ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मॉरीशस के देहात
मॉरीशस के देहात मॉरीशस हिन्द महासागर के दक्षिण में स्थित एक छोटा-सा टापू है। वर्षों ज्वालामुखी के सक्रिय रहने तथा ठंडा होने पर यह टापू अस्तित्व में आया। प्रारम्भ में यह टापू समुद्री जहाजों का विश्राम स्थल था (पन्द्रहवीं सदी)। बाद में डच इस टापू पर काफ़ी समय तक रहे (सोलहवीं सदी)। डचों ने इस टापू पर गुलामों द्वारा खेत
चीन के गाँव
चीन के गाँव चीन में उस तरह की समस्या सबसे बड़ी है जो गाँव के बारे में है, यह स्थिति बहुत लंबे समय से पहले शुरू हुई। कुछ लोग शायद पूछना चाहते हैं कि ऐसा क्यों? सच में, भारत के समान, चीन में अधिकतर ज़मीन कृषि के लायक है। इस तरह के भौगोलिक वातावरण के कारण चीन में कृषि पूरे देश की  अर्थव्यवस्था का आधार है। बोने
कुछ खोते और कुछ संजोते चीनी गाँव
कुछ खोते और कुछ संजोते चीनी गाँव चीन के गाँवों को घूमने का सौभाग्य अपने साथ ही पढ़ा रहे अंग्रेज़ी के व्याख्याता के सौजन्य से मिला। ये गुआंगदोंग प्रांत से सटे प्रांत के एक गाँव के निवासी थे। साथ उठते-बैठते ये मित्र मेरे आत्मीय होते चले गए। जैसे ही अवसर मिलता साथ ही घूमने निकल जाते। कभी डिनर पर बुला लेते और कभी कोई पार्क या अन्य मित्रो
चीन में बदलाव का दौर
चीन में बदलाव का दौर मेरे दादके और नानके गाँव में हैं, गाँव से मेरा रिश्ता बहुत गाढ़ा है। बचपन से ही हर छुट्टियों और शादी ब्याह में गाँव जाना होता रहता है। सो गाँव से मेरा गहरा लगाव रहा है। लेकिन दस साल से, जबसे शंघाई आये तो भारत जाने के दौरान गाँव जाकर रहना नहीं हुआ।हम शंघाई आ गये लेकिन शंघाई में रहकर भी गाँवों से लगाव
मिटने की कगार पर लॉरांग बुआंगकॉक
मिटने की कगार पर लॉरांग बुआंगकॉक दुनिया में देहात या देहात में दुनिया! दोनों अजूबे - एक कुदरत का, दूजा फ़ितरत का। अरे भई दुनिया में देहात का वही अस्तित्व है जो देह में हात (हाथ) का। देखो न; खुद ही देखो - दे हात (हाथ), ले हाथ, चले हाथ, करे हाथ, उठे हाथ, तेरे हाथ, मेरे हाथ और लिखें हाथ (रेखांकित करें) कलम को आँख, नाक, कान से पकड़ के तो
सिंगापुर का आखिरी कम्पोंग
सिंगापुर का आखिरी कम्पोंग सिंगापुर में गांव को "कम्पोंग" कहा जाता है। यह मलय भाषा का शब्द है। सन् 1965 में मलेशिया से सिंगापुर की आज़ादी के बाद, तेज़ी से सुख सुविधा से लैस आवासीय परिसर बनने लगे। सरकारी बहुमंज़िली ईमारतों का निर्माण हुआ, जिन्हें हाऊसिंग एंड डेवलेपमेंट बोर्ड द्वारा बनाये जाने के कारण "एचडीबी" कहा जाता है। बिजली-प
त्रिनिदाद के आधुनिक गांव
त्रिनिदाद के आधुनिक गांव त्रिनिदाद कैरेबियाई या केरिबियन सागर में एक द्वीप है। त्रिनिदाद और टोबैगो द्वीप मिलकर एक द्वीप देश का निर्माण करते हैं। इनमें से त्रिनिदाद ज्यादा बड़ा और सघन जनसंख्या वाला द्वीप है। त्रिनिदाद कैरिबियन के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित द्वीप है और वेनेजुएला के पूर्वी तट से सिर्फ 11 किमी (7 मील) दूर है। त्र
यूरोप के देहात
यूरोप के देहात यूरोप के गांवों की प्राकृतिक छटा अनूठी है। सृष्टि झील, झरने, नदियों के दर्पण में अपना सौंदर्य निहारती है। दूर तलक घसियारे मैदान के मैदान भी दिखायी देते हैं। यूरोप की राष्ट्रीय सड़कों (नेशनल हाईवे) के दोनों ओर गांवों का ही साम्राज्य है। अधिकांश खेतों में घास की फसल रहती है, जिनके गट्ठर के गट्ठर बनाकर
इंग्लैंड के देहात
इंग्लैंड के देहात प्रागैतिहासिक मानव में "समूह ज्ञान" का संचार कृषि के विकास के कारण हुआ। जब तक पहिये और पहिये से चलनेवाली गाड़ियों का आविष्कार नहीं हुआ था, मानव जाति को भारी सामान ढोने के लिए समवेत श्रम की आवश्यकता पड़ती थी। ईंटों का आविष्कार भी नहीं हुआ था। घर बनाने के लिए पत्थरों का प्रयोग होता था। इसी तरह दुश्मन से
ब्रिटेन के गाँव-देहात
ब्रिटेन के गाँव-देहात दुनिया के अन्य देशों की तरह यूके में भी तमाम ग्रामीण क्षेत्र हैं जहाँ छोटे-छोटे सुन्दर व आकर्षक गाँव बसे हुए हैं। यहाँ के लोगों को अपने इन गाँवों पर बहुत गर्व है। उत्तरीय आयरलैंड से लेकर स्काटिश हाईलैंड और वेल्स की खूबसूरत वादियों और कार्नवाल के मोहक समुंदरी किनारों तक यह गाँव फैले हुए हैं। हरी-भरी
"हिडन" अमेरिका
अमेरिका का नाम सुनते ही हाई लुक्सुरिअस लाइफ स्टाइल, एडवांस मॉडर्न लोग जिनको कोई काम नहीं करना पड़ता क्योंकि सब काम मशीनों से होता है, कोई यहाँ गरीब नहीं, सब बर्गर पिज़्ज़ा जैसा मँहगा फ़ूड रोज़ खाते हैं, पार्टी मूड में ही रहते हैं, भविष्य की इनको कोई टेंशन नहीं। टेलीविजन पर अमेरिकी जीवन जिस तरह दिखाया जात
भैंस और चींचड़े
भैंस और चींचड़े मनुष्य के विकास के कई सोपान हैं। यदि हम इनका एक मोटा-सा वर्गीकरण करें तो ये इस प्रकार हो सकते हैं- अन्य जानवरों के समान भोजन ढूँढ़ने वाला आदिम मनुष्य, भोजन पालने वाला पशुपालक मनुष्य, भोजन उगाने वाला खेतिहर मनुष्य। इनमें खेती से पहले की स्थितियों में उसके जीवन में स्थायित्त्व नहीं था, वह कमोबेश घुमंतू
तेरे मेरे गाँव
तेरे मेरे गाँव गाँव से रिश्ता सबका ही है फिर चाहे वह प्रत्यक्ष हो अथवा परोक्ष। गाँव, खेत, खलिहान के बिना किसी भी देश की कल्पना असंभव है, लेकिन फिर भी गाँव से कोई शहर अपने रिश्तेदार के घर आ जाए तो सभी को एक बेचैनी हो जाती है कि कहीं कोई यह ना देख ले कि इनके रिश्तेदार गाँववाले हैं। जैसा रामचंद्र शुक्ल ने अपने लेख "ल
साझे लोक से निजी विश्व की ओर
साझे लोक से निजी विश्व की ओर मेरे लिए गाँव जड़ और चेतन, सृष्टि के इन दोनों रूपों के साथ, एक गहरे लगाव को रूपायित करते रहे हैं। गाँव के लोग जीवंत प्रकृति के होते थे क्योंकि उनका जीवन किसी एक व्यक्ति या घर में सिकुड़ा-सिमटा न था। वहाँ तो जीवन हित-नात, सखा-संहतिया, घर-दुआर, बाग़-बग़ीचा, खेत-खलिहान, कुआँ-बावड़ी, तालाब (पोखर) और नदी के आ
सड़क और पगडंडी
सड़क और पगडंडी एक नगर की ओर जाता है और दूसरी गाँव की ओर। गाँव और नगर के बीच रास्ते तो कई हैं लेकिन समानताएं नहीं हैं। पिछले कई दशकों से इन्हीं रास्तों से लोग ग्रामीण जीवन से नगर की चकाचौंध की ओर भाग रहे हैं। लेकिन अब नगरी जीवन अपने आकर्षक चोले को फेंक विकराल रूप में अपनी विराट समस्याओं के साथ सामने आ गया है। 
गांव विकास की दुविधापूर्ण तस्वीर
गांव विकास की दुविधापूर्ण तस्वीर आज एक लंबे अरसे बाद गाँव पर चिंतन करने बैठा हूँ, अजीब-सी बात है मैंने दस मिनट में इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री खंगाल डाली। विकिपीडिया पर डाटा देख डाले और फिर मैं खुद को मिनिस्टरी आफ रुरल डवलपमेंट साईट पर जाने से भी नहीं रोक सका। मुझे लगा यदि मैंने भारत के गाँव को कागज़ों में ढूंढा तो यह देश के देहातीपन
गाँव-देहात की सद्भावी परम्परा
गाँव-देहात की सद्भावी परम्परा जो परिवर्तन विगत कई सौ साल में हुए हैं उससे कहीं अधिक परिवर्तन कुछ दशकों में ही इस पृथ्वी पर हो गए हैं। आगे इनमें और तेजी ही आएगी। ऐसे ही हमारे गांव-देहातों में भी परिवर्तन आए हैं और आते जा रहे हैं। जहां तक बदलाव की बात है तो एक बात ध्यान रखने की है- घूमते वृत्त के केंद्र में परिवर्तन शून्य होता है
प्रगति
प्रगति शहर की चकाचौंध में कुछ खो-सा गया है कि जेहन में गाँव का नक्शा रखा हैजहाँ दूर से ही दीख जाती हैंछतों पर सूखती मिर्चें और बड़ियांनीचे आँगन में सजती हैंतुलसी और गुलाब की क्यारियांखेत की पगडण्डी के इस ओरकेले के पत्ते हैं झूलतेतो दूसरी ओर अमराई और आम हैं महकतेवहीं थोड़ा आगे बूढ़ी नानीसिगड़ी पर रोटी है पकातीत
छोटी नदी की कहानी
छोटी नदी की कहानी नदी के इस छोर पर एक मंदिर है - कमनसीब और मंदिर के भीतर एक मूर्ति है अपनी छिन्न-भिन्न अवस्था में बेसहारा-बेबस-लाचार।मूर्ति (ईश्वर) की नाक और तर्जनी कटी हुई है, यह कैसा समय चक्र कि ईश्वर के चेहरे पर निरीहता झलक रही है।अभेद्य मंदिर प्राचीर भी अब लड़खड़ा रहा है औरईश-डर के एकाकीपन का एकमात्र साथी अभेद्य सन
द्वन्द्व
द्वन्द्व महानगर की सड़कों पर चलते-चलतेऊंचे कांक्रीट के चिनारों को निहारते जब गर्दन में टीस होने लगती इन ईंट-गारे के झुरमुटों के बीच झाँकती उदयीमान सूर्य की स्वर्णिम रश्मियां जब आँखों को आलोकित कर देती हैं तब...कल्पना समान लंबी और निराशा की काली डामरीकृत सड़कों से उठती काली चमक जब इन आँखों को भेदती हैसड़क के किस
बाँसुरी की टेर
बाँसुरी की टेर श्री अरविन्द कहते थे कि मानव जाति के इतिहास में वह समय भी आता है जब युध्द को मित्र की तरह गले लगाना पड़ता है। गहरे आशय से भरी उनकी यह बात मुझे हिरण्यकश्यपु के वध की याद दिलाती है और कहने का मन होता है कि वह समय भी आता है जब अत्याचारी को गोद में रखकर मारना पड़ता है और केवल मनुष्य होकर नहीं आधा पशु भी
गाँव बसाये नहीं जाते
गाँव बसाये नहीं जाते जिस तरह शहर बसाये जाते हैं गांव के बसने का ऐसा कोई प्रमाण पृथ्वी पर नहीं मिलता। गांव बसाये नहीं जाते - वे अपने आप बस जाते हैं। आदिकाल से मानव जीवन हमेशा उस स्थानीयता को पहचानने की कोशिश करता रहा है जिसमें उसने जन्म लिया है। अगर गहराई से विचार करें तो मनुष्य को अपनी स्थानीयता का बोध अपने आसपास की धरत
प्रवासी महिला कहानी लेखन में गाँव
प्रवासी महिला कहानी लेखन में गाँव ग्राम या देहात में रहने वाला ग्रामीण या देहाती कहलाता है। भारत की 70 प्रतिशत जनसंख्या गांवों में रहती है। भारत में अगर चालीस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं, तो इनमें से अधिकांश ग्रामीण हैं। कृषक हमारी अर्थव्यवस्था का आधारस्तम्भ हैं। लेकिन जनसंख्या वृद्धि, ज़मीन के बँटवारे और झगड़े, प्राकृतिक आ
मैं भी देशभक्त हूँ
मैं भी देशभक्त हूँ माँ हमें जन्म देती है और धरती माँ की गोद में पल कर हम बड़े होते हैं। जिस देश में हमने जन्म लिया, वह हमारी मातृभूमि हमें प्राणों से भी अधिक प्रिय है। हर प्राणी अपनी जन्मभूमि से जुड़ा होता है। वह उससे अलग अपने अस्तिव को पूर्ण नहीं मानता है।मनुष्य कहीं भी चला जाये, विदेशों में उसे कितना ही सुख मिले, वह व
मेरा गाँव मेरा देश
मेरा गाँव मेरा देश संपादक का फ़रमान था "कुछ भारत के देहातों पर लिखो।" धत्तेरे की, हमें देहाती समझा है क्या जो हम देहात के बारे में लिखें? जनाब! हम शहर में रहते हैं -- वह भी बड़े शहर में जिसे अंग्रेज़ीदाँ लोग मेट्रोपोलिस कहते हैं। भाषा भी हम हिंदी में खड़ी बोली बोलते हैं और अंग्रेजी में रानी (विक्टोरिया) वाली ज़ुबान (द्दद्व
रे अन्नदाता...चिट्ठी-पत्री
रे अन्नदाता...चिट्ठी-पत्री गुढी पाडवाप्यारे बेटे जयवर्धन,कोटिशः आशीर्वाद।अभी शाम सात बजे मैं सकुशल पहुँची। मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि मैं शहर की उस दमघोटू आबोहवा से निकलकर इस वज्र देहात में अपनी जन्मस्थली में पहुँची हूँ। बेटा, हृदय से प्रसन्न हूँ। जहाँ बैठकर में यह पत्र लिख रही हूँ, यह वही क्षेत्र है जहाँ मेरा जन्म हुआ। ग
Download PDF
QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 12.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^