ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
राम की शक्ति पूजा
राम की शक्ति पूजा

है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार
अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल
भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।

स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय
रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय
जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रान ...

निःशस्त्र सेनानी
निःशस्त्र सेनानी

सुजन, ये कौन खड़े हैं? बन्धु! नाम ही है इनका बेनाम।
कौन करते है ये काम? काम ही है बस इनका काम।
 
बहन-भाई, हां कल ही सुना, अहिंसा आत्मिक बल का नाम
पिता! सुनते है श्री विश्वेश, जननि? श्री प्रकॄति सुकॄति सुखधाम।
 
हिलोरें लेता भीषण सिन्धु पोत पर नाविक है तैयार< ...

सखि वे मुझसे कह कर जाते
सखि वे मुझसे कह कर जाते

सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी
पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते।


स्वयं सुसज्जित करके क्षण में
प्रियतम को, प्राणों के प ...

कामायनी
कामायनी

कोमल किसलय के अंचल में
नन्हीं कलिका ज्यों छिपती-सी
गोधूली के धूमिल पट में
दीपक के स्वर में दिपती-सी।

मंजुल स्वप्नों की विस्मृति में
मन का उन्माद निखरता ज्यों-
सुरभित लहरों की छाया में
बुल्ले का विभव बिखरता ज्यों-
वैसी ही माया में लिपटी
अधरों पर उ ...

वीरों का कैसा हो बसंत
वीरों का कैसा हो बसंत

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार-बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।
 
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर देश में किन्तु कन्त-
वीरों का कैसा हो बसन ...

ब्रह्मराक्षस
ब्रह्मराक्षस

शहर के उस ओर खँडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठण्डे अँधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की
सीढ़ियाँ डूबी अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में
समझ में आ न सकता हो
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो। बावड़ी को घेर
डालें खूब उलझी हैं,
खड़े हैं मौन औद ...

नदी के द्वीप
नदी के द्वीप

हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़ कर स्रोतस्विन बह जाय।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियां, अन्तरीप, उभार, सैकत-कूल,
सब गोलाइयां उसकी गढ़ी हैं।
 
मां है वह। है, इसी से हम बने हैं।

किन्तु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्प ...

दुखी जीवन
दुखी जीवन

दुख का एक बड़ा कारण है अपने-ही-आप में डूबे रहना, हमेशा अपने ही विषय में सोचते रहना। हम यों करते तो यों होते, वकालत पास करके
अपनी मिट्टी खराब की, इससे कहीं अच्छा होता कि नौकरी कर ली होती। अगर नौकर हैं तो यह पछतावा है कि वकालत क्यों न कर ली।

लड़के नहीं हैं तो यह फिक्र मारे डालती है कि ल ...

अंग्रेजी के गुण और दोष
अंग्रेजी के गुण और दोष

जब से भारत में राष्ट्रीयता का आविर्भाव हुआ, लोग अंग्रेजी शिक्षा के विरुद्ध बहुत-सी बातें कहने लगे हैं। इस शिक्षा का सबसे बड़ा दोष यह बताया जाता है कि इसके कारण भारत के शिक्षितों और अशिक्षितों के बीच एक खाई-सी खुद गई और जो भी आदमी ग्रेजुएट हुआ, वह अपने ही लोगों के बीच अजनबी बन गया। इसी प्रकार का अप ...

एक पुरानी चट्टान
एक पुरानी चट्टान

आज जब हम अंग्रेजी हटाने की बात करते हैं, तब सवाल अंग्रेजी का नहीं है। सवाल तीन हजार साल पुरानी आदत बदलने का है। यह चट्टान अंग्रेजों ने हमारे ऊपर नहीं रखी है। वह एक प्रागैतिहासिक चट्टान है, जो आजादी के ज्वालामुखी में तप रही है और लावा बनकर बहना चाह रही है।

भाषा के मामले में भारत उस लंगड़ ...

गोदान
गोदान

होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा- "गोबर को ऊख गोड़ने भेज
देना। मैं न जाने कब लौटूं। जरा मेरी लाठी दे दो।" धनिया के हाथ गोबर से भरे थे। उपले थापकर आयी थी। बोली- "अरे, कुछ-रस पानी तो कर लो। जल्दी क्या है?"
होरी ने अपनी झुर्रियों से भरे हुए माथे को सिकोड़कर क ...

खंजन नयन
खंजन नयन

वृन्दावन से लगभग दो कोस पहले ही पानीगांव के पास वाले किनारे पर खड़े चार-छह लोगों ने सुरीर से आती हुई नाव को हाथ हिला-हिलाकर अपने पास बुला लिया : "मथुरा मती जइयों। आज खून की मल्हारें गाई जा रही हैं वांपे..."
सुनकर नाव पर बैठी सवारियां सन्न रह गईं। उन्नीस-बीस जने थे; तीन को वृन्दावन उतरना था, ब ...

मैला आँचल
मैला आँचल

गाँव में यह खबर बिजली की तरह फैल गई - मलेटरी ने बहरा चेथरू को गिरफ्तार कर लिया है और लोबिनलाल के कुँए से बाल्टी खोलकर ले गए हैं। यद्यपि 1942 के जन-आन्दोलन के समय इस गाँव में न तो फौजियों का कोई उत्पात हुआ था और न आन्दोलन के समय इस गाँव तक पहुँच पाई थी। किन्तु जिले-भर की घटनाओं की खबर अफवाहों के र ...

लाल टीन की छत
लाल टीन की छत

सब तैयार था। बिस्तर, पोटलियाँ-एक सूटकेस। बाहर एक कुली खड़ा था, टट्टू की रास थामे-अनमने भाव से उस मकान को देख रहा था, जहाँ चार प्राणी गलियारे में खड़े थे- एक आदमी, एक औरत, एक बहुत छोटी औरत, जो बौनी-सी लगती थी- और उनसे जरा दूर एक गंजे सिरवाला लड़का, जो न आदमी जान पड़ता था, न बच्चा, लेकिन जिसका मुँह खुल ...

जीवित रहेगा प्रमथ्यु
जीवित रहेगा प्रमथ्यु

कभी-कभी इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं और अक्सर आते हैं, जब जीवन के किसी मोड़ पर देखी, सुनी या पढ़ी रचना साक्षात् मूर्त हो जाती है। सामयिक और प्रासंगिक हो जाती है। उसके प्रतीक नूतन अर्थ के आलोक में भास्कर हो उठते हैं। जीवन को नई दृष्टि मिलती है, अनुभवों को नया अर्थ मिलता है। धर्मवीर भारती की एक लम्बी ...

अद्र्धनारीश्वर : एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व
अद्र्धनारीश्वर : एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व

काहानी, उपन्यास और नाटकों के रचनाकार विष्णु प्रभाकर वैसे तो हिंदी साहित्य के लिए एक प्रतिष्ठित नाम हैं किन्तु उनकी पुस्तक "आवारा मसीहा" ने उन्हें एक उत्कृष्ट जीवनीकार के रूप में भी स्थापित कर दिया जो कि जाने-माने बंगला उपन्यासकार शरतचंद्र के जीवन को लेकर लिखी गई थी। विद्वान् लेखक विष्णु प्रभाकर क ...

गुजिश्ता दौर के ऐतिहासिक चरित्र
गुजिश्ता दौर के ऐतिहासिक चरित्र

साहित्यिक दृष्टि से आज हिंदी बहुत समृद्ध है। नाना विधाओं के साहित्य से हिन्दी का रचना संसार जगर-मगर है। कविता की सरिता तो आठवीं-नवीं सदी में ही बह निकली थी। लेकिन गद्य का झरना उन्नीसवीं सदी में आके फूटा। गद्य की विधाओं में सबसे प्रमुख विधा उपन्यास है और इस उपन्यास लेखन की परंपरा आधुनिक काल के अपन ...

महेश अनघ की कहानियां कौतूहल काव्य रस और सामाजिक न्याय की त्रिवेणी
महेश अनघ की कहानियां  कौतूहल काव्य रस और सामाजिक न्याय की त्रिवेणी

समकालीन हिन्दी की कृतियों में "जोग लिखी" और "शेषकुशल" नवगीतकार और कथाकार महेश अनघ के ये    दो कहानी संग्रह, इस कारण से उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं क्योंकि इनमें कौतूहल काव्य रस और सामाजिक न्याय की अनूठी त्रिवेणी प्रवहमान है। कहानी में कौतूहल अर्थात आगे क्या? की जिज्ञासा यों तो कहानी ...

निज भाषा-लिपि स्वाधीनता का मूलाधार
निज भाषा-लिपि स्वाधीनता का मूलाधार

पराधीनता का चित्त और चेतना से गहरा रिश्ता है। पराधीनता व्यक्ति को जितना पीड़ित और प्रताड़ित करती है। इसके विपरीत, स्वाधीनता उतना ही आह्लादित करती है वह फिर, राजनीतिक हो या व्यक्तिगत। स्वाधीनता वस्तुत: अन्तश्चेतना के आनंद का सृजनात्मक निनाद है।
भारत के अपने स्वाधीनता-संघर्ष के साथ-साथ हिन्दी भा ...

मेरे प्रिय लेखकों की रचनाएँ
मेरे प्रिय लेखकों की रचनाएँ

हिंदी साहित्य में बहुत कृतियाँ हैं जो मेरी नज़र में श्रेष्ठ हैं उनमें से कुछ का उल्लेख मैं यहाँ कर रही हूँ यशपाल की "दीनता का प्रायश्चित्त" हिंदी साहित्य की मेरी सबसे पसंदीदा और श्रेष्ठतम कहानी है। यह कहानी मैंने उच्च विद्यालय में हिंदी कक्षा में पढ़ी थी। इस कहानी ने उस समय मेरे हृदय में हिंदी साहि ...

मेरी कुछ पसंदीदा किताबें
मेरी कुछ पसंदीदा किताबें

पढ़ना मेरा शगल था। उस वक्त मैं बहुत छोटी थी, शायद दूसरी, तीसरी कक्षा में। पापा को पढ़ने का शौक aथा, वे लायब्ररी से पुस्तकें लाते थे। पुलिस की नौकरी, थककर आते थे और पढ़ते-पढ़ते सो जाते। उन्हें जासूसी कहानियाँ पढ़ना बड़ा अच्छा लगता था। उनके सोने के बाद ये जासूसी कहानियाँ मेरे कब्जे में आतीं थी और मैं किस ...

हिंदी वालों को कैसे जगाएं
हिंदी वालों को कैसे जगाएं

हम अपनी मातृभाषा बोलने में ठीक वैसे ही शर्माते हैं जैसे कि एक मजदूर औरत के खून पसीने कि कमाई से पढ़ लिखकर बाबू बना बेटा अपनी उसी मजदूर माँ को, माँ कहते हुए शर्माता है। हिंदी उस रानी की तरह है जिसे बाहर के राष्ट्र अपनी पटरानी बनाना चाहते हैं और उसका अपना राज्य और जनता उसे नौकरानी का तमगा दे चुकी है ...

सुनो गौर से हिंदी वालों
सुनो गौर से हिंदी वालों

हिंदी दिवस मनाने का प्रचलन करने वालों ने भले और कुछ भी सोचा होगा, लेकिन निश्चित तौर पर उन लोगों ने इस दिन की कल्पना इस रूप में नहीं की होगी कि इस दिन हिंदी की दुर्दशा (वास्तविक या काल्पनिक) पर सामूहिक विलाप किया जाए। कहीं हिंदी की स्थिति कहानी के उस भिखारी जैसी तो नहीं हो गई जो कभी बिना गद्दे और ...

हमारा पुस्तक प्रेम
हमारा पुस्तक प्रेम

पुनर्जन्म को मद्देनज़र रखते हुये रसखान बाबा की यह रचना हमें बड़ी पसन्द है। अब हम गांव में के ग्वालों के बीच में तो नहीं रह सकते, मिज़ाज से थोड़ा शहरी जो हैं; परन्तु "पंछी बनूँ, उड़ती फिरूँ मस्त गगन में" वाला आइडिया हमें भा गया। पंछी बन के यमुना किनारे कदम्ब के वृक्ष पर बसेरा -- वाह क्या बात है! सारी क ...

मेरी हिंदी, मेरी भाषा, मेरी माँ
मेरी हिंदी, मेरी भाषा, मेरी माँ

जब मैं कोई अक्षर नहीं जानती थी तो मैंने सबसे पहले क्या बोला होगा? अपनी माँ को अपनी भाषा में शायद "माँ" कहा होगा जब मुझे कभी डर लगा होगा, तो भी मैं घबराकर चिल्लाई होऊंगी अपनी भाषा में मैं पहली बार जब ख़ुशी से पागल हो गयी होऊंगी तो भी मैंने इसे व्यक्त किया होगा

जब मैं कोई अक्षर नहीं जानती थी ...

इतना हुए क़रीब कि हम दूर हो गए
इतना हुए क़रीब कि हम दूर हो गए

बहते हुए अश्कों से ग़म की लज्जत उठाने वाले इस अज़ीम शायर का नाम है गणेश बिहारी "तर्ज़", जिनकी किताब "हिना बन गयी ग़ज़ल" के हिंदी संस्करण का अनावरण हो उससे  पहले ही 17 जुलाई 2009 को वे इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से कूच कर गए।
ज़िन्दगी का ये सफ़र भी यूँ ही पूरा हो गया
इक ज़रा नज़रें उठायीं थीं कि पर्दा ...

आदमी का विकल्प नहीं हो सकता
आदमी का विकल्प नहीं हो सकता

जीवित होने का प्रमाण-पत्र जमा करवाने लगभग नौ महीने बाद बैंक गया। कारण एक तो पास बुक भरने वाली थी दूसरे कई महीने की प्रविष्टियाँ बाकी थीं। देखा, बैंक में कई परिवर्तन हो गए हैं। नौ महीने कम नहीं होते। इतने अंतराल में एक नए सिस्टम ने जन्म ले लिया था। संबंधित बाबू को पासबुक दी तो हमारी पासबुक को पलटक ...

किताबें पढ़ने का अनुशासन
किताबें पढ़ने का अनुशासन

भारत भाषा और संस्कृति की विविधता का देश है। भारत में ऐसे अनेकों महान लेखक, साहित्यकार, कवि, विचारक और दार्शनिक रहे हैं जिन्होंने एक पूरी पीढ़ी को अपनी कृतियों से प्रभावित किया है और नयी पीढ़ी के लिए भी ये प्रेरणादायक रहे है। इनकी कृतियों को पूरी दुनिया में न केवल प्रसिद्धि मिली, बल्कि लाखों पाठकों ...

उर्दू साहित्यकार डॉ. वजाहत हुसैन रिजवी से प्रख्यात पत्रकार राजू मिश्र की बातचीत
उर्दू साहित्यकार डॉ. वजाहत हुसैन रिजवी से प्रख्यात पत्रकार राजू मिश्र की बातचीत

जहां लफ्जों के मोती, एहसास की डोर में गुंथ जाते हैं तो शायरी का रूप धर लेते हैं और जब बोलों की शक्ल-सूरत अख्तियार करते हैं तो वो कहानी बन जाती है। शब्दों को किसी माला की मोतियों की मानिन्द सजाने-संवारने का हुनर सबके पास नहीं होता। डॉ. वजाहत हुसैन रिजवी के लिए नौकरी की मसरूफियत के बीच लिखने-पढ़ने क ...

हिंदी नयी चाल में ढले...
हिंदी नयी चाल में ढले...

इस बदलते विश्व में केवल अंग्रेजी को कोसने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अपनी
भाषाओं को पोसने से ही हम पूरे संसार के साथ कदम मिलाकर चल सकेंगे।
हिंदी के लिये हिंदी में रुदन करना बंद होना चाहिये। रोते वे हैं जिनके पास भाषा
नहीं होती, जैसे कि भाषा प्राप्त होने ...

प्रतीति की भाप
प्रतीति की भाप

भाषा एक सेतु की तरह लगती है जिसे मन और बुध्दि के बीच बाँधना पड़ता है। पीड़ाओं के खारेपन में हिलुरते भवसागर में अपनी नौका खेते कवि की आँखें बार-बार भर आती हैं और छलककर सागर में झर जाती हैं। कवि की आँखों का स्रोत उसके हृदय में ही तो है जिस पर प्रतीतियों की भाप छायी रहती है और जैसे ही काव्य-प्रकाश इस ...

रस प्रधान भारत और चीनी स्वाद
रस प्रधान भारत और चीनी स्वाद

पश्चिमी लोगों के ख्याल में स्वाद या रस का मतलब केवल शारीरिक जरूरत मिलने के लिए है, सौंदर्यबोध से संबंध नहीं रखा जाएगा। प्लेटो ने कहा था कि अगर हम कहते हैं कि स्वाद और सुगंध न केवल प्रसन्नता है बल्कि सुन्दर भी है, तो लोग हम पर हंसी उड़ाएंगे। इस बात से चीन और भारत एक साथ असहमत हैं, क्योंकि वे दोनों ...

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