ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कुछ चीज जेब
कुछ चीज जेब

कुछ चीज

कुछ चीजें
एक छोटी-सी चूक
थोड़ी-सी भूल
ज़रा सी लापरवाही से
खराब हो जातीं हैं...
खो देतीं है
अपना रंग रूप
अपनी चमक
अपनी महक...
हो जातीं हैं
बदरंग, बदबूदार...
और इनमें
पड़ जाते हैं कीड़े...
जो धीरे-धीरे
इन्हें खत्म ...

कविता एक दो
कविता एक दो

एक

देख रहे है नींद का रास्ता एकटक
चौखट पर नज़रें टिका कर
वो दबे पाँव चली गयी
मुझसे नज़रें बचा कर
जब हम लगे खोजने
नींद को इधर-उधर
वो बैठी थी आपके नयनों में छुपकर!

दो

वो खेतों के मुंडेर पर बैठकर सखियों से बतियाना
आज भी याद है
आम ...

आदमी होना नन्ही-सी चिड़िया
आदमी होना नन्ही-सी चिड़िया

आदमी होना

मैं पेड़ों की तरफ
पीठ करके चिल्लाऊंगा
ठीक तुम्हारे सामने
और पीछे खड़े पेड़ हिनहिनाएंगे
घोड़े की तरह जान जाएंगे
कि कभी पेड़ ही था मैं भी
मगर मुझे नहीं आया
पेड़ होना
और नहीं सीख पाया मैं
लकड़ियों के बीच रहकर जलना
और एक दिन
बाड़े ...

प्रवासी का दुःख गृहिणी की शिकायत
प्रवासी का दुःख   गृहिणी की शिकायत

प्रवासी का दुःख

बहुत दिनों तक मौन रही
अब देती हूँ आवाज़
क्या है एक प्रवासी का दुःख
बतलाती हूँ आज

जब से जन्मी, घर में आई
चौक बुहारा, मेज़ सजाई
भाई  से  जब हुई लड़ाई
माँ बोली-
"अपने घर जाकर फैलाना यह साज"

...

पत्रकारिता में इतिहास बोध और राजेन्द्र माथुर
पत्रकारिता में इतिहास बोध और राजेन्द्र माथुर

अतीत की बुनियाद पर हमेशा भविष्य की इमारत खड़ी होती है। जब तक इतिहास की ईंटें मज़बूत रहती हैं, हर सभ्यता फलती-फूलती और जवान होती है। लेकिन जैसे ही ईंटें खिसकने लगतीं हैं, इमारत कमज़ोर होती जाती है। शिल्पियों ने अगर सही ईंट का चुनाव न किया तो घुन लगता है। इमारत ज़र्ज़र होती है। ज्ञान के जिस गारे का इस्त ...

हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक संकट
हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक संकट

पत्रकार शिरोमणि बाबूराव विष्णु पराड़कर ने लगभग एक शताब्दी साल पहले हिंदी संपादक सम्मेलन में कहा था, "पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनिकों तथा सुसंगठित कंपनियों के लिए संभव होगा। पत्र सर्वांग सुंदर होंगे, आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक चित्रों से सुसज्जित हों ...

हिंदी की नामी पत्रिकाएँ
हिंदी की नामी पत्रिकाएँ

जब मैंने सुचित्रा-माधुरी का समारंभ किया तो मेरे सामने एक स्पष्ट नज़रिया था। मैं एक ऐसे संस्थान के लिए पत्रिका का आरंभ करने वाला था, जो पहले से ही अंगरेजी की लोकप्रिय पत्रिका फ़िल्मफ़ेअर का प्रकाशन कर रही थी। आरंभ में वहाँ का मैनेजमैंट फ़िल्मफ़ेअर का हिंदी अनुवाद ही प्रकाशित करना चाहता था। इसके लिए मैं ...

आधी आबादी का पक्ष
आधी आबादी का पक्ष

पिछले महीने की आठ तारीख़ यानी आठ मार्च को जब दुनियाभर में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा था तो मेरे दिमाग़ की शिराओं में महिलाओं की सदियों से चली आ रही व्यथा कथा की चित्रमाला दौड़ रही थी। अपने दिमाग़ के कोने में चल रहे इन चलचित्रों को देखकर लग रहा था कि वाक़ई में महिलाओं की स्थिति दुनिया के सभ ...

भौतिकवादी संस्कृति का वैश्वीकरण
भौतिकवादी संस्कृति का वैश्वीकरण

भौतिकवादी संस्कृति क्या है? इसकी किताबी परिभाषा क्या है? इसकी जमीनी पहचान क्या है? क्या इसका रूप अपरिवर्तनशील है? निरपेक्ष है? या समाज और समय की परिधि में परिवर्तनशील है? यदि यह सापेक्ष है तो तुलनात्मक मापदंड क्या है? ऐसी कौन-सी सामाजिक मान्यता है जो शाश्वत है, अचल है, समय के कालचक्र से स्वतंत्र ...

चार पुरुषार्थ - आधुनिक नजरिया
चार पुरुषार्थ - आधुनिक नजरिया

मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए हैं। ये हैं- धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। लेकिन इन चारों का उद्देश्य क्या है? धर्म का उद्देश्य मोक्ष है, अर्थ नहीं। धर्म के अनुकूल आचरण करो तो किसके लिए? मोक्ष के लिए। अर्थ से धर्म कमाना है, धर्म से अर्थ नहीं कमाना। धन केवल इच्छाओं की पूर्ति के लिए मत कमाओ।
...

गुजरते समय में पत्रकारिता
गुजरते समय में पत्रकारिता

सुना है कि जब से इंडिया टीवी का मालिक बदल गया है, उसका लहज़ा भी
बदल गया। ज़ाहिर है वे कार्यकर्ता हैं और अपने अन्नदाता की ही भाषा बोलेंगे -
his master's voice! साहबान, बदल जाये अगर माली चमन होता नहीं
खाली, रोकड़ा तब भी आता था, रोकड़ा अब भी आयेगा। परन्तु बे ...

अनुकरणीय पहल
अनुकरणीय पहल

भारतीय मूल के अप्रवासी डॉ. आलोक एवं डॉ. संगीता अग्रवाल अचानक जब हैदराबाद में अपने स्कूल के समय की शिक्षिका कुमारी सुमना जी से मिले और उनके सामाजिक कार्य और उनके त्याग का पता चला, तो त्यागमयी प्रवृत्ति होने के कारण तुरंत उनके साथ सहयोग करने का निर्णय ले लिया और अपनी अध्यापिका के गाँव बुर्गुला के व ...

शाम होती है तो घर ज़ाने को जी चाहता है
शाम होती है तो घर ज़ाने को जी चाहता है

शायरी की किताबों को खोजते हुए जब
    नए मौसम की खुशबू किताब पर
     मेरी नज़र पड़ी तो लगा जैसे गढ़ा खज़ाना हाथ लग गया है। इस किताब के शायर हैं जनाब इफ्तिख़ार आरिफ़। किताब के पहले पन्ने पर दर्ज शेर - मेरे खुदा मुझे इतना तो मोतबर कर दे / मैं जिस मकान में रहता हूँ ...

मुक्ति के पिंजरे
मुक्ति के पिंजरे

शिक्षा, चिकित्सा और न्याय ये तीन क्षेत्र ऐसे हैं जिनसे और जहाँ से समाज के स्वरूप, निर्माण और विकास की दिशाएँ तय होती हैं। ये किसी के पद, धन, वंश, नस्ल आदि के आधार पर नहीं बल्कि आवश्यकता और पात्रता के अनुसार काम करते हैं। दवा और इलाज़ मर्ज़ और मरीज़ के अनुसार होने चाहिए न कि उसके धन और पद के अनुसार। ...

भारतीय भाषाओं के अखबार
भारतीय भाषाओं के अखबार

अनेकों बार इस प्रश्न से सामना करती हूँ कि शिकागो में गुजराती, तमिल,
तेलुगु, भाषाओं के अखबार तो छपते हैं, लेकिन हिंदी में कोई अखबार क्यों
नहीं प्रकाशित होता? क्या यहां हिंदीभाषियों की संख्या कम है अथवा
किसी को हिंदी अखबार की जरूरत ही महसूस नहीं होती।...

नये वर्ष की देहरी पर राम की याद
नये वर्ष की देहरी पर राम की याद

हे राम मेरा यह हृदय ही तुम्हारा घर है और इस पर बड़ी विपत्ति आयी हुई है। इस घर
पर काम-क्रोध-लोभ-अहंकार ने धावा बोल दिया है। ये चारों तस्करों की तरह तुम्हारे
घर को लूट रहे हैं। मुझे चिन्ता हो रही है और मैं तुम्हारे घर को इस तरह लुटते हुए
नहीं देख सकता। त ...

ग़ज़ल एक दो
ग़ज़ल एक दो

एक

जहाँ पर हो गयी समझो शम"अ से बंदगी की हद
वहीं पे ख़त्म होती है पतंगे की ख़ुदी की हद
खड़ी पाई का तो बस काम ही है रोकना सबको
किसी दिन तय करेगी ये मेरी भी ज़िंदगी की हद
जहाँ उम्मीद की इक भी किरण पहुँची नहीं अब तक
वहीं तक है सुनो मन में हमारे तीरगी की हद
अभी तो ...

पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद
पत्रकारिता : स्वतंत्र या स्वच्छंद

समाचार-पत्र आधुनिक मनुष्य के ऊपर एक बहुत बड़ा अत्याचार है। साथ ही, वह हमारी संवैधानिक आज़ादी का माध्यम भी है। ...मनुष्य की आजादी एक टेढ़ी खीर है। किसी भी व्यवस्थित समाज में अभिव्यक्ति की पगडंडियां बनती जाती हैं। आज़ादी के औजार बने-बनाये रहते हैं। औसत मनुष्य उन औजारों के सहारे अपनी स्वतंत्रता का बोध क ...

मीडिया पर "लाल" पहरा
मीडिया पर

मैंने ये फ़ैसला कर लिया था कि अब मैं अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे अशेष के साथ चीन चली जाऊँगी। आखिर मैं कब तक घर, नौकरी सबकुछ अकेली संभालती रहती। वैसे भी ग्रेजुएशन के बाद से ही शिक्षण, अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न में काम करते-करते किसी हद तक मेरी कैरियर संबंधी लिप्सा शांत हो चुकी थी। फिर इस उड़ान की तो को ...

कवि-सम्मेलन बनाम वार्षिक मिलन समारोह
कवि-सम्मेलन बनाम वार्षिक मिलन समारोह

भारतवंशियों की युवा पीढ़ी परम्परागत संस्कृति और उसके आयोजन में रुचि नहीं
लेती, इस धारणा को बदलना होगा। हमें युवाओं को आगे बढ़कर मंच पर
सहभागिता के लिये प्रेरित करना होगा ताकि वे अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति को
उजागर कर सकें और भविष्य में इस तरह के दायित्व क ...

सुनो तुम्हारी भी कहानी है
सुनो तुम्हारी भी कहानी है

तुम्हें तो पत्नी, पत्नी की सहेली या कामवाली बाई में कोई फर्क ही नजर नहीं आता था, तुम्हें तो बस एक नयापन चाहिये। कौन-कौन से फार्मूलों की बात किया करते थे तुम, जैसे बहुत बड़े साइंटिस्ट हो और इस बारे में गहरी रिसर्च कर रखी है।

बरसों बाद भारत लौटी हूँ। काफी कुछ बदला ...

यूरोपीय पत्रकारिता का चरित्र
यूरोपीय पत्रकारिता का चरित्र

यूरोप की पत्रकारिता का इतिहास यूरोप के ही समानान्तर है। भारत की पत्रकारिता यूरोपीय देशों तक पहुंचते-पहुंचते जर्नलिज्म में और नीदरलैंड में आकर न्यूज़ ज़ुर्नाल में तब्दील हो जाती है। तकनीकी साधनों की सहूलियत ने यूरोप की पत्रकारिता की गति में त्वरा पैदा की है और सूचनाओं के क्षेत्र में विविधवर्णिता भी ...

गांधी जी और पत्रकारिता
गांधी जी और पत्रकारिता

गांधी जी ने पत्रकारिता को कभी एक व्यवसाय के रूप में
स्वीकार नहीं किया। वे एक मिशनरी पत्रकार थे और
वे इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि उनके
मिशन की सफलता के लिए पत्रकारिता
एक अत्यंत सशक्त माध्यम है।

गांधी जी का व् ...

मेरे देश की मिट्टी
मेरे देश की मिट्टी

अब तो सभी जानते हैं कि कज़ाकिस्तान एक युवा और स्वतंत्र राज्य है। जिसकी अर्थव्यवस्था सफलतापूर्वक लगातार विकसित हो रही है। हमारा देश कैस्पियन सागर से चीन तक फैला हुआ है। मेरे लिए कज़ाकिस्तान सिर्फ जमीन नहीं है जिस पर हम पैदा हुए। पैदाइशी तौर पर यह मेरे लिये सबसे महत्वपूर्ण और पसंदीदा देश है, क्योंकि ...

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