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2017 OCT
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यादों के पार
यादों के पार एक सुवासित परिचित झोंकाआ कर मुझे निहाल कर गयाकस्तूरी सा उच्छवास वहदग्ध हृदय को सिक्त कर गया।इतने दिन मैं सब से छुप करयह संदूक भरा करती थीअब बस शायद यही मेरा थामैं इन सब के बीच कहाँ थी?इक
चूल्हा
चूल्हा मैं चूल्हा हूँ सदियों से जल रहा हूँ झुलस रहा हूँ लेकिन उफ़मेरे शब्दकोश में नहीं है सूरज भी मेरी बराबरी नहीं कर सकता क्योंकि वह केवल दिन में जलता है और मैं दिन-रात झेलता हूँ आघात भयानक आग क
काश कि ऐसा हो!
काश कि ऐसा हो! और हाँ, वो ख्वाब होगा मानीखेजउस ख़ास समय काजब सूर्य का ललछौं प्रदीप्त प्रकाशहोगा तुम्हे जगाने को आतुरहलके ठन्डे समीर के कारवां में बहते हुएतुम्हारे काले घने केश राशि को ताकता अपलकउसमें से झांकता तुम्ह
बरसेंगे क्या फ़िर से अब
बरसेंगे क्या फ़िर से अब लगता है छँट तो गए हैं बादल आसमाँ से कहीं कहीं! जाने क्या पैदा हो गंदम या ख़र पतवार पर बरसे तो थे वोह बादल बे हिसाब।रज़ामन्दी तो थी पूरी की पूरी  हालाँकि हर तरह ऊपर वाले की
असंतोष मुझको है गहरा
असंतोष मुझको है गहरा सोचता हूँ, यह अंत है खेल काया एक और खेल है अंत मेंया तैरते-उतरतेपुण्य और पाप को संकेतित करतीयह अंतिम पलों की लीला है क्याकि हवा में घुल-घुल करप्रकाश-बिम्ब-सेस्पष्ट हो रहे हैं मानो अब अर्थ व्यर्थअजनबी
वो भ्रम मरता कुआँ
वो भ्रम मरता कुआँ वो भ्रमइंसान सवार हैनिश्चित अनिश्चित के नाव पेअपने पराये के बीचकिस पर विश्वास करेमुश्किल है कहनासमय का फेर हैसब मुखौ’टों का खेल हैकिसी ने देखा है मुखौटों के पीछेका वह चेहरा!है
गंगा के प्रति आस्था बालगृह
गंगा के प्रति आस्था  बालगृह गंगा के प्रति आस्था आस्था के प्रदर्शन में अब बदलाव होना चाहिए पुष्प, दीप, वस्त्र के विसर्जन का रुकाव होना चाहिए।विसर्जित पुष्प, दीप, वस्त्र आखिर जाते कहाँ हैंइस तथ्य पर भी तो गहन विचार होना चाहिए।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिंदी-निहिताथ
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिंदी-निहिताथ बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ क्या हिंदी उन्नति के लिए वास्तव में कुछ योगदान कर रही हैं? माफ़ कीजिएगा सच यही है कि कंपनियाँ केवल और केवल अपने मार्केटिंगऔर बाजार के हिसाब से स्ट्रेटेजी बनाती हैं और यदि उनमें फायदा दिखता है और मिलता है, तभी
वर्णमाला, भाषा, राष्ट्र और संगणक
वर्णमाला, भाषा, राष्ट्र और संगणक भारतीय भाषा, भारतीय लिपियाँ, जैसे शब्दप्रयोग हम कई बार सुनते हैं, सामान्य व्यवहार में भी इनका प्रयोग करते हैं। फिर भी भारतीय वर्णमाला की संकल्पना से हम प्रायः अपरिचित ही होते हैं। पाठशाला की पहली कक्षा में अक्षर परिचय के लिये जो तख्ती टाँगी होती ह
नारायण! नारायण!!
नारायण! नारायण!! एक हाथ में तानपूरा, दूसरे में या तो खड़ताल या कमंडल (ज़रूरत पर निर्भर करता है)। अधखुली आँखों में ज्ञान की रौशनी और ज़ुबान पर भगवान का नाम। कौन से भगवान का - यह निर्भर करता है उनकी आस्था पर - हे भगवान, अल्लाह हो अकबर, सत श्री अकाल, राधे-राधे — व
देश को खोकर कविता
देश को खोकर कविता आज सुकवि की मुश्किल यह है कि वह मानुषी जनतंत्र की माया के सामने इतना निहत्था और असहाय है कि वह किससे शिकायत करे।मूर्खो, देश को खोकर ही मैंने प्राप्त की थी यह कविता --दूर दिल्ली से श्रीकान्त वर्मा की आवाज सुनाई देती है -- मगर खबरद
अहंकार और मनुष्य
अहंकार और मनुष्य प्रभु की महिमा अपरम्पार है, ये जीवन भर कहते और सुनते आये हैं, पर गम्भीरता से विचार करने पर उनकी दूरदर्शी, अनोखी सूझ-बूझ पर अचम्भा अवश्य होता है कि कैसे उन्होंने हर स्थिति और समस्या की कल्पना कर के उसके निवारण की विधि बनाई है।प्रभु ने मनुष्य
कैसी सेवा - कैसा स्वास्थ्य
कैसी सेवा - कैसा स्वास्थ्य जिन लोगों का स्वास्थ्य बीमा नहीं है और जो गरीब भी हैं उनकी बड़ी दुर्गति है। जिनके पास स्वास्थ्य बीमा है उन्हें भी इलाज़ के कुल खर्च का बीस प्रतिशत देना होता है, शेष बीमा कंपनी देती है।विगत शताब्दी के अंतिम दशक के प्रारंभ (199
भाषा का विश्वरूप और हमारा सॉफ्टवेयर
भाषा का विश्वरूप और हमारा सॉफ्टवेयर भारत में एक दार्शनिक पद्धति यह भी है कि पूरा विश्व शब्द रूप है। हमारे ज्ञानियों और भक्तिकाल के कवियों ने सदियों तक शब्द साधना की है तथा शब्द को पूरी सृष्टि के केन्द्र में जगह दी है। वे अपने अंतज्र्ञान से यह समझ सके कि अगर शब्द नहीं तो यह विश्व भी
भारतीय बाज़ार में सस्ते चीनी उत्पाद
भारतीय बाज़ार में सस्ते चीनी उत्पाद दो देशों के बीच राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंध के बाद सबसे महत्वपूर्ण होता है- व्यापारिक संबंध। भारत एवं चीन के मध्य दो हज़ार से भी ज्यादा समय से मजबूत व्यापारिक संबंध बना हुआ है, जो आज भी निर्बाध रूप से जारी है। वर्तमान में चीन भारत का सबसे बड़ा व्या
जीवन की जरूरत : आध्यात्मिक पर्यटन
जीवन की जरूरत : आध्यात्मिक पर्यटन भारत ने सदा ही "अतिथि देवो भव" के संस्कारों का परिपोषण किया है। आध्यात्मिक पर्यटन स्थल से तात्पर्य किसी धर्म या धार्मिक व्यक्ति से संबंधित स्थल नहीं होता अपितु ऐसा स्थल, जहाँ व्यक्ति अपनी आंतरिक चेतना के विकास की प्राप्ति करता है। आध्यात्मिकता-प्र
दूसरी शादी
दूसरी शादी मॉम क्या आप दूसरी शादी करोगी? दूसरी शादी के बारे में पूछने के बहाने सिद्धार्थ दरअसल कई बातें नंदिता को कह रहा था। जैसे कि, ...भले ही पापा दुनिया से चले गये हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि जिंदगी खत्म हो गयी है। ...आप भले ही पचपन की हो, अब भी मुश्किल
पाषाण नगरी पेट्रा
पाषाण नगरी पेट्रा इजराईल-जोर्डन की हाल की यात्रा के अंतिम चरण में हमें विश्व के नए सात अजूबों में से एक पेट्रा के दर्शन करना थे। इस पूरी ट्रिप में लगातार आठ दिन, हर सुबह टूर मैनेजर के अलसुबह के वेक अप काल, फटाफट ब्रेकफॉस्ट और शटाशट डिपार्चर का अनाउंसमेंट सुनते, करत
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