ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2018 apr
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लोकतंत्र और नौकरशाही
लोकतंत्र और नौकरशाही लोकशाही और नौकरशाही को लेकर इस समय देश और प्रदेशों की सियासत गरमाई हुई है। दिल्ली में केजरीवाल बनाम एलजी की राजनीतिक लड़ाई जगजाहिर है। विभिन्न प्रदेशों में लोकशाही और नौकरशाही के बीच जंग छिड़ी हुई है। आजादी के बाद हमारे संविधान निर्माताओं ने देश में
लॉन्ग मार्च का संदेश
लॉन्ग मार्च का संदेश विगत माह अखिल भारतीय किसान सभा के नेतृत्व में किसानों का लॉन्ग मार्च महाराष्ट्र सरकार के लिखित आश्वासन के बाद खत्म हो गया। हाल के बरसों में पहली बार इस तरह के विशाल आंदोलन की समाप्ति बहुत शांतिपूर्ण रही है। इसके लिए राज्य सरकार और किसान दोनों की प
उच्च शिक्षा की चुनौतियाँ
उच्च शिक्षा की चुनौतियाँ भारत में शिक्षा को एक रामबाण औषधि के रूप में हर मर्ज की दवा मान लिया गया और उसके विस्तार की कोशिश शुरू हो गई बिना यह जाने बूझे कि इसके अनियंत्रित विस्तार के क्या परिणाम होंगे। सामाजिक परिवर्तन की मुहिम शुरू हुई और भारतीय समाज की प्रकृति को देशज दृ
शिक्षा के माध्यम की भाषा
शिक्षा के माध्यम की भाषा भा षा शिक्षण का क्षेत्र अनुप्रायोगिक है। इसमें विभिन्न विषयों के शिक्षण के लिए जिस भाषा का प्रयोग होता है, वह शिक्षा का माध्यम कहलाती है। शिक्षा का माध्यम अपनी मातृभाषा भी हो सकती है और दूसरी भाषा भी। इसलिए भाषा किसी-न-किसी उद्देश्य या प्रयोजन के
अव्दैत का विस्तार और संसार
अव्दैत का विस्तार और संसार कभी विकल होकर कहने का मन होता है कि अव्दैत की धारणा कुछ विरले ज्ञानियों की जिद है और संसार को देखकर लगता है कि वह व्दैत में ही जीने की जिद बांधे हुए है।कोई उत्प्रेरक जरूर है जिसके कारण इतना बड़ा जीवन व्यापार चल रहा है पर विरले ज्ञानियों की नज
विसर्जन से पहले
विसर्जन से पहले मेरे सामने मेरे पति की अस्थियाँ रखी हैं। मैंने उसे मिट्टी के एक सुंदर लोटेनुमा कलश में रक्खा है। कलश ढूंढ़ने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किए थे। भला हो मेरी कलाकार मूर्तिकार मित्र अनीता का जिसने मुझे कलश दिया। विदेश में और वह भी स्वीडेन में बहुत मुश
मैं वही पुरबिहा हूं जहां भी हूं
मैं वही पुरबिहा हूं जहां भी हूं केदारनाथ सिंह समकालीन हिंदी कविता के वरिष्ठतम कवियों में हैं। कुंवर नारायण को छोड़कर दूसरा नाम तत्काल याद नहीं आता जो इस वरिष्ठता और निरंतर सक्रियता में उनसे प्रतिस्पद्र्धा कर सके। उनका पहला कविता संग्रह "अभी बिल्कुल अभी" आए आधी सदी से ज़्यादा समय ह
काल
काल कलयति संख्याति सर्वान् पदार्थान् स कालः। जो जगत् के सब पदार्थों और जीवों को आगे बढ़ने को बाध्य करता है और उनकी संख्या (आयु) करता है, वही काल है।"कल संख्याने" धातु में "अच" प्रत्यय करने से "काल" शब्द बनता है। "कल" का दो अर्थ है - 1. गिनना या ग
सफ़र जारी है, दुश्मनो-यारो!
सफ़र जारी है, दुश्मनो-यारो! साहित्य की चादर लम्बी थी मैंने व्यंग्य के फटे में टांग अड़ा दी। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, शंकर पुणताम्बेकर, अशोक शुक्ल, श्रीकांत चौधरी व अन्य कई लेखकों की रचनाएँ व पुस्तकें ढूंढ-ढूंढ कर पढ़ना शुरू किया। कुछ लघु पत्रिकाएं भी पढ़ीं। जो पा
कन्यादान की परम्परा के आशय
कन्यादान की परम्परा के आशय भारतीय परम्परा में कन्यादान के संबंध में विचार- विमर्श करने से पूर्व कुछ प्रश्नों से सहज ही सामना होता है, मसलन - दान क्या है? और क्यों किया जाता है? दान करने के बाद उस वस्तु या प्राणी का दान करने वालों से क्या संबंध रह जाता है?पहली बात यह ह
बहुत नाइंसाफी है
बहुत नाइंसाफी है देखिये साहब नाइंसाफी तो हुई है। इस बात से क़तई इंकार नहीं किया जा सकता कि समाज के एक समूचे वर्ग के साथ अन्याय किया गया है। कोई भी व्यक्ति पैदाइशी दलित नहीं होता। नेक इरादे से किया गया एक वर्गीकरण सियासत के लालच का शिकार हो गया। जी हाँ, गये वक़्त के
लंका में बन्दिनी सीता का संताप
लंका में बन्दिनी सीता का संताप वाल्मीकि मन के ज्ञाता हैं। ऐसा संभव है कि उनके समय मन की पीड़ा के बारे में सार्वजनिक विचार-विमर्श करने में समाज सक्रिय हो। और ऐसा भी संभव है कि वास्तविकता पर आधारित कहानी का आंतरिक विश्लेषण करना उस समय सराहनीय माना जाता रहा हो। भारतीय सभ्यता का यह
नई सोच
नई सोच कभी उन्हें सीने से लगा कर हम नींद में खो जाते लफ़्ज़-लफ़्ज़ चुपचापसुनहरे ख्वाब बन जातेसफ़ा पलटने का भी कुछ ख़ास ही था मज़ा पाक-पकवानों से अलग वो स्वाद था चखानीमरोज़ की धूप मेंमिलने का बहाना बना ज
गंगा-जमनी तहज़ीब के कमजोर पक्ष
गंगा-जमनी तहज़ीब के कमजोर पक्ष यह देश ईसा पूर्व से ही विदेशी आक्रमणों को झेलता रहा है और बार-बार अपने छोटे-बड़े शासकों की मूर्खता, फूट और स्वार्थ के कारण पददलित होता रहा है। कोई पाँच छह हजार वर्ष पहले घुमंतू आर्य आए और यहाँ की नदी घाटियों में बस गए और यहीं के हो गए। ईसा से तीन श
एक दो तीन : सुभाष पाठक
एक दो तीन : सुभाष पाठक एक किसी की शक़्ल से सीरत पता नहीं चलतीके आब देख के लज़्ज़त पता नहीं चलतीख़ुदा का शुक्ऱ है कमरे में आइना भी हैनहीं तो अपनी ही हालत पता नहीं चलतीछलकते अश्क सभी को दिखाई देते हैंकिसी को ख़्वाब की हिजरत पता नहीं चलती
प्रकृति, भाषा और हम
प्रकृति, भाषा और हम आमतौर पर "प्रकृति" शब्द का अर्थ पर्यावरण मान लिया जाता है। पर अगर हम भारतीय दर्शन पर एक सामान्य दृष्टि डाल सकें तो यह भलीभाँति प्रतीत होता है कि प्रकृति का एक गहन अर्थ समूची सृष्टि का स्वभाव भी है। सृष्टि पंच तत्वों से बनती है जिनमें धरती, आकाश, अ
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