ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2017 Jan
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प्रवासी भारतीय दिवस एक सामयिक चेतना
प्रवासी भारतीय दिवस एक सामयिक चेतना भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में कई दशकों से विदेशों में बसे हुए हैं और उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जिसमें व्यवसाय, शिक्षा, नौकरी, वैज्ञानिक एवं तकनीकी सन्दर्भ शामिल हैं। विकसित पश्चिमी देशों में उनकी अपनी एक पहचान है
हिंदी प्रवासी साहित्य से अपेक्षाएँ
हिंदी प्रवासी साहित्य से अपेक्षाएँ भारत से प्रवास पर जाने का कार्य सदैव होता रहा है। आवागमन के साधनों ने इस प्रक्रिया में और तेजी ला दी है। भारतीय प्रवासी दुनिया के कोने-कोने में बसे हुए हैं। असगर वजाहत वर्तमान साहित्य के प्रवासी महाविशेषांक के अपने संपादकीय में कहते हैं, "बीसवीं श
हिंदी साहित्य में प्रवासीपन का फतवा
हिंदी साहित्य में प्रवासीपन का फतवा अंडा जब बाहर से फोड़ा जाता है तो एक हत्या बन जाता है, परन्तु जब वह अन्दर से फोड़ा जाता है तो एक सृजन! साहित्य सृजन भी ऐसी ही एक प्रक्रिया है। जो आतंरिक ऊर्जा पककर प्रस्फुटित होती है वह नव रचना है। विदेशों में बसे भारत से आये अनेकों प्रबुद्ध, संवेदनश
सुनहरे भविष्य की रौशनी का सच
सुनहरे भविष्य की रौशनी का सच आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि एनआरआई याने अपने देश से दूर दोहरी जिंदगी जीने वाला भारतीय। भारत में अक्सर ही इन्हें बहुत सफल माना जाता है जिनका अपना एक विशेष स्टेटस बना हुआ है। विदेश में वे अपनी पहचान कैसे बनाये रखते हैं, उनका वहां क्या सामाजिक स्टेट
आसान नहीं है वापसी की राह
आसान नहीं है वापसी की राह प्रवासी यानी वे लोग जो जन्मभूमि को छोड़ कर कहीं और जा बसते हैं। कुछ लोग गाँव से शहर, शहर से प्रान्त छोड़ते हैं और कुछ हमारे जैसे चाहे-अनचाहे सूदूर देशों में जा बसे हैं किन्तु फिर भी किसी न किसी माध्यम से मातृभाषा व जन्मभूमि से जुड़े हैं या जुड़ने की स
शून्य दाता शून्य?
शून्य दाता शून्य? पतझड़ के पत्तेजो जमीं पे गिरे हैंचमकते दमकतेसुनहरे हैंपत्ते जो पेड़ परअब भी लगे हैंवो मेरे दोस्त,सुन, हरे हैं मौसम से सीखोइसमें राज़ बड़ा हैजो जड़ से जुड़ा हैवो अब भी खड़ा
उत्सव और उल्लास के बीच
उत्सव और उल्लास के बीच मनुष्य एक उत्सव-धर्मी जीव है लेकिन यह उत्सव-धर्मिता उसकी सुरक्षा, समृद्धि और विश्वास पर निर्भर करती है। जिस साल फसल खराब हो जाती है तो किसान के लिए दिवाली का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आतंक, अनास्था और अभाव के साए में उत्सव की मानसिकता नहीं बनती। जिसक
प्रवासी दिवस औचित्य और उद्देश्य
प्रवासी दिवस  औचित्य और उद्देश्य भारत के विकास के लिए प्रवासी भारतीय समुदाय के योगदान को चिन्हित करने के लिए प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला प्रवासी भारतीय दिवस एक अच्छा प्रयास सिद्ध हो सकता है। महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत वापस आने के दिन (9 जनवरी) को प्रवासी दिवस के रूप मे
यहाँ पर भीड़ में सब अजनबी हैं
यहाँ पर भीड़ में सब अजनबी हैं शायर जनाब अनवारे इस्लाम की बात करती हुई ग़ज़लों की किताब का शीर्षक है- मिजाज़ कैसा है।उस की आँखों में आ गए आंसूमैंने पूछा मिजाज़ कैसा हैदूर तक रेत ही चमकती हैकोई पानी नहीं है धोका हैकिसके काँधे पे रखके सर रोऊँहाल सब
गुनियाँ प्लैटफ़ॉर्म
गुनियाँ प्लैटफ़ॉर्म गुनियाँमाँ ने चिरैया का नामरखा था "गुनियाँ"कभी सूप पर आ बैठतीऔर तकती थी माँ की ऐनक कोकभी फुदक करआरसी (दर्पण) के सामने जा बैठती थीलड़ती थी अपने ही साये सेफिर थक कर जा बैठती थी
ऐ जिंदगी तू मेरी धुन गा के तो देख
ऐ जिंदगी तू मेरी धुन  गा के तो देख ऐ जिंदगीऐ जिंदगी गर्दिश का तारा न बन बेशक धूप और छाया न बन बनना है तो बन जा मेरी हिम्मत यूं काँटों का ताज न बन। मेरे रूठे अल्फाज की कहानी न बन मेरी झूठी मुस्कान का सच न बन बनना
स्वीकार
स्वीकार नैया पर मैं बैठ अकेलीनिकली हूँ लाने उपहारभव-सागर में भंवर बड़े हैंदूभर उठना इनका भारना कोई मांझी ना पतवारखड़ी मैं सागर में मंझधारफिर भी जीवन है स्वीकार। राहों में कंटक भरमारअनगिन जलते हैं अंगार
उम्मीद का आसमान
उम्मीद का आसमान देश में हर जगह नक़ली नोट थे डरता था बिना जुर्म के पकड़ा ना जाऊँदेश की मुद्रा बदल दिल से डर की याद भुला दी मोदी ने।डर लगता था सड़क पे निकल करकहीं कोई आतकंवादी बम न फोड़ देसर्जिकल स्ट्राइक कर आतंकवादियों को
चिन्ता
चिन्ता कहते हैं लोगकोई साथ नहीं निभाताचिन्ता से पूछो कैसे नाता निभाया जाताचिन्ता तो परछाई है कब अलग किसी से रह पाईविरला ही होगा जिसे इसने नहीं घेरासब को एक निगाह से देखे ना कोई तेरा-मेरादेश बदलो
प्रेम का बन्धन
प्रेम का बन्धन लम्बा प्रवास, भारत की तैयारी थी, न थे पैर जमीं पर आकाश में मैं उड़ती थी, आ पहुँची मैं वतन अपने परइन्दिरा गाँधी एयरपोर्ट पर, धीमी बत्तियां जलती थींअमेरिका की चकाचौंध के बाद, मीठी-सी ये लगती थींआंखों से अश्रु ढुलक गये, नयनों स
घर सँवरने से दुनिया सँवरती है
घर सँवरने से दुनिया सँवरती है मेरा घर अब दोस्तों को अपने घर से दूर लगता है। मुझे बच्चे घर से दूर लगते हैं। मैं भी घर से कुछ दूर जाता सा लगता हूँ। क्या घर से दूर जाने के लिए ही घर में रहने आया हूँ? श्यामला हमेशा घर में रहती है। वह कभी घर से दूर जाती ही नहीं। अगर कुछ दिनों के लि
तरक्की की राह पर दौड़ने के आशय
तरक्की की राह पर दौड़ने के आशय यहाँ कनाडा में हम साल में दो बार समय के साथ छेड़छाड़ करते हैं जिसे डे लाईट सेविंग के नाम से जाना जाता है। एक तो मार्च के दूसरे रविवार को समय घड़ी में एक घंटा आगे बढ़ा देते हैं और नवम्बर के पहले रविवार को उसे एक घंटे पीछे कर देते हैं। ऐसा सूरज की रोशनी
शहरों का शहर
शहरों का शहर पेरिस के प्रवास में जो भला-बुरा देखा अगर वो सब बताने की कोशिश की जाए तो कभी बातें ही ख़त्म ना हों। कम ही लोगों को मालूम होगा कि पेरिस को फ्रेंच में पाही बोला जाता है। आज भले ही एफ़िल टॉवर इस नगर की पहचान हो लेकिन एफ़िल टॉवर के बनने से पहले भी पेरिस क
इंडोनेशिया में भारतवंशी छवियाँ
इंडोनेशिया में भारतवंशी छवियाँ इंडोनेशिया के प्रवासी भारतीयों पर बात करने बैठे तो दिल-दिमाग की डायरी के बहुत से पन्ने खुलते जा रहे हैं। पहली बार वहां एक अध्यापक के तौर पर जाने का मौका मिला। उस समय बहुत सी ऊहापोह थी, लेकिन जाने के उत्साह में वे सब बातें दफ़न हो गयीं। जब जकार्ता ह
वर्जीनिया इज़ फ़ॉर लवर्स
वर्जीनिया इज़ फ़ॉर लवर्स हिंदुस्तान की सर ज़मीन से विवाहोपरांत जब पैर उखड़े तो सीधे अमेरिका की धरती पर आकर पड़े। यहाँ की चौड़ी-चौड़ी, साफ़-सुथरी सड़कें, उन पर क़तारों में चलती बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, गगनचुंबी इमारतें और इन सबसे कुछ ही दूर घने, लम्बे, सीधे खड़े पेड़ों से भरे ख़ूबसूरत जंगल,
आपसी सहयोग से ही विकास संभव है
आपसी सहयोग से ही  विकास संभव है मालदीव में भारत के राजदूत अखिलेश मिश्र से आत्माराम शर्मा की बातचीतभारतीय विदेश सेवा के 1989 बैच के अधिकारी श्री अखिलेश मिश्र विगत एक वर्ष से मालदीव में भारत के राजदूत हैं। इससे पूर्व वे टोरोंटो, कनाडा में कोंसुल जनरल थ
हमारा अतीत एक है, हमें गले लगाएँ
हमारा अतीत एक है, हमें गले लगाएँ नीदरलैंड के भारतवंशी व्यवसायी भगवान प्रसाद से सुषमा शर्मा की बातचीतअपनी तरह से जीने वाले कुछ शख्स अपनी तरह के होते हैं जो दूसरों के लिये ही जीते हैं। पूंजीवाद के इस जटिल समय में जहां लोग सिर्फ अपने लिये धन कमाना चाहते
फ़िल्मों के विस्मृत इतिहास पुरुष निरंजन पाल
फ़िल्मों के विस्मृत इतिहास पुरुष  निरंजन पाल ब्रिटिश और भारतीय फ़िल्मों के निर्माण में साझेदारी की नींव रखने वाले फ़िल्म-कहानीकार, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्माता और साहित्यकार निरंजन पाल ऐसे पहले भारतीय थे, जिन्होंने अपनी कृतियों द्वारा भारतीय और योरोपीय संस्कृतियों का सुन्दर समन्वय किया। वे इन दो
दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन राष्ट्रभाषा की वैश्विक यात्रा को लगे पंख
दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन राष्ट्रभाषा की वैश्विक यात्रा को लगे पंख अभी तक चर्चा का विषय रहता था ""सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी"", परन्तु इस सम्मेलन के फलस्वरूप दिशा परिवर्तन हो गया है और अब विमर्श का विषय बनेगा ""हिन्दी में सूचना प्रौद्योगिकी""। ये प्रतिक्रिया थी दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन के अंतिम दिन एक अमेरिक
भारतीय बैंकिग और अर्थ-व्यवस्था
भारतीय बैंकिग और अर्थ-व्यवस्था मुझे अपने एक चीनी मित्र से पता चला कि वे अपना बैंकिंग चीन की बैंकों से करते हैं। मैंने उनसे कौतुहलवश पूछा कि आप ऐसा क्यों करते हैं? उन्होंने अपने जवाब में कोई देश-भक्ति की बात नहीं कही, कोई डींग भी नहीं हाँकी। उनका जवाब सीधा था- "व्यवसायिक तौर पर
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-15 दण्डकारण्य हिंदी अनुवाद : संजीव त्रिपाठी
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-15 दण्डकारण्य हिंदी अनुवाद : संजीव त्रिपाठी रामायण की कहानी मुख्यतः तीन भोगोलिक भूभागों में बुनी गई है, उनमें से प्रथम है "अयोध्या" और उसका समीपवर्ती क्षेत्र, दूसरा दक्षिण भारत का विस्तृत वनक्षेत्र "दण्डकारण्य" और तीसरा समुद्र में स्थित "लंका" द्वीप। अन्य संबन्धित क्षेत्र, कैकेय और मिथिला क
प्रवासी दिवस के बहाने
प्रवासी दिवस के बहाने गये ज़माने में जब जनसंख्या कम थी तो लोग मिलजुल कर रहते थे। रिश्तों की क़दर करते थे। अब जनसंख्या विस्फ़ोट के कारण धरती पर भीड़ बढ़ गयी है। संयुक्त परिवार न्यूक्लियर फॅमिलियों में बंट गये हैं। रिश्ते घट गये हैं। अंदरखाने कहीं डार से बिछुड़े लोगों में अपरा
वासी, प्रवासी, अप्रवासी
वासी, प्रवासी, अप्रवासी लगभग आधी सदी पहले राजकपूर अभिनीत एक फिल्म - जिस देश में गंगा बहती है बनी थी और उसका शैलेन्द्र का लिखा हुआ एक गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ - होठों पे सचाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। राजकपूर को याद
अरमान है
अरमान है सड़क किनारे एक छोटी-सी दुकान की रंग-बिरंगी दीवार से शरीर को टिकाए, बदरंगे, मटमैले से कपड़ों में तेज़ बारिश में भीगने से अपने को बचाता हुआ वह, कान से चिपके पुराने मॉडल के मोबाइल पर ऊँची आवाज़ में न जाने कब से बतियाए जा रहा था। उसके चेहरे के हाव-भाव और
चले गए अनुपम भाई
चले गए अनुपम भाई उन दिनों कॉलेज में था। आपातकाल में सेंसरशिप का विरोध करते हुए पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी। शायद उन्नीस सौ पचहत्तर या छियत्तर के आसपास अनुपम भाई से मुलाक़ात हुई थी और तब से लेकर उनके आख़िरी सफ़र पर जाने तक एक बड़े भाई जैसा स्नेह उनसे मिलता रहा। गंभीर
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