ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चिड़ियाँ
चिड़ियाँ पौ फटते मुंडेर पर बैठीं चहक जगातीं नींद से चिड़ियाँभोली भाली छल कपट से दूर मासूम मतवाली चिड़ियाँकहाँ उड़ गईं कौन से देस पधारीं सुंदर चितचोर चिड़ियाँसूना सूना घर का आँगन बिना चहकती नन्ही चिड़ियाँ।चिड़ी चोंच भर ले गई अब कैसे लिखे कबीरदादी हँस कर कैसे बोले नदी न घटियो नीरआते जाते मिल जाएँ कहीं तो कहना मेरी स
दूर देश में
दूर देश में दूर देश रह कर भी हम हर रोज मनाते हैं स्वदेश।नन्हीं-नन्हीं बातों मेंढूँढा करते अपना देश।लहजा बदल गया है परबदली नही तहज़ीबपुश्तें बदल गई हैं फिर भी हम बने नहीं अँगरेज।बर्गर से सुबह होती है परपरांठे पर अब भी दिल अटकेपौष्टिक दूध पीते हैं लेकिनअब भी खोजें दही भल्ले।दिन गुजरे हैे जींस-टीशर्ट में कम्फर्ट की
शहर में ये कौन आया?
शहर में ये कौन आया? टूटे अरमानों के तेज भँवर में ये कौन आया,पुरानी यादों के फूटे खँडहर में ये कौन आया?जमाना तो क्या, हम थे खुद को भूल बैठे,पता पूछता हमारा शहर में ये कौन आया?होके जार-जार हम तो कब के मिट चुके हैं,होके तार-तार सभी अरमां बिखर चुके हैं। आइना भी हमको पहचानता नहीं अब, खुदा जाने ऐसे मंजर में ये कौन आया?पता पू
चूहा दौड़ प्रतिक्रिया नियन्त्रण
चूहा दौड़  प्रतिक्रिया नियन्त्रण चूहा दौड़आधुनिकीकरण वरदान या मुसीबतों की खान? वहशी हैं सिंह या आधुनिक भगवान?हो जाता है इलाज साँप के काटे का पर अर्थशास्त्री हों या अधिवक्ताहै कोई जवाब इनके चाँटे का?कैसे बचें हम आधुनिक मानवों की इस होड़ से?आतंकित हैं दिशायें तक इस चूहा दौड़ से।प्रतिक्रियासुनते हैंस्वदेश का अभिषेक सर्वस्व से करते थेपर द
हस्तक्षेप का कवि विनोद कुमार शुक्ल
हस्तक्षेप का कवि विनोद कुमार शुक्ल  विनोद कुमार शुक्ल समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण कवि हैं। अपनी कविता में उन्होंने तमाम ऐसे विषयों को जगह दी है, जिसकी जरूरत आज समाज में सबसे ज्यादा है। तेजी से भागती दुनिया में पीछे छूटे हुए लोग, रौंदी गई, लुटी गई चीजें, सताई गई जातियां, संरक्षण के नाम पर नेस्तनाबूद की गई संस्कृतियां तथा सहमे, न
वैद वेदना
वैद वेदना कथाकार कृष्ण बलदेव वैद के शब्द मेरी देह पर उड़ती हुई खाक की तरह झरते हैं और यह खाक देह पर ठहरती नहीं, पल-पल उसी में विलीन होती जाती है। आँखों की कोरों पर भाषा के काजल की तरह कुछ देर ठिठकती जरूर है जैसे किसी वाक्य की रेखा हो और जो बह जाना चाहती हो।उन्हें पढ़ते हुए आँसुओं के छलकने के पहले ही पीने का अनु
नई दुनिया का पुराना कवि
नई दुनिया का पुराना कवि दो जुलाई 2017 को दिवंगत, 21 फरवरी 1924 को नवलगढ़, राजस्थान में जन्मे और गया बिहार में पले-बढ़े श्री गुलाब खंडेलवाल हिंदी के वरिष्ठतम साहित्यकार थे।जैसे ही उनके निधन का समाचार मिला तो कई यादें ताज़ा हो गईं। बात जुलाई 2000 की है जब मैं अपने सबसे छोटे बेटे के पास अमरीका के ओहायो राज्य के सोलन कस्बे में था
जे. कृष्णमूर्ति की अन्तर्दृष्टि
जे. कृष्णमूर्ति की अन्तर्दृष्टि सार्थक और विशिष्ट जीवन में दृष्टि सम्पन्न जीवन-    दर्शन की गुणवत्ता स्वतः समाहित हो जाती है। सत्य की सिद्धियाँ भी जीवन में साधना से ही हासिल होती है। विगत दिनों नीदरलैंड के महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध डच और जर्मन भाषी कवि हैरमन फनफीन से उनके आवास पर मुलाकात हुई। तीन घंटे तक की गहरी सघन बा
गलियों में गालियाँ काशी का अस्सी उपन्यास में बोलचाल की भाषा
गलियों में गालियाँ काशी का अस्सी उपन्यास में बोलचाल की भाषा  वैसे तो वाराणसी को अक्सर "होली सिटी" कहते हैं। पर वहाँ रहनेवालों की बोली को लेकर वाराणसी बिलकुल "होली" (यानी पवित्र) नहीं लगती। कम से कम मुझे यह अनुभव हुआ काशीनाथ सिंह का लोकप्रिय "काशी का अस्सी" उपन्यास पढ़ने के बाद। जितने गंदे शब्द, गाली-गलौज, बोलचाल की ज़बान और गाने-कविताएँ इस उपन्यास में हैं उतने
हिंदी से चीनी संस्कृति की आत्मा छूना बी.आर. दीपक की चीनी कविता पर कुछ विचार
हिंदी से चीनी संस्कृति की आत्मा छूना बी.आर. दीपक की चीनी कविता पर कुछ विचार प्राचीन काल से ही चीन और भारत दोनों कविता के देश हैं। कविता मानवीय संस्कृति की आत्मा भी कही जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि कविता का कभी भी अनुवाद नहीं किया जा सकता। यह बात असत्य तो नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह नहीं है कि कविता के अनुवाद करने का काम मूल्यहीन होता है। कहा जाता है कि चीन और भारत के सां
क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं
क्या भूलूँ क्या याद करूँ मैं बड़ा मुश्क़िल सवाल है साहब! याद करना - मतलब सबक़ याद करना तो मुश्किल था ही, अब पता चला है कि भूलना उससे भी कठिन काम है। याद की बात पर आपको बता दें कि बचपन में पाठ याद ना करने पर मास्टरनी जी मुर्गा बना दिया करती थीं। मगर जैसे जैसे बड़े होते गये यह मुसीबत और भी बड़ी होती गयी। भाइयों और बहनों! ज़िंदगी में सि
स्मृति के द्वार पर दस्तक
स्मृति के द्वार पर दस्तक भाव तो सभी के मन में उठते हैं, अनुभूति बनते हैं और फिर कुछ कहने की इच्छा होती है। पर लेखक के जीवन में निरंतर एक ऐसा स्मृति संचय होता रहता है जो लेखक से खुद अपना साक्षात्कार तो करवाती ही है वह उसे दूसरों के सामने भी खड़ा कर देती है। प्रत्येक लेखक अपनी स्मृति का द्वार खटखटाकर ही दूसरों के जीवन में झाँक
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