ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मेरी पसंदीदा हिन्दी फिल्में
मेरी पसंदीदा हिन्दी फिल्में

यहाँ से पचास-पचास कोस दूर गाँव में जब बच्चा रात को रोता है, तो माँ कहती है बेटे सो जा, सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा। शोले फिल्म का ये संवाद आज भी लोगों की जुबान पर तरोताज़ा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारतीयों के लिए रोटी, कपड़ा, मकान, परिवार, संस्कृति के बाद फिल्मों का ही नंबर आता है। ...

कुछ बेमिसाल फ़िल्में
कुछ बेमिसाल फ़िल्में

फ़िल्में मनोरंजन करती हैं हमें हंसाती हैं रुलाती हैं पर काफी कुछ बता जाती हैं और बहुत कुछ सिखा भी जाती हैं। वैसे तो भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में बनती हैं। हर साल फ़िल्में आती जाती रहती हैं पर कुछेक ही ऐसी हैं जो बरसों बीत जाने पर भी भूलती नहीं। कई बार कुछ ऐसे वाकया भी जुड़ जाते हैं जो भुल ...

हिंदी फिल्मों के विविध आयाम
हिंदी फिल्मों के विविध आयाम

दुनिया में भारत की पहचान जहां भारतीय संस्कृति एवं कठिन परिश्रम को लेकर होती है। वहीं विश्व में हिंदी सिनेमा यानी बॉलीवुड को भी खूब सराहा जाता है। हिंदी सिनेमा ने भारतीय संस्कृति को विश्व में भलीभांति प्रस्तुत किया है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों ने इसे हिंदी सीखने के माध्यम के तौर पर भी अपन ...

हिंदी सिनेमा देश विदेश में
हिंदी सिनेमा देश विदेश में

रोटी, कपड़ा, मकान के बाद अगर भारत में आम आदमी के जीवन में किसी बात का बड़ा स्थान है तो वो है फिल्में! या कहें की दूसरी तरफ भारत  का सॉफ्ट पावर है यहां का सिनेमा। कम शौकीन भी कम से कम प्रसिद्ध फिल्में तो जरूर देखता है फिर शौकीनों की बात ही अलग है। एक ही फिल्म  को पांच-पांच बार भी देखकर मन ...

सरोकारों से दूर होता सिनेमा
सरोकारों से दूर होता सिनेमा

भरत मुनि ने नाटक को काव्य अर्थात साहित्य की सभी विधाओं में सर्वश्रेष्ठ माना है क्योंकि इसमें नृत्य, संगीत, अभिनय, संवाद, दृश्य आदि चेतना को प्रभावित करने वाले सभी उपादानों का समावेश होता है। उसी की तर्ज़ पर आज सिनेमा संचार, संवाद और सम्प्रेषण की सभी विधाओं को सम्मिलित रूप तो है ही, साथ ही अत्याधुन ...

फिल्में क्यों बनाई जाएँ
फिल्में क्यों बनाई जाएँ

अपने शुरूआती दौर से ही सिनेमा आम आदमी को सपनों की दुनिया में ले जाने का सस्ता, सुलभ साधन रहा है। मनोरंजन के अन्य साधनों की तुलना में सिनेमा अधिक लोकप्रिय भी है। भारत में सिनेमा के आरम्भिक काल में धार्मिक कथा-चित्रों का अधिक निर्माण किया गया। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को बचाए रखने के साथ-साथ धार् ...

सिनेमा की मेरी की दुनिया
सिनेमा की मेरी की दुनिया

एक बार मैं ऑफिस में अपने हमवतन से "मोगाम्बो खुश हुआ" संवाद पर कुछ बात कर रही थी। तभी मेरे नैरोबी में रहने वाले दोस्त ने मिस्टर इंडिया का नाम लिया। मुझे आश्चर्यचकित देख कर उन्होंने बताया कि अफ्रीका में हिंदुस्तानी सिनेमा इतना प्रचलित है कि हर हिंदी फिल्म व उनके गाने वहाँ की भाषा में अनूदित किए जात ...

फ़िलमियाँ बुखार
फ़िलमियाँ बुखार

मुझमें फ़िल्मी बुखार के कीटाणु विरासत में मौजूद कब पाए गए, ख़बर नहीं।
हाँ, इतना तो था कि हम बड़ों से आँख छिपाकर फ़िल्मी स्टाइल में ज़ुल्फें,
नुक्कें निकालते और बनते सँवरते। इस तरह पनाह दिए फ़िलमियाँ बुखार के
कीटाणुओं के फलने-फूलने के लिए माक़ूल माहौल मुहैया कराते।
कोई जान-बूझकर न ...

सपने न हों तो क्या कीजे
सपने न हों तो क्या कीजे

मेरा सौभाग्य कहिए कि दुर्भाग्य कि हिन्दी फ़िल्मों का मेरे जीवन पर विशेष प्रभाव रहा है। भारतीय संस्कृति क्या है, मेरा इसमें क्या किरदार है, यह मुझे हिन्दी फ़िल्मों ने ही सिखाया है। राखी, होली, दीवाली आदि त्योहारों की पहचान और महत्ता हिन्दी फ़िल्मों की ही देन है। गीत-संगीत की तरफ़ जो मेरा रुझान है, उसक ...

मणि कौल का सिनेमा और हिंदी
मणि कौल का सिनेमा और हिंदी

मणि कौल की अधिकतर फिल्में हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर ही केंद्रित/आधारित हैं। "सतह से उठता आदमी" (मुक्तिबोध) "उसकी रोटी" (मोहन राकेश) और "नौकर की कमीज" (विनोद कुमार शुक्ल) का ध्यान इस सिलसिले में सहज ही हो आता है। फिर "दुविधा" (विजयदान देथा) भी है - राजस्थानी/हिंदी में। इस तथ्य के स्मरण के साथ ...

हिंदुस्तानी सिनेमा की बदलती भाषा
हिंदुस्तानी सिनेमा की बदलती भाषा

हिंदुस्तानी सिनेमा के सफर को देखें तो हमें इसमें अवसर और रंगा-रंगी की बेशुमार झलकियाँ मिलती हैं। जब 1913 में पहली बार दादा साहब ने बिना आवाज के फिल्म "राजा हरिश्चंद्र" बनाई थी तो उन्हें उस वक्त यह गुमान भी न होगा कि अगले सौ सालों में हिंदुस्तानी सिनेमा करोड़ों लोगों के दिलचस्पी और इंटरटेनमेंट का ज ...

प्रतीक्षा है बच्चों के सिनेमा की
प्रतीक्षा है बच्चों के सिनेमा की

नौसाल का एक भाई अपनी सात साल की बहन की चप्पल बाजार में खो देता है, जब वह उसे मरम्मत करवाकर लौट रहा होता है। ढूँढने की अनथक कोशिश कर अंततः उदास, सहमा भाई घर लौटता है। उसे अहसास है कि वह टूट चुकी चप्पल उसकी बहन के लिए कितनी जरूरी थी, क्योंकि उसके पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि वे उसके लिए दूसरी ...

सामाजिक सरोकारों से हटता सिनेमा
सामाजिक सरोकारों से हटता सिनेमा

हमारे जीवन में फिल्मों का अहम स्थान है। मुझे लगता है कि मेरा बचपन सिनेमा नाम की चिड़िया को चौदह साल की आयु में ठीक-ठाक तरीके से जान पाया होगा। इससे पहले बचपन में कभी-कभार सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के लिए गाँवों में भारत सरकार का फिल्म प्रभाग सरकारी उपलब्धियों वाली फिल्मों के साथ एकाध डाक्यूम ...

भारतीय सिनेमा के एक सौ चार वर्ष
भारतीय सिनेमा के एक सौ चार वर्ष

भारतीय सिनेमा की बात की शुरूआत इस सूचना से करना चाहूंगा कि लंदन फिल्म संस्कृति के केंद्र, ब्रिटिश फिल्म इंस्टिट्यूट (बीएफआई) सॉउथबैंक में, इस वर्ष भारत की हिंदी फिल्मों पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। इस अवसर पर साउथ एशियन सिनेमा फ़ाउन्डेशन (एस.ऐ.सी.एफ.), फाल्के की मूक फ़िल्म राजा हरीशचन ...

चीनी सिने परंपरा
चीनी सिने परंपरा

सिनेमा उन्नीसवीं सदी का एक महत्वपूर्ण चमत्कार है जिसने पूरे विश्व में एक नयी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्रांति लायी। सिनेमा समाज का एक ऐसा दर्पण है जो हमें भूत और वर्तमान का सजीव चित्र तो दिखाता ही है, साथ ही साथ भविष्य का भी दर्शन कराता है। सिनेमा के माध्यम से हम अपने इतिहास को जीवंत रूप में ...

नीदरलैंड के फिल्म महोत्सव और यूरोप
नीदरलैंड के फिल्म महोत्सव और यूरोप

भारत में वालीवुड और विश्व में हॉलीवुड का चकाचौंधी हल्ला है, जिसमें क्राइम, अंडरवल्र्ड के कारनामों और वारदातों के जोखिमों का जोश और शोर, जंग और जश्न का रुतबा दिखायी देता है, जिसमें मनुष्यता के घुटन की पीड़ा का दंश भी हुंकारता हुआ महसूस होता है, लेकिन यूरोप की फिल्मी दुनिया का चरित्र हॉलीवुड और वॉली ...

सिंगापुर की फ़िल्मी दुनिया
सिंगापुर की फ़िल्मी दुनिया

सिंगापुर में ये बात बहुत प्रियकर है कि यदि फ़िल्म अच्छी हो और सही तरह
से मार्केट की गई हो तो मलय, चीनी लोग भी हिंदी फ़िल्में देखने आते हैं।
उदाहरण के लिए दंगल देखने वालों में बहुत-सी संख्या चीनी लोगों की थी।

इससे पहले कि हम सिंगापुर के सिनेमा के बारे में बात करें, ये जान लें कि ...

आधुनिक हिंदी सिनेमा की प्रासंगिकता
आधुनिक हिंदी सिनेमा की प्रासंगिकता

पहली बोलती फिल्म "आलमआरा" से लेकर अब तक, हिंदी सिनेमा एक बहुत लम्बा सफ़र तय कर चुका है। अच्छी बात यह है कि यह यात्रा केवल इसे बनाने की तकनीक में परिवर्तन तक ही सीमित नहीं है बल्कि सिनेमा बनाने के पीछे की सोच में भी तेज़ी से परिवर्तन आया है। आधुनिक सिनेमा सच्चे अर्थों में समाज का दर्पण बन चुका है जो ...

वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-16 राक्षस और उनका कुल अनुवाद : संजीव त्रिपाठी
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-16 राक्षस और उनका कुल अनुवाद : संजीव त्रिपाठी

वाल्मीकि एक "ऐन्द्रजालिक" जगत में रहते थे। उनके समय में आकाश से आकाशवाणी होती थी, वायु दौड़ती थी और जल गाना गाता था। समुद्र, पर्वत, वन और वृक्ष संवेदना दिखलाते थे। जीव-जंतु, पक्षी और जंगली जानवर मनुष्य के मित्र होते थे। वह आज के समय के परियों की कहानी जैसा प्रतीत होता था, पर वाल्मीकि के लिये वह सब ...

चलचित्र और चरित्र
चलचित्र और चरित्र

राज कपूर साहब तो हर हीरोइन के साथ इश्क़ फ़रमाते थे। उनके
कथनानुसार असली इश्क़ से अभिनय में वास्तविकता आ जाती है। खूब!
तो भैया कोई हमें यह बतलाये कि मरने के दृश्य में असलियत का प्रभाव
लाने के लिये, क्या कलाकार को सचमुच मार देना चाहिये?

साहबान ना तो हम सेंसर बोर्ड से हैं ...

आते ही जाने वाला
आते ही जाने वाला

हरिवंशराय बच्चन ने - मधुशाला - काव्य रचते हुए गाया -- इस दुनिया में आते ही मैं कहलाया जाने वाला। जल्दी-जल्दी ढलते दिन में बीतता जाता जीवन किसी एक दिन नहीं रहता। वे अपनी कविता में रूप-रस-गंध-स्पर्श और शब्दों से भरे जीवन के इस पार से उस पार को भी देखते हैं --
सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन निर्झर ...

फिल्म : एक प्लास्टिक आर्ट
फिल्म : एक प्लास्टिक आर्ट

हम आज भी सिनेमा घरों में जाते हैं। बहुत रंगबिरंगी और भारत के गांवों-देहातों से दूर,
बल्कि भारत के स्मॉर्ट शहरों से भी दूर लंदन, हांककांग, न्यूयार्क, सिंगापुर में फिल्माई
गई फिल्में देखते हैं, जिनमें विश्व सुंदरी के नाप की अभिनेत्री और अपनी मसल्स को
फुलाते अभिनेता हमें न जाने कैस ...

इंकार का अधिकार अनारकली ऑफ आरा
इंकार का अधिकार अनारकली ऑफ आरा

गांव गिराव में एक कहावत चलती है, "गरीब की जोरू सबकी भौजाई", अर्थात् स्त्री की अपनी कोई अस्मिता या पहचान नहीं है। उसकी पहचान कूती जाती है इस बात से कि वह किसके संरक्षण या अधिकार में है। जितना शक्तिशाली संरक्षक उतनी ही मान मर्यादा की हकदार स्त्री। यह बात जुदा है कि मालिक या संरक्षक जब जी चाहे उसे ध ...

शांगहाई में पहली बार हिन्दी नाटक
शांगहाई में पहली बार हिन्दी नाटक

शांगहाई में 22 अप्रैल को प्रसिद्ध नाटककार मोहन राकेश की कृति "आषाढ़ का एक दिन" का मंचन किया गया। आधुनिक शांगहाई के इतिहास में यह पहला मौक़ा था जब किसी हिन्दी नाटक का मंचन यहाँ किया गया। अपनी मिट्टी और संस्कारों से प्रेम करने वालों के साथ हिन्दी साहित्य और रंगमंच में दिलचस्पी रखने वालों के लिए शांगह ...

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