ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हम अभी भी नहीं सुधर रहे हैं
हम अभी भी नहीं सुधर रहे हैं आजादी के बाद के विकसित भारत के सबसे गंभीर सूखे से जूझ रहे दे¶ा में योजना व घोषणा के नाम पर भले ही खूब कागजी घोड़े दौड़ रहे हों, लेकिन हकीकत के धरातल पर ना तो समाज और ना ही सरकार के नजरिये में कुछ बदलाव आया है। जहां पानी है, वहां उसे बेहिसाब उड़ाने की प्रवृति यथावत है तो जल संरक्षण के पारंपरिक संसा
लातूर का सूखा और "रैंगो' का कछुआ
लातूर का सूखा और बालीवुड की एनिमे¶ान फिल्म "रैंगों' का एक सीन है जिसमें मेयर (कछुआ) के दफ्तर में जब रैंगो (गिरगिट) मिलने जाता है तो मेयर उसे एक बोतल से पानी निकाल कर देता है। सीन में पानी को पे¶ा करने का तरीका बिल्कुल ऐसा है जैसे कोई महँगा पेय गरीब आदमी के सामने प्रस्तुत किया गया हो। आगे बढ़ने से पहले बता द
पानी बिच मीन पियासी
पानी बिच मीन पियासी प्रकृति में हर तरह का स्वतः प्रबंधन है- जल, मल, जनसंख्या, विभिन्न जीवों का संतुलन आदि। लेकिन मनुष्य की विकास की नई अवधारणा के कारण प्रकृति की इस व्यवस्था को कई तरह से प्रभावित किया है- सकारात्मक कम और नकारात्मक अधिक। जब प्रकृति की व्यवस्था में मनुष्य व्यवधान पैदा करता है तो उसे प्रकृति और वस्तुतः अप
अब ज़रूरत है जल सत्याग्रह की
अब ज़रूरत है जल सत्याग्रह की सबकी जरूरत की चीज़ नमक पर जब फिरंगियों ने कर लगाया तो महात्मा गांधी नमक कानून तोड़ने दाण्डी कूच पर निकल पड़े थे। पूरी दुनिया में इस अनूठे सविनय अवज्ञा आन्दोलन की मिसाल ढँूढे नहीं मिलती। वे गुलामी के दिन थे जब बापू के नेतृत्व में हमारे पूर्वज सेनानियों को सागर किनारे तक जाने के लिए लम्बी यात्रा करना पड़ी
जीवन-रक्षा के लिये पानी की खेती करें
जीवन-रक्षा के लिये पानी की खेती करें अगला वि·ा युद्ध पानी के लिए होगा। इस वाक्य को हमारे आसपास रहने वाले लोग बड़ी आसानी से चर्चा में ¶ाुमार करते हैं और यह भी जानते व पढ़ते रहते हैं कि पानी की उपलब्धता दिन दुनी रात चौगनी गति से कम हो रही है, परन्तु यह जानते हुए भी कि पानी का कोई विकल्प नहीं है हम इसको बचाने के प्रति गंभीर नहीं
जल-संकट से मुक्ति की ओर चीन
जल-संकट से मुक्ति की ओर चीन हवा के बाद जीवन में अगर सबसे अधिक महत्त्व किसी का है तो वह पानी का ही है। ¶ारीर के पांच तत्त्वों में से पृथ्वी के प¶चात् यही तत्त्व है, जिसे आसानी से देखा-जाना और समझा जा सकता है। जीवन को सुरक्षित रखने के लिए इसको ग्रहण करना ही ज़रूरी नहीं है बल्कि यह जानना भी ज़रूरी है कि यह जल कब पिया जाए
किंवदन्ती बन गई किताब
किंवदन्ती बन गई किताब कीसी भी हिंदी लेखक की पुस्तक के यदि तीन संस्करण यानि 1500 किताबें प्रका¶िात हो जाए तो उसका मन टेड़ा-टेड़ा चलने लगता है। कभी कोई हिन्दी लेखक कल्पना में भी सोच नही सकता कि उसकी पुस्तक की लाख प्रति भी बिक पायेगी। ऐसे में चमत्कार होता है अनुपम मिश्र की 1993 में प्रका¶िात पुस्तक "आज भी खरे हैं ता
परकटी चिड़िया एक और पड़ाव
परकटी चिड़िया एक और पड़ाव परकटी चिड़िया क्या बिगड़ गया जो पंख कट गया अब भी देखो घूमती हूँ मस्ती से!न हुआ आसमान ज़मीन ही सही परवाज़ के लिए आका¶ा ज़रूरी तो नहीं! तुम यूं ही उदास मत होना मेरे लिए उड़ने को मन का विस्तार कम तो नहीं!
  एक और पड़ाव इन रंग-बिरंगी चिड़ियों की भी क्या ज़ुबा
आधा हिस्सा
आधा हिस्सा  मैं उस टूटे रि¶ते का आधा हिस्साआधा भी रह न सकासमय की अभि¶ाप्त आँधी मेंउड़ते तिनके-सा टकराता रहा। वह दिन, जब हमारा रि¶ता टूटाउस दिन क्या-क्या न हुआ? नदी के नीले पानी की छाती परसहमा आका¶ा¶ारद का बादल काँपापीड़ा कहाँ से कहाँ तकलहरों पर तैरती चली आई। मीत चुप,
बहुत हुई
बहुत हुई अँधेरों की वो जद्दोजहद बहुत हुई अँधेरों की वो जद्दोजहद चलो आज सितारों की बात करते हैंचाँद के साथ उन सितारों की छाँव तलेचलो आज चाँदनी में नहा आते हैंलव्ज़ों की गुम¶ाुदी की और क्या बात करेंचलों वृन्दों के साथ आज चहचहाते हैंखुद ही की जो मुस्कान खो दी है मैंनेचलो आज किसी और को हँसना
जब कोलाहल नहीं होगा
जब कोलाहल नहीं होगा प्रातः का स्वर्णिम विहान होउड़ान भरते हों पाखीया सुरमई साँझ होविश्रांति हेतु स्वप्न-सा लिएनीड़ को लौटते हों पाखीकलरव तब ही सुन पाओगेजब कोलाहल नहीं होगा।कभी कोलाहल में भीएकल होता है मनतो कभीदो ¶ाब्द के ¶ाोर में हीबीत जाता है सकल जीवन।चहल पहल दुनिया हैनाद से अंतरनाद की यात्राआसान भी तो नहींकोल
माँ का घर
माँ का घर पत्ते और पंछी,दूर हो जाते हैं बड़े होकर,पत्ते, जो निकलते हैं कोंपलों से, हरियाते हैं,झूमते हुए बड़े होते हैं, लहलहाते हैं,और एक दिन टूट जाते हैं अपनी ¶ााख से, और पीछे छोड़ जाते हैं एक दाग,जो भर जाता है लम्हा-दर-लम्हा बीतते वक्त के साथ एक छोटा-सा घोंसला चिड़िया भी बनाती हैदेती है कुछ अंडे, उन्ह
शब्द
शब्द शब्द सरल होते हैंनि¶चल, निर्मलमन को सुकून दे जाते हैंशब्द कठोर होते हैंनिष्ठुर, जटिल¶ाूल की तरह चुभ जाते हैंशब्द चंचल होते हैं¶ाोख, नटखटमन में ऊर्जा भर जाते हैंशब्द पावन होते हैंपुनीत, मधुरमन को ¶ाांत कर जाते हैं¶ाब्दों की परिभाषा हमसे हैहम ¶ाब्दों से परिभाषित नहीं¶
पुण्य सलिला गंगा
पुण्य सलिला गंगा वाल्मीकि प्रकृति कवि हैं। उनके कवित्व से घटनाएँ स्वाभाविक हो जाती हैं। वह आका¶ा, तारों, पर्वतों, मेघों, वनों, वृक्षों, प¶ाुओं, सर्पों, पक्षियों, नदियों, मछलियों, नारियों और नरों के प्रेक्षक हैं। उनके निकले बाण विषैले सर्पों की तरह डँसते हैं, उनके विजयी नायक मदमस्त हाथियों की तरह चलते हैं,
कस्मै देवाय हविषा विधेम
कस्मै देवाय हविषा विधेम जब भारतीय वैज्ञानिक विरासत की बात होती है, तो मन में ध्वनित हो उठता है ऋग्वेद के नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त के इन पद्यनुवादों का। ये पद्यानुवाद पं. जवाहरलाल नेहरू रचित पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' पर आधारित और ¶याम बेनेगल कृत दूरदर्¶ान धारावाहिक "भारत एक खोज' के ¶ाीर्षक गीत हुआ क
हिंदी के सूत्र और संदर्भ
हिंदी के सूत्र और संदर्भ हिंदी के संदर्भ में गाँधी जी ने 1918 में इंदौर में हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन के दौरान कहा था कि हिंदी वह भाषा है, जिसको हिंदू व मुसलमान बोलते हैं और जो नागरी अथवा फारसी लिपि में लिखी जाती है। सच है कि वही भाषा श्रेष्ठ है, जिसको जनसमूह सहज में समझ ले। और इस बात को भारतीय संदर्भों में हिंदी ने पिछली स
भारतीय लोक कलाएँ रुचिकर हैं
भारतीय लोक कलाएँ रुचिकर हैं आप सभी हिंदी प्रेमियों से अपने मन की बात करूं इससे पहले अपना परिचय देना चाहती हूँ। हालांकि नहीं जानती कि खुद अपने बारे में बात करना अच्छी माना जाता है या नहीं। मेरा नाम मिलेना वेस्लोव्सकाया है। मैं पूर्वी विभाग के दर्¶ान¶ाास्त्र वि·ाविद्यालय की छात्रा हूँ। मेरी रुचि हिंदी, संस्कृत,
अच्छा करने की धुन
अच्छा करने की धुन शिकागो में अप्रवासी भारतीयों की संख्या बहुत है पर उसमें से कुछेक लोग ही हैं जो अपनी कम्युनिटी के लिए कुछ नया करने की इच्छा रखते हैं। ऐसे ही लोगों में एक नाम है प्रोमिला कुमार जी का। हाल ही में उनसे बात करने का मौका मिला। पता लगा कि प्रोमिला जी न सिर्फ अपनी कम्युनिटी के लिए कुछ नया करने का सोचती हैं,
मज़दूर दिवस बनाम प्रवासी मज़दूर
मज़दूर दिवस बनाम प्रवासी मज़दूर प्रवासी ¶ाब्द बड़ा मनमोहक है। सुनकर लगता है जैसे एक बड़ा तगमा जुड़ गया हो। सिंगापुर में भी प्रवासियों की कमी नहीं। हर दे¶ा की तरह यहाँ भी कुछ प्रवासी सुनहरे सपने पूरे कर रहे हैं तो कुछ सुनहरे सपनों की पीली रेखा को पकड़ने की को¶िा¶ा में हैं। हमारी एक आदत रही है कि हम ज़्यादातर प्रवासी
मानस प्रबंधन
मानस प्रबंधन इस दुनियाँ में सभी मनुष्य एक समान नहीं हैं। हर कोई दूसरे से व्यवहार, स्वभाव, पसंद, महत्वाकांक्षा इत्यादि में भिन्न है। यह सब वैयक्तिक अंतर कहलाता है। लेकिन हमें विभिन्न मानसिकता वाले  लोगों के बीच आराम से रहना होता है। यही इस जीवन की सुंदरता है। अभी आप किसी सह्मदय व्यक्ति से बात कर रहे हैं और अ
जल-जागृति
जल-जागृति जल ही जीवन है। इस ¶ाा·ात सत्य से कौन इनकार करेगा? लेकिन इस सत्य के पक्ष में बोलना एक बात है और रोजमर्रा के आचरण में उतारना बिलकुल दूसरी बात। जल की महिमा सनातनकाल गायी जाती रही है। रहिमन पानी रखिए..., पानी बिच मीन पियासी..., पानी रे पानी तेरा रंग कैसा... आदि-आदि।हमारे समाज में जलसंकट चारो
चीनी युवाओं में भारत का आकर्षण
चीनी युवाओं में भारत का आकर्षण सदियों से चीनी जनमानस के मनोमस्तिष्क में भारत वास करता आया है। भारत और चीन पिछले दो हजार से भी ज्यादा वर्षों से एक-दूसरे की सभ्यता-संस्कृति को प्रभावित करते हुए सम्पूर्ण मानव समाज के उत्थान में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते आ रहे हैं। पूर्व में असंख्य भारतीय विद्वानों ने चीन की सफल यात्राएँ की हैं। बह
झूठ का समाजशास्त्र
झूठ का समाजशास्त्र कवि ¶ाुंतारी तानी कावा ने अपनी एक कविता में लिखा है : "कुछ बातें हम झूठ बोलकर ही कह सकते हैं।' बात सही है सचमुच कुछ ऐसी बातें होती हैं, जो बोली ही नहीं जा सकतीं। उन्हें प्रकट करने के लिए झूठ का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए अगर आप किसी ऐसे घर में गए हुए हैं जिसकी आर्थिक स्थिति, आपकी नजर में
पांचों नौबत बाजती
पांचों नौबत बाजती कल्पना कीजिये, कल्पना क्यों - ये दो वास्तविक प्रकरण हैं। मंच पर कुमार गन्धर्व का गायन चल रहा है - उड़ जायेगा... हंस अकेला... भक्ति की रस धार बह रही है, गायक के स्वर सीधे ब्राहृ से जुड़े हैं श्रोता वर्ग मंत्र मुग्ध है, आँखें बंद हैं, कुछ मुंडियां हिल रही हैं, कुछ की अश्रुधार बह रही है, हर कोई रस विभोर
एक सोच को बदलने की जरूरत
एक सोच को बदलने की जरूरत क्या जरूरत है तुम्हें शादी करने की? यों ही जिंदगी की गुजर-बसर हो ही जायेगी और यदि कर ही ली है तो ये विचार कैसे पनपा आपके ह्मदय स्थल पर कि छोड़कर एक-दूसरे को जीवन अच्छा चलेगा। कभी सोचा है कि आपकी जरा-सी नादानी आपके नादान बच्चों को कहां ले जायेगी? आजकल तो आलम यह है कि जरा-सी चिंगारी चाहिये एक दावानल के
मुग़ालतों का दौर
मुग़ालतों का दौर जैसे उम्मीद पर दुनिया क़ायम है उसी तरह गलत-फहमियों में क़ायनात टिकी है। आख़िर ¶ाराफ़त भी कोई चीज़ है। अक्सर महफ़िलों में बेसुरे-बेताले मुतरिब (गायक) के लिए भी "बहुत अच्छा', "बहुत बढ़िया' कहना पड़ता है। मु¶ाायरों, कवि-सम्मेलनों में ऐसे-ऐसे ¶ोरों और कविताओं पर दाद देनी पड़ती है जिन्हें सुन कर ख़ु
करि जतन भट कोटिन्ह,बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु, खर अज खल निसाचर भच्छही। एहि लागि तुलसीदास, इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि, त्यागि गति पैहहिं सही।
करि जतन भट कोटिन्ह,बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु, खर अज खल निसाचर भच्छही। एहि लागि तुलसीदास, इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि, त्यागि गति पैहहिं सही। यह एक रक्ष-संस्कृति है। एक दो हजार लोग नहीं, करोड़ों लोग रक्षा के व्यवसाय में लगे हुये हैं। इसका विस्तार भी बहुत रहा होगा। भाषा भूगोल को भी बताती है। मलय भाषा में उन्हें राक्सासा और जापानी में रासेटसुट कहा जाता है। अकेले एक लंका द्वीप में करोड़ों राक्षस रक्षा-कर्म में नियत हैं। "वयं रक्षाम:' के मूल मं
किंवदन्ती बन गई किताब
किंवदन्ती बन गई किताब कीसी भी हिंदी लेखक की पुस्तक के यदि तीन संस्करण यानि 1500 किताबें प्रका¶िात हो जाए तो उसका मन टेड़ा-टेड़ा चलने लगता है। कभी कोई हिन्दी लेखक कल्पना में भी सोच नही सकता कि उसकी पुस्तक की लाख प्रति भी बिक पायेगी। ऐसे में चमत्कार होता है अनुपम मिश्र की 1993 में प्रका¶िात पुस्तक "आज भी खरे हैं ता
ख़ुश्बू की तरह से मैं फिजा में बिखर गया
ख़ुश्बू की तरह से मैं फिजा में बिखर गया रोज़ बढ़ती जा रही इन खाइयों का क्या करेंभीड़ में उगती हुई तन्हाइयों का क्या करेंहुक्मरानी हर तरफ बौनों की, उनका ही हजूमहम ये अपने कद की इन ऊचाइयों का क्या करेंबौनों के हुजूम में ऊंचा कद रहने वाले युवा ¶ाायर अखिले¶ा तिवारी की किताब "आसमां होने को था' अनेक अर्थों में उल्लेखनीय संग्रह है। इंसान
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