ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
फिर एक तूफ़ान
फिर एक तूफ़ान

बरसों बरसों पहले
जब मैं आप्रवासी नहीं था

बड़े उजले भेस में
आई थी एक काली आँधी
उखाड़ती अनगिन पनपते पौधे
और वटवृक्ष भी
उजाड़ती कितने ही गाँव, शहर

धीरे-धीरे फिर रोपे गए
नए पौधे
इस आस के साथ
कि वे एक दिन वृक्ष होंगे

ईंट-ईंट करके
...

खोया क्या-क्या पाया हमने लगे सोचने आज
खोया क्या-क्या पाया हमने लगे सोचने आज

एक

खोया क्या-क्या पाया हमने लगे सोचने आज
लगा अमेरिकी बटनों पर हिंदी वाले काज
हिंदी वाले काज पहनते सभी मुखोटे
हो जाते हैं फ़िट बटन हों छोटे-मोटे
तब भी हिंदी भाषा का इक बीज न बोया
दूध ख़रीदा पतला-पतला अच्छा खोया-खोया।


दो

बेटी बोले नाक से बेटा गिट ...

ओ प्रवासी
ओ प्रवासी

एक

दूरियां तो मिट गईं तकनीकियों की डोर में बांध
किन्तु अपने आपसे क्या मिट सकी दूरी ज़रा भी
टूटते सम्बंध के सन्दर्भ के अवशेष चुनता
और कितने दिन भ्रमों में घिर रहेगा ओ प्रवासी

चित्र वे जिनके सपन आकर अँजा करते नयन में
कल तलक, वे बस दिवस की एक करवट के परे है ...

सुनो माँ! बात करनी थी!
सुनो माँ! बात करनी थी!

सुनो माँ! बात करनी थी!
तुम्हें वो याद है
मिट्टी की गुल्लक दो रूपये वाली
उसे मैं भूल आई हूँ वहीं आले के कोने में
वो पूरा भर गया होगा!
अब बाबूजी नहीं हैं तो
बड़े भैया ने हौले से
हरेक पहली सितम्बर को
रखे होंगे नए सिक्के...

सुनो माँ! कोश मेरे सब अधूरे है ...

अगले खम्भे तक का सफ़र
अगले खम्भे तक का सफ़र

याद है
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार सड़क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे
खम्भों को गिना करते थे
और मैं जब चलते चलते
थक जाता था
घर वापस लौटना चाहता था
तब तुम आंखें बन्द कर के,
कोट ...

कहीं देर न हो जाये
कहीं देर न हो जाये

बहुत कह चुके बहुत सुन चुके बस
अब कहीं देर न हो जाये
चलो मिलकर करें शंखनाद सभी
एक आशावादी शुरुआत के साथ
अपनों को अपनों से मिलाएं

भौतिकतावादी चमक-दमक
निगलती जा रही हमारी सभ्यता-संस्कृति को
साक्षी मान पर इस ही को करते हैं प्रतिज्ञा
नहीं मिटने देंगे इसक ...

दूर तुझसे नहीं हूँ माँ
दूर तुझसे नहीं हूँ माँ

अमेरिका एक भागती दौड़ती दुनिया, अपने में मस्त, किसी के लिए ना रुकने वाली, नशे में धुत लोग, यहाँ की सड़कों पर अश्लीलता में लिप्त युवा, विशाल गगनचुंबी इमारतें और एक ऐसी जगह जहाँ पहुँचने के बाद आपको कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, एक सुनहरा भविष्य आपका इंतज़ार करता है... हमारा सिनेमा भारतीय दर्शकों ...

अमेरिकी हो गये भारतीयों का द्वंद्व
अमेरिकी हो गये भारतीयों का द्वंद्व

अमेरिकन महाद्वीप में भारतीय दक्षिण एशियाई लोगों का आगमन विशेषकर 19वीं सदी से आरम्भ हो गया था जिनमें स्वामी विवेकानन्द, सुभाषचन्द्र बोस, स्वामी रामतीर्थ व स्वतंत्रता संग्राम और गदर से जुड़े अनेक व्यक्ति शामिल थे। बीसवीं शताब्दी के छठे-सातवें दशक में अमेरिकन नीतियों में बदलाव होने के कारण बहुत से लो ...

प्रवासी का दर्द
प्रवासी का दर्द

प्रवासी एक सामाजिक प्रक्रिया है, इसे रोका नही जा सकता। देखा जाए तो दिल्ली भी प्रवासियों ने ही आबाद किया। पाकिस्तान से आए शरणार्थियों ने इसे सही मायने में आर्थिक रूप से समृद्ध बनाया। जब भारत एक देश है तो उसमें गैर इलाकाई प्रवासी कैसे हुए? मुम्बई में सभी लोगों के लिए समान अवसर थे, बाहर के लोगों ने ...

बड़े परिवार से जुड़ना
बड़े परिवार से जुड़ना

प्रवासी शब्द हृदय में कई तरह के भाव जगाता है। इसका एक संदर्भ तो शायद वहाँ से शुरू होगा, जब हमारे दादाजी गाँव छोड़कर तहसील आए और जब पिताजी ने शहर की ओर कदम बढ़ाये। और इसके आगे अगली पीढ़ी ने समुंदर के पार जाने की परवाज ली। वैसे मेरे लिए तो प्रवास की शुरुआत तब हो गयी थी जब अपना शहर छोड़ा था। उसके बाद तो ...

अमेरिका, बच्चे और हिंदी
अमेरिका, बच्चे और हिंदी

मैं जब आज सुबह सोफ़े पर बैठ कर अपनी चाय के मज़े ले रहा था कि मेरी छह वर्ष की बेटी आई और कौतूहल से पूछने लगी, "पा, रंजना तो हम लोगों के बाद इण्डिया से अमेरिका आई थी, फिर उसे मुझसे अच्छी हिन्दी क्यूँ नहीं आती?"
मासूम सवाल था, तो मैंने यह कहके टाल दिया कि वो इण्डिया में भी इंग्लिश मीडियम स्कूल मे ...

मैं भी प्रवासी हूं
मैं भी प्रवासी हूं

बचपन से पहचान का यह सवाल परेशान करता रहा है। जब पटना शहर से गांव जाता था तो लोग ताने देते थे। बबुआ शहरी हो गया है। चूड़ा दही कम ब्रेड बटर खाता है। शहर और गांव के एक फर्क को जीता रहा। दोनों ही अस्थायी ज़मीन की तरह मालूम पड़ते थे। पटना आता था तो लगता था कि गांव जाना है। गांव जाता था तो लगता था कि छुट् ...

भारतवंशियों की आधुनिक पीढ़ी
भारतवंशियों की आधुनिक पीढ़ी

हम जब भी इंग्लैण्ड में हिंदी के विषय में बात करते हैं तो हम भावनात्मक हो जाते हैं और अपनी तर्कशक्ति को ताक पर रख देते हैं। हम यह सोच कर नाराज़गी ज़रूर ज़ाहिर करते हैं कि युनाईटेड किंगडम में कभी जीसीएससी में हिंदी एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी। आज स्कूलों में हिंदी कहीं नहीं दिखाई देती। हिंदी ...

हिंदी बीमार चल रही है
हिंदी बीमार चल रही है

हिंदी बीमार है। उसे एक सरल रोग नहीं बल्कि कई जटिल रोग हैं, और उसके तीमारदार हर तरह से बेकार हैं। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि उन तीमारदारों की दृष्टि इतनी सीमित है कि वे किसी सक्षम सेवक को पहचानते भी नहीं कि बुला सकें और यदि कोई स्वतः चला ही आये तो उसे घुसने नहीं देते हैं। हिंदी को अक्षमता ने जकड़ा ...

तरक्की की कीमत
तरक्की की कीमत

प्रवासी देशों में रहने वाले भारतीयों के हिंदी बोलने के बारे में बात करें तो हमें यह सोचना होगा कि हिंदी को हम कितना जानते हैं। देखा जाए तो हिंदी भाषा तमाम भाषाओं से मिलकर बनी है। इसमें पारसी, फारसी, टर्किश, अरबी, चीनी व पोर्तुगीज आदि भाषाएँ ऐसे घुल मिल गयी हैं जैसे दूध में चीनी या चीनी में दूध। ज ...

चीन में पश्चिम की बयार
चीन में पश्चिम की बयार

शिल्पा जो हमारी पारिवारिक मित्र हैं, के घर से लौटते वक्त उस दिन हमने एपी प्लाजा घूमने का मन बना लिया। रेलवे स्टेशन जाने के लिए हमें जिस स्टेशन से ट्रेन पकड़नी थी उसी स्टेशन पर एपी प्लाजा है। यह शंघाई का बहुत बड़ा मार्केट है जिसमें कपड़े, जूते, बैग, खिलौनों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान और ज्वैलरी सभी क ...

भारतवंशी और भारतीयता
भारतवंशी और भारतीयता

व क़्त की रफ़्तार भी अजीब है। कभी सुस्त (जब बोरियत
हो) तो कभी तेज़ (जब ख़ुशगवारी हो)। देखो ना, अभी
पिछले साल ही तो नौ जनवरी को प्रवासी दिवस मनाया था। लो, अब फिर सामने आ खड़ा हुआ। ऐ उम्र-ए-रवां आहिस्ता चल। और किसी का नहीं तो हमारी बढ़ती उमर का ही लिहाज कर। इतने सारे नये फैशन के कपड़े रखे हैं। ...

मन की हार और जीत!
मन की हार और जीत!

क ल शाम पाँच बजे बेटे के घर से अपने घर जाने के
लिए निकलने के पहले खिड़की से झाँक कर देखा तो
हर तरफ एकदम अँधेरा एवं सड़कों पर सन्नाटा दिखा। सर्दियों की शाम वो भी शनिवार को। यही माहौल होता है यहाँ कनाडा में। अपनी कार घर के पास के स्टेशन पर छोड़ आया था अतः बेटे ने बस स्टेशन तक पहुँचा दिया। ...

पुनर्विचार की आवश्यकता आस्था और उत्सव
पुनर्विचार की आवश्यकता आस्था और उत्सव

इस दुनिया में, विशेषरूप से पुराने देशों में आस्था और परंपरा के नाम पर तत्त्वज्ञान को इतने आवरणों और मौखिक व लिखित गर्द-ओ गुबार ने इस कदर ढँक लिया है कि उनके पीछे के सच को, और यदि है तो, थोड़ी बहुत तत्कालीन वैज्ञानिकता को ढूँढ़ पाना असंभव-सा है।
इसीलिए परंपरा को परम अर्थात परमपिता परमात्मा से ...

भारतीय कलाओं का स्मरण
भारतीय कलाओं का स्मरण

कल देर रात टीवी पर अलग-अलग इंडियन चेनल्स पर नृत्य प्रतियोगिताओं के कार्यक्रम देर रात तक देखती रही। वीकेंड भी था और ठंड भी कड़ाके की शुरू हो चुकी है। करने के लिए कुछ खास था नहीं। नृत्य मेरा दूसरा प्यार है लेखन के बाद। मेरी गुरु रितु ने मुझे बॉलीवुड डांस से निकालकर फिर से कत्थक में डाल दिया है। उनका ...

भिन्न षड्ज...
भिन्न षड्ज...

इस बार इंग्लैंड में लगभग दस वर्षों बाद ऐसी भयानक बर्फबारी हुई है। हमारे शहर वॉलसॉल में भी सड़कों पर आठ-आठ इंच बर्फ जमी थी। जिंदगी की सारी भागदौड़ पर प्रकृति ने विराम-सा लगा दिया था, यों कहूँ कि अपने-आप से बातचीत करने का एक अवसर दिया।
बर्फ की वजह से स्कूल, कॉलेज, दफ्तर आदि सभी बंद थे। बेटा बोर ...

कहीं बोलना बेकार तो नहीं हो गया...
कहीं बोलना बेकार तो नहीं हो गया...

अगर गहराई से विचार करें तो मनुष्य का एक अद्भुत आविष्कार भाषा है। पृथ्वी पर रहने वाले अनेक मनुष्यों ने अपने-अपने भूदृश्यों और आकाश के अनुरूप अपनी-अपनी ध्वनियाँ सुनी हैं, अक्षर बनाये हैं, शब्द गढ़े हैं, वाक्य बनाये हैं और फिर बोले भी हैं। कितनी बोलियाँ और भाषाएँ बनीं इनकी गिनती करना भी ठीक तरह से सं ...

अविस्मरणीय पड़ोसी
अविस्मरणीय पड़ोसी

लम्बी अवधि से हम किसी से परिचित होकर भी कभी- कभी नितान्त अपरिचित ही रह जाते हैं किन्तु कभी- कभी हमारा अल्पकालीन परिचय भी शीघ्र ही आत्मीयता और घनिष्ठता में बदल जाता है। जब किसी व्यक्ति के गुण, स्वभाव अथवा व्यक्तित्व का कोई अन्य पक्ष मन को इतना प्रभावित कर लेता है कि हम सहज ही उसकी ओर आकृष्ट हो जात ...

साँकल
साँकल

क्या उसने अपने गिरने की कोई सीमा तय नहीं कर रखी? सीमा के आँसुओं ने भी बहने की सीमा तोड़ दी है... इन्कार कर दिया रुकने से... आँसू बेतहाशा बहे जा रहे हैं।
वह चाह रही है कि समीर कमरे में आए और एक बार फिर अपने नन्हें मुन्ने हाथों से सूखा धनिया मुँह में रखने को कहे, ताकि उसके आँसू रुक सकें। बचपन ...

रोजनदारी की बातें
रोजनदारी की बातें

मई 6, 2000
आज जीवन का एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। दोनों छोटे बच्चों के साथ हम मिशीगन आ गये हैं। इनको यहाँ एक कम्पनी में काम मिल गया है और मैं अपनी नौकरी छोड़ कर, सब के उज्ज्वल भविष्य का सपना ले कर आयी हूँ। आठ साल के सुहास और चार साल के नीलेश के साथ नौकरी के कारण बिल्कुल समय नहीं मिल पा ...

तुलसीदास के पूर्व हिंदी साहित्य में रामायण परम्परा का उद्भव
तुलसीदास के पूर्व हिंदी साहित्य में रामायण परम्परा का उद्भव

कुछ लेखक इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सबसे प्राचीन रामकथा हिंदी साहित्य जितनी ही प्राचीन है। इस बात के पक्ष में वे चंद या चंदबरदाई द्वारा रचित "पृथ्वीराज रासो" का हवाला देते हैं। राम-चरित की यह कथा काव्य के बृहत्तम संस्करण अथवा तथाकथित बृहत् रूपांतर, जो कि नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 1904 और 1914 में ...

Download PDF
QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 10.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^