चलाता रहा, जब काम न चला तो भाषा ब
सोशल मीडिया और हिन्दी विमर्श
सोशल मीडिया और हिन्दी विमर्श जिस प्रकार हमारी फिल्मों/सिनेमा में स्क्रिप्ट की मांग के अनुसार "एंटेरटेनमेंट" का तड़का लगता है कुछ उसी प्रकार हिन्दी के बारे में बातचीत करते समय हिन्दी-अंग्रेज़ी की प्रतिस्पर्धा का भाव आ जाता है। ऐसा शायद इसलिए भी होता है कि अंग्रेज़ी और यूरोपीय भाषाएँ आधुनिकता के द्योतक के रूप मे जानी जाती हैं। टेकी,
रोमन लिपि का कपट मृग और देवनागरी
रोमन लिपि का कपट मृग और देवनागरी हिन्दी को भारत देश में आज जो सर्वमान्य सम्पर्क भाषा का दर्जा मिला हुआ है वह समय प्रवाह की स्वाभाविक प्रक्रिया है। इतना जरूर है कि इसमें अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम कर रहे गैर हिन्दी भाषी समाजसेवी, साहित्यकार और राजनेताओं द्वारा हिन्दी को अंग्रेजों के विरुद्ध जनसामान्य की भाषा बनाने से इस
हिंदीसेवा का "सीजन" आया और गया
हिंदीसेवा का यूं तो पूरे विश्व में दो या तीन ही मौसम पाए जाते हैं, लेकिन भारत ही ऐसा देश है जहां पर छह ऋतुयें पाई जाती हैं। अर्थात छह सीजन होते हैं। वर्तमान में एक नया सीजन भी जुड़ गया है, वह है हिंदी सेवा का सीजन। जैसे देवी की आराधना के लिए नवरात्र माह होता है, शिवजी के लिए सावन मास होता है, मुस्लिम भाई रमजान मन
ज्ञान बरास्ते चाय-पकौड़े
ज्ञान बरास्ते चाय-पकौड़े मेरे पति के एक निहायत शरीफ दोस्त हैं। निहायत शरीफ मैंने इसलिए कहा क्योंकि ऐसा उन्हें स्वयं लगता है और दूसरों को भी यही लगता है कि जब भगवान उन्हें बना रहे थे तो शराफत का पूरा डिब्बा ही खाली हो गया था। उन्हें देखने से ही लगता है कि शराफत उनमें कूट-कूट के भरी गई है। अपनी स्त्री को छोड़कर किसी भी परस्त्र
विष्णु खरे का जाना
विष्णु खरे का जाना विश्व साहित्य को हिन्दी में अनूदित करने वाली एक ख़ास शख्सियत के जाने से अनुवाद की दुनिया को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई में बहुत समय लगेगा। अगर सिर्फ जर्मन-भाषी साहित्य की बात करें तो उस प्रदेश के कुछ नामचीन साहित्यकारों से परिचित कराने या फिर उस परिचय को और गहरा कराने का श्रेय विष्णु खरे को जाता है।
विष्णु खरे : हिंदी का खरा कवि
विष्णु खरे : हिंदी का खरा कवि विष्णु खरे (9.2.1940-19.9.2018) आलोचक थे, लेख लिखते थे, अनुवादक थे, कवि थे, फिल्म समीक्षक थे, संपादक थे, लेक्चरर भी थे, बहुत कुछ थे, आलोचना में कट्टरपंथी थे, उदारवादी भी थे। मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ कि तसल्ली देने में सचमुच अच्छे थे। कई लोगों को इनके ई-मेल्स से और इनसे मिलने से सच्चा प्रोत्साह
हाजोंग जनजाति का सांस्कृतिक वैशिष्ट्य
हाजोंग जनजाति का सांस्कृतिक वैशिष्ट्य जनसंख्या की दृष्टि से हाजोंग एक छोटा समुदाय है। इनकी अधिकांश आबादी मेघालय में निवास करती है। इसके अतिरिक्त असम के कार्बी ओंगलोंग तथा नार्थ कछार हिल्स जिलों में भी हाजोंग जनजाति के लोग रहते हैं। मेघालय की सीमा पर स्थित असम के लखीमपुर व ग्वालपारा जिलों में भी इनकी कुछ आबादी है। इस समुदाय के उद्भव और म
तमिल और हिन्दी की कहावतें
तमिल और हिन्दी की कहावतें कहावत मानव जीवन का अभिन्न अंग है और भाषा की अमूल्य निधि है। कहावतों से हमारी विचारधारा की एक परम्परा स्पष्ट हो जाती है। हिन्दी और तमिल भारत की दो प्रमुख भाषाएँ हैं, जिनका सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व है। तमिल भारत की सबसे प्राचीन एवं गतिशील भाषा है, जो आज तक अपना सशक्त अस्तित्व बनाए हुए है।"कहा
आश्विन का प्रभात और शिउली फूल
आश्विन का प्रभात और शिउली फूल आश्विन के शारदीय प्रभात में बज उठे आलोक मंजीरे लुप्त हो चलीं पावस की मेघमालाएँ धरती के बाह्याकाश में प्रकृति के अंतराकाश में जाग उठी ज्योतिर्मयी जगन्माता के आगमन की गाथाएँ बचपन से ही आकाशवाणी केंद्रों से हर वर्ष पितृपक्ष (आश्विन कृष्णपक्ष) के समापन और देवीपक्ष (आश्विन शुक्लपक्ष) के आगमन की पूर्व ति
गगन गिल छोटी उम्र की बड़ी लड़की
गगन गिल छोटी उम्र की बड़ी लड़की ऐसे दोस्तों पर कौन ना मर जाए खुदा। सच है, मैं यादों की गलियों से गुज़र रही हूँ। मेरी एक मित्र है, बड़ी गहरी और अनोखी मित्र। कवियित्री, चिन्तक, दार्शनिक। उसके और मेरे बीच उम्र का अच्छा-खासा फ़ासला है। वह मेरे और मेरे पुत्र के बीच में है यानि जितने साल वह बौबी से बड़ी है, उतने ही साल मुझसे छोटी है। हमारे
देह के मुंडेर पर
देह के मुंडेर पर एक निजी कथन से अपनी बात शुरू करना चाहती हूँ। मैं कवि हूँ, लेकिन हर समय नहीं। स्वतंत्र भी मैं उतनी ही हूँ जितना अपने को होने देती हूँ। लेकिन स्त्री हूँ, इसका बोध मुझे सोते-जागते हर क्षण रहता है। कपड़ों के चुनाव में, उठने-बैठने के ढंग में, बोलचाल की भाषा में कौन-से शब्द मेरे मुँह पर न आएँ - इसमें। ये त
भाषा की दुनिया में आदमी
भाषा की दुनिया में आदमी दुनिया का अर्थ ही यह है कि वह जब बनी होगी तो उसकी पहली इच्छा बोलने की रही होगी। क्योंकि दुनिया अगर है तो किसी से बोले बतियाये बिना आखिर चलेगी कैसे। जब शुरू-शुरू में आदमी पृथ्वी पर आया होगा, निश्चय ही उसने भोजन की तलाश की होगी, क्योंकि भूख अपने आप लगती है। आँधी, पानी, धूप और तूफानों से बचने के लिये क
स्मृतियों और बिंबों का अनोखा कोलाज
स्मृतियों और बिंबों का अनोखा कोलाज मोहन राणा की कविताओं से मेरा पहला साक्षात्कार 1997 में किसी संकलन में छपी उनकी कविताओं से हुआ था। कविताओं के शीर्षक आज भी मुझे याद हैं- "पुरानी खिड़की" और "रीजेंट पार्क"। मोहन की इन कविताओं में शब्दों और बिंबों का ऐसा अद्भुत सौंदर्य था कि पढ़ने के बाद देर तक मैं अचंभित, अभिभूत-सी रही। जैसे दिवास्वप्न
परजीवी
परजीवी यूँ तो खबर कोई अनपेक्षित भी नहीं थी। शंका मन मस्तिष्क में हर पल छाई ही रहती थी लेकिन कल रात जब बाबा का फोन आया कि माँ को हृदयघात के पश्चात शरीर के बाएँ भाग में लकवा हो गया है तब मानो पूरा पेरिस ठहर गया था। अगले हफ्ते की कन्फर्म टिकिट होने पर भी अब यहाँ रुके रहना संभव नहीं था। चूंकि व्योम ने जाने से
सन्देश के प्रसंग और सन्दर्भ
सन्देश के प्रसंग और सन्दर्भ जब तक प्रसंग और सन्दर्भ का हवाला न दिया जाए तब तक किसी बात का सही अर्थ नहीं खुलता। इसीलिए जब किसी गद्यांश या पद्यांश की व्याख्या की जाती है तो पहले उसका प्रसंग-सन्दर्भ बताया जाता था। कोई 45 वर्ष पहले हुई एक सत्य घटना को चुटकले के रूप में इतना प्रचारित किया गया कि उसका चश्मदीद होने का दावा करना झूठा
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