ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
पलाश शिरीष के फूल
पलाश शिरीष के फूल पलाशझूम रहे हैं पलाश हौले-हौले ओढ़ ओढ़नीनुपुर बजाते खवाबों केखिल गये हैं पलाश मौसम के आँगन में अहसास के परिंदों परसुर्ख अंगारे से रंग लिएऔषधीय ऊर्जा से भरपूर अपने रस में डूबे झूम रहे हैं पलाशहौले-हौलेरह-रह सर्र-सर्र गह-गह करते ओढ़ ओढ़नीनुपुर बजातेगदराई ड़ार परलहके से दहके से पलाश प्रकृति
मेरी कविता
मेरी कविता गाय को गुड़ चिड़िया को दानाभूखे की रोटी है कवितासूरदास की आंख जटायू पांख है कविताकभी खेत की फसलवीरों की नस्ल है कवितापर आज उदास है मेरी कविताबाजार के शोर में दबेसन्नाटे की बातें सुनतीगरम तवे से तपते राजपथ पर दु:खों की गठरी को ढ़ोएनंगे पैर भटकते जन कीपगरखी है मेरी कविता सत्ता की चौड़ी छाती मेंदफ़्न वादों
मूक दीवारें मोह के धागे
मूक दीवारें मोह के धागे मूक दीवारेंजिंदगी की चहक कुछ और ही होतीकाश दीवारें सुनने के साथ कुछ कह भी सकतींजमाना जान जाताभीतर उमड़ते उस ज्वालामुखी का आक्रोशकई राज जो संवादित हुए मेरे और इन दीवारों के बीचकभी सन्नाटे में बहते आँसुओं और सिसकियों की गूँजढंक लिया जिन्हें चन्द दीवारों ने मेरे और ज़माने के बीच आकरजब कभ
ऋतुराज बसन्त
ऋतुराज बसन्त आ गया ऋतुराज बसन्त ।छा गया ऋतुराज बसन्त ।।हरित घेंघरी पीत चुनरिया  पहिन प्रकृति ने ली अँगड़ाईनव-समृद्धि पा विनत हुए तरुझूम उठी देखो अमराई।आज सुखद सुरभित सा क्यों ये मादक पवन बहा अति मन्द।।फूल उठी खेतों में सरसोंमहक उठी क्यारी क्यारी।लाल, गुलाबी, नीले, पीलेफूलों की छवि है न्यारी।आज सजे फिर नये सा
मन व्यथित मेरे प्रवासी गीत में जो ढल रहा है
मन व्यथित मेरे प्रवासी  गीत में जो ढल रहा है मन व्यथित मेरे प्रवासीआज फिर इस धुन्ध में डूबी हुई स्मॄति के किनारेकिसलिये तू आ गया है? ओढ़ कर बैठा उदासीस्वप्न की चंचल पतंगों का अभी तक कौन धागाखींचता है? चीह्न है पाया नहीं हर रात जागापुष्प-शर सज्जित धनुष के छोर दोनों रिक्त पायेबस छलावों में उलझकर रह गया रे तू अभागाकिसलिये तू आस की
फिजी में रामायण मेला
फिजी में रामायण मेला भारत से लगभग बारह हजार किलोमीटर सुदूर पूर्व दिशा में बसे छोटे से फिजी द्वीप में, अक्तूबर 2016 में, पहला अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन हुआ। यह सर्वविदित है कि हमारे देश से 1879-1916 के बीच लगभग साठ हजार नागरिक, अंग्रेज सरकार ने पानी के जहाज द्वारा फिजी में गन्ने की खेती के लिए भेजे थे। रोजगार के लोभ
एडिनबर्ग नहीं एडनबरा
एडिनबर्ग नहीं एडनबरा विचार बना कि जब यॉर्क, यू.के. तक आ ही गये हैं तो दो दिनों के लिए ऐतिहासिक नगरी एडनबर्ग, स्कॉटलैंड भी हो आया जाया। इच्छा जाहिर करने पर सबसे पहले यह बताया गया कि इस शहर को लिखते एडनबर्ग हैं मगर कहते एडनबरा हैं। मान गये और सीख लिया एडनबरा बोलना, ठीक वैसे ही जैसे बचपन से स्कूल में मास्साब सिखाते रहे कि
ऐतिहासिक शहरों की रोमांचक यात्रा
ऐतिहासिक शहरों की रोमांचक यात्रा सेंट लुइस मिसौरी प्रान्त में एक बहुत बड़ा और खूबसूरत शहर है जो की मिसिसिप्पी नदी के किनारे पर है। बहुत समय से इस शहर को देखने का मन था इसलिए हाल ही में वहां जाने का अच्छा अवसर मिला। कभी पहले किसी ने बताया था कि सेंट लुइस में बच्चों के लिए भी बहुत ही अच्छे आकर्षण हैं। जाकर लगा ये तो बिलकुल सच है। बच्च
रोमांचकारी नियाग्रा यात्रा
रोमांचकारी नियाग्रा यात्रा
अमेरिका में रहकर भारत की ललक
अमेरिका में रहकर भारत की ललक भारतवंशी रहें कहीं भी दूर या पास, हृदय में बंशी भारत की ही बजती है। कितने भी सुख साधन उपलब्ध हों, दिल की हर धड़कन में नाम भारत का ही धड़कता है। दूर, सुदूर रहकर जब कोई अपना भारतवंशी मिलता है तो लगता है जैसे कोई आत्मीय मिल गया हो। बंशी की मधुर तान सहसा कानों में लगती है अमृत घोलने।आज से लगभग बीस वर्ष पू
वह तैयार है
वह तैयार है ईवान का चेहरा पीला पड़ा हुआ था। हाथों में थरथाराने की कंपन थी। उसने अपनी फाइलों और नोटबुक से अँटी मेज़ का कोना पकड़ लिया। कुछ पल वह ऐसे ही खड़ी रही। पीछे से उसे नैंसी का स्वर सुनाई दिया, "क्या हुआ ईवान?"ईवान को न चाहते हुये भी उत्तर देना पड़ा, "कुछ नहीं, ब्रेक पर जा रही हूँँ!" वह किसी के सामने अपने को बि
पण्डित पदयात्रियों की हिमालय यात्राएँ
पण्डित पदयात्रियों की हिमालय यात्राएँ भारत में सन् 1857 के असफल स्वतंत्रता संग्राम ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की चूलें हिला दी थीं। तत्कालीन सरकार देश के अंदरूनी इलाकों के साथ-साथ सीमावर्ती प्रदेशों को सुरक्षित करने में जुट गयी। भारत की उत्तरी सीमा बनाते हिमालय और उसके पार के क्षेत्रों विषयक भौगोलिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक ज्ञान अधिक नहीं थ
पालिम्यू जंगल और अमर इंडियन
पालिम्यू जंगल और अमर इंडियन तारीखों के इतिहास में बंद पड़ा है अतीत के एक सौ चालीस वर्षों का दर्दनाक इतिहास। अहर्निश होने वाली वर्षा ने धोया है, बहाया है दु:ख-दर्द का इतिहास। लेकिन पानी के धोने और बहाने से नहीं खतम होता है-ऐतिहासिक दर्द। जिसे पीढ़ियां जीती हैं, भोगती हैं।सूरीनाम की मोहिनी वसुधा पर वनदेवी की महती कृपा है। धरती का
मैं उस जगह हूँ जहाँ फासला रहे तुमसे
मैं उस जगह हूँ जहाँ फासला रहे तुमसे जयपुर के लोकायत प्रकाशन पर जिस किताब पर मेरी नज़र पड़ी, वह थी आवाज़ चली आती है। इस नायाब किताब के शायर हैं मरहूम जनाब शाज़ तमकनत साहब। हिंदी पाठकों के लिए शायद ये नाम अंजाना हो लेकिन दकन में इनका नाम बहुत इज्ज़त से लिया जाता है। शाज़ साहब उर्दू के उन चन्द शायरों में शुमार किये जाते हैं जिन्होंने उर्दू साह
देखणा सो भूलणा नहीं
देखणा सो भूलणा नहीं जीव का मूल स्वभाव है जिज्ञासा। यह उसकी मूलभूत जैविक आवश्यकताओं के कारण भी हो सकती है और मानसिक व वैचारिक ज़रूरतों के तहत भी। यह जिज्ञासा ही जीव को घुमाती है, सिखाती है और भटकाती भी है। परिस्थितिवश यह भाव कम-ज्यादा होता रहता है। जब मानव घुमंतू था तब भ्रमण का यह भाव सब में समान रूप से पाया जाता था लेकि
अरे यायावर रहेगा याद
अरे यायावर रहेगा याद आज यात्राएं होती हैं पर वे पूंजी निवेश के लिये जितनी हैं उतनी शब्द निवेश के लिये नहीं। शब्द निवेश के बिना पूंजी की अर्थहीनता विश्व को ही डुबो देगी। क्योंकि विश्व पूंजी में नहीं शब्द में बसता है। इस सृष्टि का गर्भनाल शब्द से जुड़ा है। पूंजी से नहीं।आखिर किसी यायावर को क्या याद रहता होगा। और वह क्या भू
होना शुरू होना
होना शुरू होना सागर शहर की झील के किनारे नजरबाग की सीढ़ियों पर बैठा निर्मल वर्मा के निबन्धों की किताब -- शब्द और स्मृति -- पढ़ रहा हूँ। जैसे कोई जलस्रोत किसी नदी में मिल जाने के लिए आकुल हो। दूर ठहरी हुई शब्दों की कोई नौका स्मृति की पतवारों से धीरे-धीरे चलने लगी है। मैं पानी में बहती हुई निर्मल वर्मा की आवाज सुन रहा
अमेरिकन-ऑस्ट्रेलियन संस्कृति के बिम्ब
अमेरिकन-ऑस्ट्रेलियन संस्कृति के बिम्ब छब्बीस वर्ष पूर्व मैं भारत छोड़कर ऑस्ट्रेलिया आया था, यहाँ बस जाने के लिये। अपनी जड़ों से अलग होने के कारण यह स्वाभाविक था कि किसी भी प्रवासी की तरह यहाँ की भाषा, रहन-सहन खान-पान और संस्कृति को सीखते-सीखते स्वयं में बदलाहट हो जाय। दार्शनिक ढंग से यह भी सोचता हूँ कि सभी बदलाहट से बची हुई चीज याने "मैं
चलो विलायत
चलो विलायत आख़िर लोग यात्रा क्यों करते हैं? आराम से घर क्यों नहीं बैठते? लो यह भी कोई पूछने की बात है! यह तो इंसानी  फ़ितरत है साहब। सुना है ना कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। जब तक काम काज में मसरूफ़ रहे -- भलमनसाहत से घर में बैठे रहे; पर ज्यों ही फ़ुरसत के लम्हे मयस्सर हुये -- कुलबुलाने लगे कि अब क्या कर
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