ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारतीय भाषाएं - एक विस्मृत विनाश
भारतीय भाषाएं - एक विस्मृत विनाश

जो दिखता है वही ध्यान में आता है, रहता है। जो है लेकिन आँख से दिखता नहीं, सिर्फ सुना या महसूस किया जा सकता है, सूक्ष्म है, वह ध्यान में कम या देर से आता है। सारी दुनिया में, सारे मीडिया में, सारे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर क्लाइमेट चेंज की अनंत चर्चा है। जैव विविधता पर खतरे की, पर्यावरण की ...

शिक्षा के नतीजों का सवाल
शिक्षा के नतीजों का सवाल

मैं शायद पहली कक्षा में थी जब स्कूल से एक छोटे गमले में एक पौधा लगा कर लाने का कहा गया था। उस समय प्लास्टिक के गमले चलन में नहीं थे। बड़ा गमला ले जाना संभव नहीं था इसलिए दादी ने एक गिलास में मिटटी भरकर उसमें एक पौधा लगवा कर दिया था। अपने हाथ से लगाए उस छोटे से पौधे से लगाव प्रकृति से मेरा पहला जुड़ ...

इटली की शिक्षा प्रणाली
इटली की शिक्षा प्रणाली

यह बात करीब पच्चीस वर्ष पहले की है। तब मेरा बेटा उत्तरी इटली के एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता था। यहाँ बच्चे प्राथमिक विद्यालय में छः वर्ष पूरे करने के बाद जाते हैं। एक दिन मेरी पत्नी ने बताया कि बेटे के स्कूल के बच्चों के अभिभावकों की एसोसिएशन ने एक मीटिंग बुलाई है और मुझे उसमें जाना चाहिये। मीट ...

प्रार्थना की भाषा का रंग
प्रार्थना की भाषा का रंग

नीचे वह प्रार्थना दी गई है जिसे 1964 से सभी केंद्रीय विद्यालयों में गाया जा रहा है। इसे लेकर विनायक शाह नामक वकील ने याचिका दायर की है कि हिंदी और संस्कृत की इस प्रार्थना के माध्यम से एक ख़ास धर्म का प्रचार किया जा रहा है। मूल रूप से यह एक आर्य समाजी भजन है। जिसमें "भक्ति" के स्थान पर कुछ सोच-समझक ...

पुस्तक मेला
पुस्तक मेला

हम पुस्तक मेला देखि लीन
कुछ पर्ची बांटति बुद्धिमान
कुछ धरम धुरन्धर व्यापारी
कल्लू-कबीर सब एक भाव
रचना मा तनिकौ नहीं ताव
अपनी ढपली पर अपनि बीन
हम पुस्तक मेला देखि लीन।
कुछ कुर्ता वाले देखि लीन
कुछ टाई वाले देखि लीन
कुछ जनवादी कुछ फौलादी
कुछ मेहेरबा ...

खयाली पुलाव
खयाली पुलाव

कभी सोचती हूँ कि एक किताब लिख लूँ। कम से कम इतना तो लिख ही लिया अब तक कि एक-दो पुस्तकें आसानी से छाप जाएँ। यकीन मानिए बहुत ज्यादा अनुभव नहीं है अभी लिखने का फिर भी किताब लिखने की समझ आ गयी है, ऐसा मुझे लगता है। पर दूसरे ही पल सोचती हूँ कि क्या करूंगी किताब लिखकर। जहां अखबार पढ़ने वाले शौकीनों की क ...

बढ़ते उत्सव, सिकुड़ती किताबें
बढ़ते उत्सव, सिकुड़ती किताबें

लो जी फिर आ गया पुस्तक मेला! पिछले तीन बरस वर्ष से हर साल जनवरी में। पिछले कई वर्ष के चित्र दिमाग में छितरा रहे हैं। सर्दियों की गुनगुनी धूप में सुबह ग्यारह-बारह बजे प्रगति मैदान में प्रवेश करती भीड़। ज्यादतर बच्चे, स्कूल, कॉलिज के छात्र नौजवान। छुट्टी का दिन हो तो और दस-बीस गुना ज्यादा। लेकिन यह ...

वर्णिकाओं, सुना
वर्णिकाओं, सुना

वर्णिकाओं, सुनो
तुम रात को बाहर ना निकलो
तुम घर से बाहर ना निकलो
तुम माँ के पेट से ना निकलो
तभी तुम हम से बचोगी।
हम हैं रावण
और राम तो
इस देश से विदा हो चुके हैं
हम हैं द्यूत-सभा के
दुःशासन और कर्ण
और कृष्ण तो
इस देश से विदा हो चुके हैं
...

अगर ऐसा होता
अगर ऐसा होता

अगर ऐसा होता
पवन पे सवार हम
गगन को चीरते
सरहदों के परे हम
उस मिट्टी पे उतरते

झिलमिल सितारों तले
प्यारा-सा आँगन होता
इंद्रधनुष के रंगों में धुले
प्यार ही प्यार होता

सूर्य की किरणें जहाँ
छूकर हमें जगातीं
रेत की गर्मी हमें
ठंडक पहुंचा ...

मैं ऑरगेनिक नहीं हूँ
मैं ऑरगेनिक नहीं हूँ

मैं ऑरगेनिक नहीं हूँ
मुझे फ़र्टिलाईज़र और पेस्टिसाईड देकर
बड़ा किया गया है
रात-रात जागकर
फिज़िक्स की प्रॉब्लम्स
और गणित के समीकरण
हल किए हैं मैंने
अंग्रेज़ी के कई कठिन शब्द
याद किए हैं मैंने

देखो तो सही
अभी दस साल का हुआ नहीं है
और इसे सौ तक के ...

देश-विदेश के दरम्यान
देश-विदेश के दरम्यान

तरक़्क़ी की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते हम अपने औ अपनों से कितनी दूर निकल जाते हैं, पता ही नहीं चलता। समय की बेलगाम उड़ान हमें कब, कहाँ से उड़ा के ले जाती है ये समय गुज़र जाने के बाद ही पता चलता है... इसी तरह की बहुत-सी पंक्तियाँ हम सभी ने कभी ना कभी अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर ज़रूर पढ़ी-सुनी होंगी। और शायद ...

समय के आईने में भारतवंशी
समय के आईने में भारतवंशी

सुदूर समय में भारत एक संस्कृति प्रधान देश रहा है। कभी वह अपने मूल्यों एवं आदर्शों के कारण विश्व गुरु भी रहा है। लेकिन आज दुनियाभर में अमेरिकी संस्कृति का बोलबाला है। अमेरिका आर्थिक एवं ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से काफी आगे बढ़ चुका है। सम्पूर्ण विश्व इसकी लपेट में आ चुका है। यह सत्य आर्थिक, सामाजिक ...

मसला तीन तलाक़ का
मसला तीन तलाक़ का

इतना शोर-शराबा क्यों है भाई! ग़ौर कीजियेगा हमने शोले फिल्म का मशहूर जुमला "इतना सन्नाटा क्यों है" नहीं इस्तेमाल किया। इसलिये नहीं किया क्योंकि सन्नाटा तो "था" "है" नहीं। मसला दरअसल तलाक़ नहीं शादी है। शादी ना हो तो तलाक़ का सवाल ही नहीं उठता। मगर लोग शादी करते हैं, और हमारे मौज़ी भाई तो एक से ज़्यादा ...

बेबी, खाना खा लिया?
बेबी, खाना खा लिया?

जैसे हाउस वाइफ होती हैं, याने कि वो महिला जिसकी जिम्मेदारी घर संभालना रहती है। मसलन खाना बनाना, कपड़े धोना एवं घरेलू कार्य करना। वह कहीं काम पर नहीं जाती है। उस पर कमाने की जिम्मेदारी नहीं होती है। काम पर जाना और कमा कर लाना पति का काम होता है। समय के साथ-साथ थोड़ी परिभाषा बदली है जिसमें अब हाउस वा ...

वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-20 लंका में सीता अनुवाद : संजीव त्रिपाठी
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-20 लंका में सीता अनुवाद : संजीव त्रिपाठी

रामायण की कहानी पात्र सीता के इर्द-गिर्द बुनी गई है। ऐसा संभव है कि कहानी में राम की महानता की ख्याति हो, पर वाल्मीकि जीवन में नारी की महत्ता को दर्शाना चाहते हों? जब उन्होंने "नारद" से उस पुरुष के बारे में बताने को कहा जिसमें अनेकानेक उत्कृष्ट पुरुषवादी गुण हों, शायद उनको आभास था कि नारी के चरित ...

स्वभाव, सम्बन्ध, सभ्यता
स्वभाव, सम्बन्ध, सभ्यता

हम एक बोधमय नित्यता में सदा रहते आये हैं। इसका अनुभव हमें अपने स्वभाव के अनुरूप हुआ करता है। हमारा यह स्वभाव हमें मिली जन्मजात प्रकृति के न्याय से स्वतः संचालित है। इसे हठपूर्वक बदला तो नहीं जा सकता पर बोधमय नित्यता के आइने में अपनी ही प्रतिपल मिटती जाती देह को निहारकर उसे अपने जन्म और मृत्यु के ...

"रीछ" के बहाने कुछ यादें

दूधनाथ सिंह की वे कहानियां पाठकों का खास ध्यान खींचती हैं जो दिलचस्प किन्तु प्रतीकात्मक होने के कारण उलझी हुई, जटिल और चमत्कारपूर्ण होती हैं। उनकी कहानी "रीछ" अपनी प्रतीकात्मकता, फन्तासी तथा यौन-चित्रों-संवादों के कारण पर्याप्त विवादग्रस्त और चर्चित हुई। इसमें मध्यवर्गीय व्यक्ति के सामने उपस्थित ...

हुनर की अभिव्यक्ति
हुनर की अभिव्यक्ति

दुनिया के इतिहास में हुनर हमेशा परम्परा सम्मत ही रहे हैं। यह ज़रूर है कि समय के अनुरूप उपकरण गढ़ने वाली दुनिया में उनकी नयी-नयी अभिव्यक्तियाँ होती रही हैं। आदमी अदिकाल में भी घड़ा बनाता था और उसे आज भी अपना पानी भरने के लिये घड़े की ज़रूरत है। भले ही उसका नाम और रूप अब बदल गया हो। वो मिट्टी का न होकर ...

हिन्दी साहित्य का जर्मन अनुवाद
हिन्दी साहित्य का जर्मन अनुवाद

मनुष्यों की परिस्थितियों को आपस में समझने के लिये, उनके शांतिपूर्ण, अहिंसात्मक सहजीवन के लिये साहित्य के अनुवादों का बहुत बड़ा महत्व है, क्योंकि केवल एक-दूसरे को समझने में अपरिचित, अन्य प्रकार के तथ्यों का अस्वीकारण कम हो जाता है। पारस्परिक समझ के काम में साहित्य के अनुवाद बहुत बड़ा योगदान दे सकते ...

आध्यात्म इस लोक का
आध्यात्म इस लोक का

आमतौर पर जब भी आध्यात्म की बात चलती है तो उसे वैराग्य, धर्म और परलोक से जोड़कर देखा जाता है। अलग-अलग विद्वान इस शब्द का अपने-अपने सन्दर्भ के हिसाब से व्याख्यान करते है और वह आम लोगों की समझ से परे होता है। इस भौतिक जगत में रहते हुये अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुये आध्यात्म के सिद्धांत का व ...

कथा सम्राट प्रेमचन्द से अल्प असहमति
कथा सम्राट प्रेमचन्द से अल्प असहमति

हिन्दी साहित्य से परिचित भला ऐसा कौन व्यक्ति होगा, जिसके मन में महान कथाकार प्रेमचन्द के प्रति असीम आदर न हो। मेरा भी है परन्तु उनकी कुछेक रचनाएं, कतिपय चरित्र-चित्रण खटकते रहे हैं लम्बे समय से...
उनकी प्रसिद्ध कहानी "कफन" को लीजिए। प्रमुख पात्र, बाप बेटे, निम्न वर्ग के हैं - धीसू और माधव। द ...

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