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2016 Nov
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दूसरा पहलू
दूसरा पहलू सभ्यता का दूसरा पहलू विकास का वीभत्स चेहरा उघाड़ देती है आग जलकर-झुलसकर मरती जीव-जातियों की दर्दनाक चीखें और उससे भी भयानकखामोशियों के बीच बहरे बने हुए लोगों की शक्लें सबसे कुरुप नज़र आती हैं
रंग मंच
रंग मंच जरस बज रहा हैगुंबद ऊंचाई का प्रतीकआधार स्तम्भबाहुबलि भुजाएँकमल मकरंद से सुरभितमूर्तिमान देवतावैभव के रसिया पुजारीरूप के दीवाने पुरोहितहवाओं पे तैरती तहरीरजननी की अजमतआदरणीय ना
आज का शिवाला
आज का शिवाला पहले थी कतारें, पात्र हाथ में गोरस काव्याकुलता रहती, मन मेंकब दर्शन होगा अर्घा का।आज भी दिखती वही कतारेंहाथ में पैसा मेहनत कामन सबका व्याकुल उतना हीपर व्याकुलता है, मधुरस का।आज अर्घा सूखा
दरवाजे और खिड़कियाँ
दरवाजे और खिड़कियाँ दरवाज़े व्यवहारिक होते हैंऔर खिड़कियाँ भावुक।दरवाज़े सिर्फ समझते हैंसाँकल की बोलीकदमों की आहटें।खिड़कियाँ पहचानती हैंदबे पाँव पुरवाई काचुपके से अंदर आ जानासबेरे की किरणों काभीतर तक उतर
दूर-देशों के भारतवंंशी गिरमिटिया
दूर-देशों के भारतवंंशी गिरमिटिया यह मानव का नैसर्गिक स्वभाव है कि वह जोखिम भरे कामों को आगे बढ़कर उत्साहपूर्वक करता है। जब मानव को समुद्री मार्गों से यात्रा करना सुरक्षित लगने लगा, तब इंग्लैंड, पुर्तगाल, स्पेन और फ्रांस के विस्तारवादी तथा दु:साहसी लोग नये-नये भू-भागों की खोज में न
फ़ीजी के भारतवंशी
फ़ीजी के भारतवंशी प्रथम प्रवासी भारतीय श्रमिक के फीजी में अपना पग रखते ही हिंदी का प्रवेश यहाँ हो गया था। क्योंकि अधिकांश श्रमिक भारतवर्ष के हिंदी भाषी प्रदेशों से यहाँ आए थे अतः यहाँ उन्हीं की ही भाषा स्थापित हुई और इस तरह हिंदी भारतीयों की प्रमुख भाषा बनी। आज प्र
अस्मिता के संघर्षशील सिपाही
अस्मिता के संघर्षशील सिपाही सन् 1498 में 31 जुलाई की दोपहर समुद्र में अपनी यात्रा के दौरान किसी जमीन की तलाश में हताश कोलंबस को जब उसके एक नाविक ने जहाज की छत से देखकर बताया कि पश्चिम की ओर तीन पहाड़ियां दिखाई दे रही हैं तो कोलंबस को विश्वास हो गया कि सदा की तरह ईश्वर उसके सा
सूरीनाम की धरती पर धड़कता भारत
सूरीनाम की धरती पर धड़कता भारत खिचड़ी दाढ़ी, दो सितारा आँखों से फिसलती हुई दबी हँसी से सनी आवाज आई "मैं अंदर आ जाऊँ गुरु जी?" कहते हुए 20 साल का युवक दक्षिण अमेरिका के सूरीनाम देश के पारामारिबो शहर के भारतीय सांस्कृतिक केंद्र के हिंदी कक्ष के द्वार से प्रवेश कर रहा था, मेरा यहाँ
गावं हेईनार देस सूरीनाम
गावं हेईनार देस सूरीनाम हालांकि केएलएम का जंबो जब पारामारिबू पर उतर रहा था तो आसमान में घने बादल थे। फिर भी उनके बीच से नीचे का सघन वन दिख जाता था। वह यूरोप के नगरों के बाहर लगाए गए वन जैसा पंक्तिबद्ध नहीं था। पानी गिरते रहने और विनाश न किए जाने से जो वन अपने आप उगता, पल
उष्ण कटिबन्ध के प्रवासी
उष्ण कटिबन्ध के प्रवासी संयोगवश करीब तेरह बरस पहले मुझे मॉरीशस जाने का अवसर मिला। हिन्द महासागर में अपनी थोड़ी सी जगह में फैले इस व्दीप पर भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी फ्रांसीसियों और अफ्रीकियों के साथ रहती है। अंग्रेजी और फ्रेंच के साथ भोजपुरी, उर्दू, मराठी और दक्षिण
छिन्नमूल : भारतवंशी मन का द्वंद्व
छिन्नमूल : भारतवंशी मन का द्वंद्व औपनिवेशिक साम्राज्य की लालसा के चरम पर समूचे विश्व में कई भू-भाग पर साम्राज्यवादी सत्ता ने, समूहों में भारत के श्रमजीवियों को अपने निहित कारोबारी स्वार्थ की पूर्ति के लिये बसा दिया था। ये श्रमजीवी जो भारतवंशी कहलाये, ऐसे पौधों के मानिन्द थे जो अपन
रॉनी
रॉनी इधर कुछ दिनों से स्टाफ़-रूम में बैठकर चाय पीना मेरे लिए एक सज़ा से कम नहीं था। दूसरी टीचर्स की बातों में छिपा व्यंग्य और कटाक्ष मुझे अक्सर ही झेलना पड़ता था। रॉनी के बारे में मि. ह्यूबर्ट के किए गए कमेंट्स, "माई गॉड, यह लडक़ा! सज़ा का भी इस पर असर नहीं
चित्रकूट पर राम-भरत मिलन
चित्रकूट पर राम-भरत मिलन रामायण हमारे समाज की कहानी है। भाइयों की आपसी आदत, उनका बर्ताव और फिर उनमें स्नेह और सम्मान रामायण की कहानी है। बड़े भाई राम को अच्छा जाना जाता है, छोटे भाई उनको मानते हैं। आजकल के समाज का द्वेष, ईष्र्या और स्वार्थ चिन्ताएं वाल्मीकि की कहानी में प्
त्रिशंकु
त्रिशंकु विदेश में बसे भारतवंशियों के लिए रह रहकर एक ही शब्द ज़हन में आकर टकराता है; और वह है - त्रिशंकु। त्रिशंकु महाराज सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे। महान मुनि श्री विश्वामित्र  ने उन्हें पहुँचा भी दिया। (पता नहीं ये महान ऋषि-मुनि अपनी अथक प्रयत्नों से
ग़म तो है हासिले ज़िन्दगी दोस्तो
ग़म तो है हासिले ज़िन्दगी दोस्तो उर्दू के मशहूर शायर जनाब नक्श लायलपुरी की किताब "तेरी गली की तरफ" का एक पृष्ठ देवनागरी में और दूसरा उर्दू लिपि में छपा है, जो इसे नायाब बनाता है। लोग फूलों की तरह आयें के पत्थर की तरहदर खुला है मेरा आगोशे-पयम्बर की तरह
प्रवास के मंतव्य और मानसिकता
प्रवास के मंतव्य और मानसिकता आदिमकाल में मनुष्य का कोई निश्चित स्थान नहीं था और राष्ट्र जैसी अवधारणा तो कतई नहीं थी। भोजन के लिए पशुओं का पीछा करता या पशुपालन युग में अपने पशुओं के लिए चरागाहों और पानी की तलाश में मनुष्य जाने किन-किन जाने-अनजाने स्थानों में भटकता रहा। पशुपालन
अफ्रीका घूमने का रोमांच
अफ्रीका घूमने का रोमांच अफ्रीका का नाम सुनते ही अभी भी बहुतों के मन में जंगली जीवन का दृश्य घूमने लगता है। कई सालों पहले काम के सिलसिले में कुछ समय के लिये जोहांसबर्ग शहर देखने का मौका मिला। पहले सोचा, वहाँ की जीवन शैली बहुत अलग हो शायद, फिर भी कुछ लोगों से बातचीत करने क
साहित्य पढ़ने की उम्र
साहित्य पढ़ने की उम्र यह विचार कई दिनों से मेरे मन में आ रहा था कि साहित्य पढ़ने की क्या उम्र होनी चाहिए एवं किस उम्र में किस तरह का साहित्य आप पढ़ सकते हैं। मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आती है जब मैं 11वीं की गर्मियों की छुट्टियों में एक उपन्यास पढ़ रहा था। तभी मेरी बड़ी
सिंगापुर के भारतवंशी
सिंगापुर के भारतवंशी वाणिज्यिक मार्ग के संगम पर बसा सिंगापुर मलाया द्वीप समूह को नापता हुआ भिन्न मूल के लोगों के प्रवाह का गवाह रहा है। सिंगापुर में भारतीय समुदाय की गितनी तो उँगलियों पर ही है पर देश के विकास में छाप उल्लेखनीय रही है। समय के साथ भारतीयों ने इस द्वीप क
भारतवंशियों के दंश और पीड़ा को समझना होगा
भारतवंशियों के दंश और पीड़ा को समझना होगा भारतवंशी संस्कृति की अध्येता साहित्यकार प्रो. डॉ. पुष्पिता अवस्थी से आत्माराम शर्मा की बातचीतहिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन, नीदरलैंड की अध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार प्रो. डॉ. पुष्पिता अवस्थी का जन्म कानपुर में हुआ। राजघाट, वाराणसी के प्रत
छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ पेटवा के खातिर
छोड़ अइली हिंदुस्तनवा बबुआ  पेटवा के खातिर भारत की हुनरमंद जातियां अपनी कारीगरी और कला कौशल के लिये पूरे संसार में पहचानी गयी हैं। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के आने तक यही जातियां भारत को समृद्ध बनाने में सदियों से अपना योगदान दे रही थीं। वे लोहा गला सकती थीं, संसार का सबसे बारीक कपड़ा बुन
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