ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2017 NOV
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निर्णायक मोड़ पर सभ्यता
निर्णायक मोड़ पर सभ्यता भारत की सभ्यता के "हिमालय" पर आक्रमण करने वाली कोई बाहरी या विदेशी ताकत नहीं, बल्कि यह भारत की अपनी बात है, अंदरूनी बात है और यह अंदरूनी बात बड़ी सशक्त और ताकतवर है। यह इसकी विशेषता भी है और यह उसकी कमजोरी भी है। यह शक्ति या ताकत है- धर्म और धर्म क
कुहासे में है धर्म
कुहासे में है धर्म भारत के सामाजिक जीवन में प्राचीन काल से ही धर्म का विशेष स्थान रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि धर्म सामाजिक जीवन का नियामक रहा है। भारतीय संविधान सभी धर्मावलम्बियों को समान मूलभूत अधिकार देता है। सभी धर्मों को एक ही धरातल पर स्वीकार करने वाली
आधुनिक समय में धर्म और पाखंड
आधुनिक समय में धर्म और पाखंड प्रारंभ में आदमी जंगल में रहता। शिकार करता और अपना पेट भरता। ये जंगल का कानून था। समय सबको बदलता है। इस व्यवस्था में बदलाव शुरू हुआ। पहले महिला-पुरूष अकेले थे। इसके बच्चे हुए। इनकी संख्या बढ़ी। धीरे-धीरे परिवार बनने बना।परिवार बनने के साथ इस
आचरण और दिखावे का द्वंद्व
आचरण और दिखावे का द्वंद्व भारत के एक क्रांतिकारी साहित्यकार ने कहा था : "सभी धर्म असत्य हैं, मिथ्या हैं, आदिम दिनों के कुसंस्कार हैं; विश्व-मानवता के इतने बड़े शत्रु और कोई नहीं।" तो अवश्य इसका कारण था। कड़वे शब्द होने के बावजूद भारत में पाखंडपूर्ण धार्मिकता को देख कर बड़ी दृ
ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है एक ज़माने में इंग्लैंड का चर्च वहां के राजा से भी ज़्याद शक्तिशाली हुआ करता था। इतना ज़्यादा कि 1936 में एडवर्ड आठ को अपनी पसंद की लड़की (वालिस सिम्पसन) से शादी करने के लिये ताज-ओ-तख्त छोड़ना पड़ा। हाँ साहेब, हमारी खाप पंचायत से भी अधिक ख़तरनाक था चर्च।
धर्म के बाबा और बाबाओं का धर्म
धर्म के बाबा और बाबाओं का धर्म भारत हमेशा से ही एक धर्मपरायण और धर्मनिष्ठ देश रहा है। आज भी है। फर्क केवल इतना है कि धर्म के प्रति जन जन में आस्था पैदा करने के लिए आज इसकी परिभाषा को सरल-सहज कर दिया गया है। धर्म वह है जो धारण किया जाए। अत: आप जो भी धारण कर लेते हैं वही धर्म हो
नदी
नदी एक थी नदीकिनारे पर था मेरा घर निहारता था उसका वेग सुनता था उसकी कलकल अब घर घिर गया है नदी की कब्र पर बनी इमारतो से एक थी नदी हमें बाढ़ से महफूज़ रखने ले जाती थी बारिश का पानीगांव गलियों, मोहल्ल
अरण्यगान
अरण्यगान तुम गाओ, मैं मुरली बजाऊँतुम्हारा गीत है सदाबहारकल जब हम रहें न रहेंमेरी मुरली पर बजेगा तेरा ही गीत क्या तुम रह पाओगे इस अरण्य मेंमेरी तरह संसार के कोलाहल से दूरपहाड़ी नदी का पीछा करते-करतेखड़े चट्टानों पर
नए रूप की हिन्दुस्तानी
नए रूप की हिन्दुस्तानी अभी हाल में ही बेंगलुरु मेट्रो के उद्घाटन के मौके पर अप्रत्याशित घटना सुनने को आई। वहां के स्टेशनों पर हिन्दी में लगे साइन बोर्डों का वहां के स्थानीय लोगों ने यह कहकर विरोध शुरू कर दिया कि यह हिन्दी का वर्चस्ववाद है। यहां हिन्दी का क्या काम? जब दि
हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर ढाई विचार
हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर ढाई विचार हिन्दी की सेवा करने का मतलब क्या है, क्या होना चाहिये? हम किसी भाषा की सेवा क्यों करें? जब मैं इस बात पर विचार करना शुरू करता हूँ, तो हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक निबंध याद आता है। द्विवेजी जी कितने बड़े विद्वान थे, उन्हें साहित्याचार्य या गुरु के र
गवाही और जिजीविषा का कवि
गवाही और जिजीविषा का कवि हिंदी जगत में कुँवर नारायण का परिचय कराने की आवश्यकता नहीं। वे तो हिंदी कविता के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं, उनको दुनिया की अनेक भाषाओं में अनूदित किया गया है, भारत और विदेशों में उत्कृष्ट पुरस्कारों से वे सम्मानित हो चुके हैं। पर सबसे महत्त्वप
मृत्यु और संस्कृतियों की रूपांतरण क्षमता
मृत्यु और संस्कृतियों की रूपांतरण क्षमता समकालीन हिंदी कवियों में सम्भवतः सर्वाधिक सम्मानित कवि कुँवर नारायण इस साल नब्बे वर्षीय हो जाएंगे। दक्षिण दिल्ली के चित्तरंजन पार्क स्थित उनका आवास अब भी रचनाकारों, आलोचकों एवं अन्य बुद्धिजीवियों की गोष्ठी का स्थल बना हुआ है। अपनी पीढ़ी के अंतिम बच
कवि, समय और भाषा
कवि, समय और भाषा हिंदी के साहित्य प्रेमियों के लिये यह एक सुखद अनुभूति होनी चाहिये कि इस भाषा के अप्रतिम कवि श्री कुँवर नारायण नब्बे वर्ष की आयु पार कर रहे हैं। पर इसी के साथ एक दु:खद स्थिति भी बनी हुई है कि वे पिछले तीन महीनों से अचेत अवस्था में पड़े हुए हैं। गर्भ
समृद्धि व संगणक का भाषाई समीकरण
समृद्धि व संगणक का भाषाई समीकरण पिछले महीने मुझे आयआयटी पवई के एक विद्यार्थी समूह को संबोधित करना था। वे ग्रामीण इलाकों की समृद्धि के लिये कुछ करना चाहते हैं और हमारा विषय भी वही था - ग्रामीण प्रगति के रास्ते क्या-क्या हो सकते हैं। एक प्रश्न यह भी था कि वैश्विक बाजार में हम अपना
श्रुतियों की भोर
श्रुतियों की भोर श्री नरेश मेहता और जगदीश गुप्त के साथ जबलपुर में कविता सुनाने का अवसर मिला। नरेश मेहता की कविताएँ सुनकर लगा कि कविता में श्रुतियों की भोर हो रही है जैसे आधुनिक कविता की भूमि पर वैदिक ऋचाएँ उतर रही हों। कविता पाठ के बाद दोनों कवियों से गपशप करने का
सपने और सौदागर
सपने और सौदागर मॉस्को से वापिस लौटते वक्त इस बार कबीर बहुत उदास था। बहुत कुछ बदल गया। नादिया अभी- अभी उसको एयरपोर्ट के अंदर तक छोड़ कर गई थी। जाते वक्त उसने कबीर को कस कर बाहों में लिया और मुँह चूमा। बिछुड़ते समय उसकी आंखों में एक अजीब उदासी थी। कबीर को लगा शायद य
बंदूक की संस्कृति
बंदूक की संस्कृति वैसे तो जब संस्कृति के नाम पर "बंदूक-संस्कृति" शब्द तक को स्वीकृति मिल गई तो फिर शेष रह ही क्या गया? ऐसे में प्रदर्शन, आत्मप्रशंसा, झूठ, बड़बोलापन, लम्पटता, धोखा, जुमलेबाजी तो बहुत छोटी बातें हैं। ऐसे में भिक्षा, चोरी, डाका, देह-विक्रय, नकली माल बन
सीता की खोज में लंका में हनुमान वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-19 अनुवाद : संजीव त्रिपाठी
सीता की खोज में लंका में हनुमान वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-19 अनुवाद : संजीव त्रिपाठी रामायण की कहानी में वाल्मीकि का सबसे प्रशंसनीय और कलात्मक योगदान हनुमान का पात्र है। हनुमान पूर्ण विकसित मानव नहीं, अपितु वानर प्रजाति के थे। वानर एक ऐसी प्रजाति है जो मनुष्य नहीं है लेकिन मनुष्य के तुल्य बुद्धिमान और अंतज्र्ञानी है। संभवतः कवि एक
व्यंग्य के त्रिदेव
व्यंग्य के त्रिदेव चौंसठ कलाओं में पारंगत त्रिदेवों पर 64 अध्याय लिखवा देने के बाद डॉ. महावीर को संतोष तो हो गया कि यह शोधग्रंथ ऐतिहासिक बन पड़ा है और पीएचडी डिग्री के लिये सर्वथा उपयुक्त भी। अंगदको भी अच्छा लगा कि कलयुगी देवों ने अंतत: स्वीकार कर ल
जबकि जीवन इसकी इजाज़त नहीं देता था
जबकि जीवन इसकी इजाज़त नहीं देता था 2008 के दिनों में रहते हुए कुछ शब्द: कुछ नोट्स - एक - कई बार कोई तुम्हारी सहायता नहीं कर पाता। न स्मृति, न भविष्य की कल्पना और न ही खिड़की से दिखता दृश्य। न बारिश और न ही तारों भरी रात। न कविता, न कोई मनुष्य और न ही कामोद्दीपन।स
कवि सम्मेलन के बहाने
कवि सम्मेलन के बहाने बड़े दिनों बाद कवि सम्मेलन और मुशायरा सुनने का सौभाग्य मिला। अनगिनत यादें ज़ेहन में दौड़ गईं। देवास के डायमंड चौराहे पर कई बड़े कवियों को सुनने का सुख मिला है। खूब जाते थे सुनने के लिए, इन्हीं कवि सम्मेलनों ने हमें परिवार, समाज और देश के लिए सोचने की
इन्सेफेलाइटिस से शिशुओं की मृत्यु
इन्सेफेलाइटिस से शिशुओं की मृत्यु विगत दिनों उत्तरप्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र में जापानी इन्सेफेलाइटिस (JE) से बच्चों की मृत्यु के प्रतिदिन मिलते रहे समाचारों ने विश्व भर को विचलित किया। अतः देश-विदेश में भारत की स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगाँठ का उल्लास भी थोड़ा धूमिल ही रहा। देश व उत्
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