ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2018 may
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एक दो : सुधा दीक्षित
एक दो : सुधा दीक्षित एकजब श्याम मेघ क्षिति पर झुक कर चातक की प्यास बुझायेतब तुम चकोर बिरहन को नभ में रह कर ना तरसाना विधु बदली में छुप जाना। जब रिमझिम वर्षा की फुहार या कुहुक कोकिला की पुकार सुनकर दामिनी खिलखिला
अनावरण आदतें
अनावरण आदतें अनावरणपरत-दर-परतमैं खोलती गईतुम्हारा दिया उपहार! पहले जिज्ञासा नेउसे देर तक उकेराफिर संशय जागाऐसा क्या है इसमें?जो इतने सारे आवरण हैं। तब भय जन्मामैंने और आगेअनावरण का कार्यक्रम
प्रणय-ब्रह्माण्ड गर्भ की उतरन
प्रणय-ब्रह्माण्ड गर्भ की उतरन प्रणय-ब्रह्माण्डप्रणयदेह का ब्रह्माण्ड हैसाँसों की आँखेंस्पर्श करती हैंप्रणय काअंतरंग कोनाजहाँनिनादित है -अनहद नाद देहप्रेम का शब्द हैविदेह प्रणय कीसु
दहशत
दहशत शिप्रा! मैं मौसी से मिलने अस्पताल जा रही हूँ।" "ठीक है" ".........। और सुनो, रमेश नाना आएँ तो उन्हें यह पैकेट दे देना।""हाँ, ठीक।""अरे! एक बार आकर देख तो लो, मैं किस पैकेट की बात कर रही हूँ...। गेम खेलने बैठी है तो इसे
उज्जवला अब खुश थी!
उज्जवला अब खुश थी! देखा आपने रात में कैसी रासलीला चल रही थी मोहल्ले में? पानी सर से ऊपर होता जा रहा है अब तो। वो तो अच्छा है दीदी कि हमारे बच्चे अभी बहुत छोटे हैं। वर्ना इन कमीनों की हरकतें देख सुन क्या असर पड़ता उन पर राम ही जाने... चौहान काकी ने भदौरिया ताई को ताज़े
राजनीति के घाट पर संतन की भीड़
राजनीति के घाट पर संतन की भीड़ ये कैसा समय आ गया है कि राजनीति के घाट पर संत इकट्ठे हो रहे हैं। नाना प्रकार के संत। कोई लेपटॉप बाबा है तो कोई कम्प्युटर बाबा। कोई घड़ी वाला बाबा है तो कोई गृहस्थ बाबा। सबको भरम है कि उनके पीछे लोग दीवाने हैं। वे जो कहेंगे, लोग वही करने लगेंगे।
ज्ञान और शिक्षा की प्रकृति
ज्ञान और शिक्षा की प्रकृति विगत दिनों एक छोटा-सा समाचार था- अपंजीकृत मदरसों और वैदिक स्कूलों की पढाई अमान्य। आगे खुलासा था कि यह सलाह सेन्ट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ़ एज्यूकेशन की उपसमिति द्वारा सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में शामिल है। इसके लिए केंद्र अपंजीकृत मदरसों और वैदिक स्कूल
बच्चों को दीजिए गरिमामय बचपन
बच्चों को दीजिए गरिमामय बचपन न्यू मार्केट हो या कोई और मार्केट, भोपाल हो या कनॉट प्लेस दिल्ली हर शहर के चौराहे पर अक्सर गाड़ी रुकने पर भिक्षा मांगने वाली कुछ युवा महिलाएं गाड़ी के कांच से झांकने लगती हैं। मन को कचोटने वाली बात यह नहीं है कि वे औरतें भीख मांग रही हैं क्योंकि वे
इण्डो-ऐंग्लियन्स
इण्डो-ऐंग्लियन्स भारत में एक प्रभावशाली जनसांख्यिकीय अथवा मनोवैज्ञानिकता का उद्भव हो रहा है और यह संपन्न, शहरी और उच्च शिक्षित है। 2012 या 2013 के आसपास, मेरी बेटियों ने हमारी मातृभाषा कोंकणी में बातचीत करना बंद कर दिया था। यह पूरी तरह साफ नहीं है कि ऐसा किस कारण
क़ज़ाख़ और भारतीय संस्कृति में रंगों के मायने
क़ज़ाख़ और भारतीय संस्कृति में  रंगों के मायने कजाख और भारतीय संस्कृतियों में रंगों के नामों के अर्थपूर्ण क्षेत्रों की तुलना की जाती है। किसी भी देश के जनजीवन की संस्कृति में चाहे वह फिर क़ज़ाख़ हो या भारत रंगों का विशेष महत्व होता है। वास्तव में, ये ऐसे संकेत हैं जो खुद के बारे में गहरी जानकारी
मुखौटों की संस्कृति
मुखौटों की संस्कृति कई बार सोचती हूँ, लेखकों का व्यक्तिगत जीवन साफ़-सुथरा क्यों नहीं होता? मान लिया, व्यक्तिगत जीवन में हुए संयोग-दुर्योग उनकी जीवन शैली में असंतुलन ला देते हैं लेकिन विचारों में तो आदर्श हो, चरित्र में तो उच्चता हो। मैं भी लेखक हूँ, मेरा जीवन भी काफ़ी
जेठ जरै जग, चलै लुवारा
जेठ जरै जग, चलै लुवारा ग्रीष्म का आगमन हो गया। ग्रीष्म शब्द - ग्रसु अदने (खाना, निगलना) और मक् प्रत्यय से व्युत्पन्न हुआ है। इस ऋतु में काल हमें निवाला बनाना चाहता है। कोई कारण पूछ सकता है, "भला ऐसा क्यों होता है?" इसका उत्तर है कि ग्रीष्म निदाघ काल है। निदाघ - नि (हमेश
लोक कल्याण से विमुख शिक्षा
लोक कल्याण से विमुख शिक्षा पिछले वर्षों में कौशल-संपन्न और बहुपठित लोग जिस तरह आर्थिक दुराचार के मामलों में शामिल होते दिखाई पड़ रहे हैं उनसे समाज और शिक्षा के रिश्ते प्रश्नों के घेरे में आ रहे हैं। शिक्षा से मिलने वाला ज्ञान मनुष्य को क्लेशों से मुक्त करने वाला सोचा गया था।
हिन्दी के पाठक कहाँ हैं?
हिन्दी के पाठक कहाँ हैं? मेरे आसपास ढेरों हिन्दी प्रेमी हैं जो सिर्फ हिन्दी दिवस के दिन ही हिन्दी बोलते हैं, सोच-सोच कर। बाकी दिनों वे हिन्दी की ढपली बजाते हैं और कमा खाते हैं। कई मित्र तो रोमन लिपि पर इतने फ़िदा हैं कि देवनागरी में लिखने में उन्हें लज्जा आती है। देवनागरी
क्या अश्वत्थामा जीवित हैं?
क्या अश्वत्थामा जीवित हैं? असीरगढ़ का किला। रहस्यमय किला। कहते हैं यहाँ स्थित शिव मंदिर में महाभारतकाल के अश्वत्थामा आज भी पूजा-अर्चना करने आते हैं। इस किंवदंती को सुनने के बाद हमने फैसला किया कि सबसे पहले इसी किले के रहस्यों को कुरेदेंगे। देखेंगे कि यह किंवदंती कहाँ तक सच ह
ऊबे हुए सुखी
ऊबे हुए सुखी ऊबे हुए सुखी - यह पद आधुनिक हिंदी के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि रघुवीर सहाय का गढ़ा हुआ है। यह उनके अनेक लेखों में से एक लेख का शीर्षक है। इसी नाम से उनके निबंधों की एक किताब 1983 में प्रकाशित हो चुकी है। रघुवीर सहाय सिर्फ कवि ही नहीं पत्रकार भी थे। वे
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी
मैं केहि कहौं बिपति अति भारी ईश्वर का धाम शरीर ही है, जो सबको मिलता है। जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द होकर वह सकल संसार में व्यापा है। शरीरों में हृदय ही उसका भवन है। प्रभु के घर में काम, क्रोध और लोभ घुस आये हैं। महाकवि तुलसीदास जी कहते हैं कि हे राम! वे मुझे अनाथ समझ
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