ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पचमढ़ी : एक शब्द चित्र
पचमढ़ी : एक शब्द चित्र विन्ध्य की अंतिम हद को छूकर बहती,पवित्र नर्मदा की अथाह जलराशि के पार,सतपुड़ा की सुरम्य पहाड़ियों पर,प्रकृति की अलौकिक छटाओं के बीच बसी-सलोनी पचमढ़ी!घुमावदार पहाड़ी रास्तों के ढ़लानों पर,बेल, आम, नीम, साल, सागौन के जाने-पहचाने, देखे-चीन्हेंऔर करधई, चिरचिटा, ककाई, दारु हल्दी...जैसे कितने ही पौधों से पहली म
हिंदी भाषा अपनी बोली
हिंदी भाषा  अपनी बोली हिंदी भाषागूँजे हिंदी भाषा मन में मुरली बजे ज्यों वृंदावन में हिंदी भाषा के मतवाले इसको तन-मन से सुनते हैं इसके सारे भक्त निराले इसके सपने ही बुनते हैं नेह बढ़ाती,धूम मचाती साख इसकी बढ़ती ही जाए सबको भाती और बहलाती फूलों जैसी मन महकाए कितनी है यह गौरवशाली कितनी है यह वैभवशाली इसके बोल बड़े न्यारे हैं इ
रिश्ते
रिश्ते रिश्तों की रंग-बिरंगी कतरनेंरखी हैं संजो कर मैंने।ये रिश्ते आम हैं, कोई खास नहींइनके बनाने-बिगड़ने पर मेरा जोर नहीं।इन नज़ाकत रिश्तों की हिफ़ाज़त करो, तो सब हैवर्ना ज़िंदगी विरानी है।ये रिश्ते हमें दुनियादारी सिखाते हैंभले-बुरे की पहचान कराते हैं।धूप-छाँह से, क्षण-क्षण बदलते रिश्तेखुद से खुद की मुलाकात क
एक दो
एक दो एकनया रूप धरके खनकाती कंगना रुनझुन बजाती रुपहली पायलिया मुस्कान होठों पर सजा कर मोहनिया जवाँ नूर चेहरे पर है दमकताआती है सज-धज के दूर ही से लुभाती अकेले में यादें सुहानी लाती हैं चेहरे पर मुस्कान पहलेचमकते हैं आंखों में सितारे अगले ही पल बन जाते हैं वो आँसू बीते पलों के आते नहीं है जो कभी भी पलट के
क्या खोया क्या पाया पतझड़ की पगलाई धूप
क्या खोया क्या पाया  पतझड़ की पगलाई धूप क्या खोया क्या पायाअनगिन तारों में इक तारा ढूँढ रहा है,क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन। छोटा-सा सुख मुट्ठी से गिरफिसल गया,खुशियों का दल हाथ हिलाता निकल गया,भागे गिरते-पड़ते पीछे,मगर हाथ में आया जो सपना वो फिर सेबदल गया,सबसे अच्छा चुनने में उलझा ये जीवन।क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।&nb
चीन के स्स चुआन प्रान्त के लोकगीत खानतिंग का हिंदी अनुवाद
चीन के स्स चुआन प्रान्त के लोकगीत खानतिंग का हिंदी अनुवाद इस गीत का यह नाम खानतिंग शहर से रखा गया है। बहुत ही सुरीला ओर मीठा गीत होने के कारण बरबस ही दिल को छू लेता है। यह लोकगीत चीन के स्स छुआन प्रान्त का है। यह न केवल स्स छुआन में बल्कि पूरे  चीन में गाया जाता है। यह विश्व के मशहूर लोकगीतों में से एक है। यूनेस्को ने भी इसे विश्व के सबसे मशहूर दस गीत
जाकोमो दा लेनतीनी की दो सॉनेट कविताओं का इतालवी से हिन्दी अनुवाद
जाकोमो दा लेनतीनी की दो सॉनेट कविताओं का इतालवी से हिन्दी अनुवाद कविता की सॉनेट शैली का लेखन सबसे पहले दक्षिण इटली के सिसली द्वीप में तेरहवीं शताब्दी में हुआ। इसके सबसे पहले प्रयोग का श्रेय पूर्वी सिसली के लेनतीनी शहर में सन् 1210 में जन्में इतालवी कवि जाकोमो दा लेनतीनी (क्रत्ठ्ठड़दृथ्र्दृ ड्डठ्ठ ख्र्ड्ढदद्यत्दत्) को दिया जाता है। उन्हें जाकोमो नोतारो (क्रत्ठ्ठड़दृ
कल-कल निनाद
कल-कल निनाद आज बात मैं "कल" की करना चाह रहा था। अब आप पूछेंगे, कौन से कल की? जी हाँ, समय से संदर्भित "कल" दो प्रकार के होते हैं। क कल जो बीत गया और एक कल जो आने वाला है। जब तक पूरी बात न कह दें आप समझ ही नहीं सकते कौन से कल की बात कही जाएगी। पड़े रहिए भ्रम में! वह जिसकी दूकान से आप रोजमर्रा का सामान खरीदते हैं,
बाज़ार से गुज़रा हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ जी सरकार, हमारे जैसे बिंदास बशर दुनिया में रहते तो हैं लेकिन उसके तलबगार नहीं होते। अकबर इलाहाबादी की तरह हम भी बाज़ार से गुज़रते हैं, मगर ख़रीदार भी हों ये ज़रूरी नहीं। अब भले ही हम असली ख़रीदार ना हों लेकिन खिड़की - ख़रीदार (ध्र्त्दड्डदृध्र्-द्मण्दृद्रद्रड्ढद्ध बुद्धू) तो हो ही सकते हैं। तो भैया हम संसार
पंजाब की लोक-कविता
पंजाब की लोक-कविता लोकगीत उन्मुक्त मन की भाव लहरिया हैं और सामाजिक परम्पराओं के लयात्मक शब्द चित्र भी। इनमें व्यक्ति मन के मूक वेदना-उल्लास भी है और समाज की रीतियों-कुरीतियों का समर्थन-विद्रोह भी। लोकगीत कुंठामुक्त समाज के सर्जक भी हैं और रुग्ण मन के चिकित्सक भी। पंजाब लोकगीतों की धरती है। यहाँ के लोक गीत, बोलियाँ, टप
लोक का आँगन
लोक का आँगन लोक अनंत भी है और आँगन भी। वह अनन्त को आँगन में उतार लेता है और घर के आँगन से ही अनंत की यात्रा करता है। लोक में ही यह शक्ति है कि वह आवाहन न जानते हुये भी सारे देवताओं को एक छोटा-सा चौक पूरकर उसमें प्रतिष्ठित कर सकता है। लोक में ही साहस है कि वह देवता को प्रतिष्ठित करके उसे चाहे जब नदी में सिरा दे
मूक दर्द की चीत्कार का लोककवि छज्जुलाल सिलाणा
मूक दर्द की चीत्कार का लोककवि छज्जुलाल सिलाणा त्रोता युग म्हं शंबूक संग घणा, मोटा जुल्म कमाया थारैदास, कबीर, भक्त चेता पै जाति आरोप लगाया थागुरु वाल्मीक, सबरी भीलणी नैं चमत्कार दिखलाया थाकांशी म्हं कालिया भंगी ने हरिचंद का धर्म बचाया थाहिंदुओं के पोथी-पुस्तक म्हं वे चण्डाल कहाएघणे पोलसीबाजज।।लगभग साठ वर्ष पहले लिखी गई यह रागिणी भारत में संस्कृत
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-15पञ्चवटी
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-15पञ्चवटी चारू चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही है जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी अवनि और अंबर तल में - राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त यह लिखकर अमर हो गये। पञ्चवटी की शुरुआत हुई वाल्मीकि से। वाल्मीकि के भौगोलिक संधान में उनको ऐसी एक जगह की जरूरत थी, जहां कुछ नाटकीय घटना बन जाये। अधर्म से धर्म का युद्ध उनकी भा
क्यूँ मुझे बार-बार दिखता है उसकी आँखों में प्यार दिखता है
क्यूँ मुझे बार-बार दिखता है  उसकी आँखों में प्यार दिखता है एकक्यूँ मुझे बार-बार दिखता है उसकी आँखों में प्यार दिखता हैउसको पाने की चाह में देखो हर कोई बेक़रार दिखता हैक्या छुपाता है मेरी नज़रों से अब मुझे आर-पार दिखता हैरेत बहती है इन हवाओं में हर तरफ़ थार-थार दिखता हैज़िन्दगी के हरेक पन्ने पर मुझको गीता का सार दिखता हैजिसको कहते हैं देवता सारेवो मुझे दागदार दि
लोक-बोली के निहितार्थ
लोक-बोली के निहितार्थ भारत में लोक शब्द बहुअर्थी है। यहां की पुराण कथाओं में चौदह लोकों की परिकल्पना की गई है। जिनमें पृथ्वी, आकाश और पाताल लोक भी शामिल हैं। लोक का एक अर्थ उस व्यापक बहुरंगी जीवन से भी है जिसकी सदियों पुरानी अनुभव सम्पदा से लोक संस्कृतियों का निर्माण होता आया है। आधुनिक लोग लोक को जनपदीय, आँचलिक और ग्राम
नागोबा डुलाय लागला...
नागोबा डुलाय लागला... बिल्कुल वही है। खाल के ऊपर रेंगता है। वही है। मैं भी तो वही हूँ। बैठा भी वहीं हूँ आज तक। तुम जबसे गयीं, निपट अकेला हूँ। वही शनिवार, वही तीसरा पहर, वही अड्डा, वही बेंच। वही आवाज़ें : तिकीट, तिकीट, तिकीट... जवळे, शिर्वळ, सांगळी, खंडाळा...। वही नारे : पानी घाळा1, दारू सोडा2, जय महाराष्ट्र...। हज़ारों मील
तुम साथ हो तो घर की कमी फिर नहीं खलती
तुम साथ हो तो घर की कमी फिर नहीं खलती कविता एक कोशिश करती है जीवन का चित्र बनाने की। अवनीश कुमार की किताब पत्तों पर पाजेब ऐसी ही एक कोशिश है। आजकल ग़ज़लें थोक के भाव लिखी जा रही हैं और छप भी रही हैं। अमूमन हरेक पत्रिका में एक आध ग़ज़ल का प्रकाशित होना अनिवार्य हो गया है। बहती गंगा में हाथ धोते हुए नौसीखिये कच्चे शायर बहुतायत में नज़र आ जाते
लोक मतलब सामूहिकता और समानता
लोक मतलब सामूहिकता और समानता सन् दो हजार में पहली बार अमरीका जाना हुआ। अमरीकी राज्य ज्योर्जिया की राजधानी अटलांटा की धरती पर पाँव रखते ही एक रोमांच-सा हुआ। 1965 में अमरीका में गोरे अमरीकियों के गुलाम रह चुके अफ़्रीकी मूल की नीग्रो नस्ल के कालों के लिए मानवाधिकारों की माँग करने वाले अप्रतिम योद्धा और मिलेनियम मार्च के अगुआ और इसी
ज्ञान का अद्भुत भंडार
ज्ञान का अद्भुत भंडार पुस्तकालय की आदत बचपन में मम्मी-पापा ने लगायी थी। तब इतनी समझ नहीं थी। छोटी-छोटी किताबें जैसे चम्पक, चकमक पढ़कर और लकड़ी के हाथी, घोड़ा खिलौने खेलकर आ जाया करते थे एकलव्य जैसी शहर की लाइब्रेरी से। पर अब लाइब्रेरी एक लत बन गयी है। एक हफ्ते से ज्यादा दिन होने पर ही एक अजीब सी बैचनी होने लगती है जाने के ल
बर्लिन में भारतीय राजदूत श्री गुरजीत सिंह से शिक्षाविद् डॉ. राम प्रसाद भट्ट की बातचीत
बर्लिन में भारतीय राजदूत श्री गुरजीत सिंह से शिक्षाविद् डॉ. राम प्रसाद भट्ट की बातचीत बर्लिन में भारत के राजदूत श्री गुरजीत सिंह 1980 से भारतीय विदेश विभाग में कार्यरत हैं। आपने मेयो कॉलेज अजमेर, ज़ेवियर कॉलेज, कोलकत्ता और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से शिक्षा प्राप्त की। जेएनयू से इंटरनेशनल स्टडीज़ में एम.ए. करने के साथ ही आप इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ फ़ॉरेन ट्रेड, इंडियन इंस्टिट्
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