ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2016 Jun
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कबीर की उलटबांसी
कबीर की उलटबांसी मसि कागज छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ, के बावजूद कबीरदास का नाम हिंदी भक्त कवियों में बहुत ऊँचा है। वे सच्चे अर्थों में समाज-सुधारक तथा युग पुरुष थे। कबीर निर्गुण भक्ति धारा की ज्ञानमार्गी ¶ााखा में सर्वोपरि माने जाते हैं। उनके जन्म के सम्बन्ध
सुनो भई साधो
सुनो भई साधो हिंदी के संत साहित्य में कबीर का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। चार प्रमुख भक्त कवियों में कबीर सबसे पहले आते हैं। भक्तिकाल का समय मुहम्मद बिन तुगलक से ¶ाुरू होकर मुगलों के ¶ाासनकाल तक माना जाता है जिसमें लगभग एक जैसी राजनैतिक उथल-पुथल, स
सुरत निरत के भेद
सुरत निरत के भेद कभी-कभी लगता है कि इतिहास तो अपनी गति से आगे बढ़ता चला गया है, लेकिन हम वहीं के वहीं खड़े रह गए हैं, जहां थे। है तो यह विडम्बना ही। इक्कीसवीं सदी की पन्द्रहवीं ¶ाताब्दी के युग से तुलना। लेकिन लगता है, कुछ-कुछ ऐसे ही दिन रहे होंगे, जब एक जुलाहे
अविस्मरणीय कबीर
अविस्मरणीय कबीर कबीर किसी धर्म के प्रवर्तक नहीं मात्र मानवता और सत्य के पुजारी हैं। वे संसार में रहते हुए सांसारिक मोह से परे, सत्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। फक्कड़ कबीर ने समाज की प्रचलित कुप्रथाओं की खुलकर निंदा की। फलस्वरूप जीवन में बहुत सारी कठिनाइयाँ झे
कबीर के मायने
कबीर के मायने जिन शब्दों के पीछे शा·ात सत्य हैं शक्ति और प्रभाव उन्हीं में होता है। वे ही शा·ाती पाकर त्रिकालजयी होते हैं और समय का वह काल खण्ड स्वयं इनके ही नाम हो जाता है।तैसे ध्यान धरहु जिन, बहुरि न धरना। ऐसेहि मरहु कि बहुरि न मरना।
कबीर का समाज
कबीर का समाज अल्बर्ट आइंस्टीन से क्षमा-याचना सहित उनके ¶ाब्दों को बदलकर मैं कहना चाहूँगा कि आने वाली पीढ़ियां कैसे वि·ाास करेंगी कि पंद्रहवीं ¶ाताब्दी में एक ऐसा इंसान हाड़-मांस युक्त जन्मा था जिसने "मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ' जैसा अन
साधो, सहज समाधि भली
साधो, सहज समाधि भली प्रायः महापुरुषों के अनेक रूप होते हैं। कबीर के भी अनेक रूप हैं। किसी के लिए वे दैनिक जीवन के लिए उपयोगी सूत्र देने वाले कवि हैं, तो किसी के लिए एक वि¶ोष पंथ के प्रवर्तक। किसी के लिए वे वर्तमान हिंदू धर्म की मान्यताओं (मूर्तिपूजा, जप, माला, त
दास कबीर जतन ते ओढ़ी
दास कबीर जतन ते ओढ़ी कबीर ने मानव देह का झीनी चादर का प्रतीक लेकर एक अति स¶ाक्त साँग-रूपक रचा है जिसके अंत में वे अन्यों और स्वयं के बारे में जो धाकड़ घोषणा करते हैं वह गर्वोक्ति नहीं, एक सिर चढ़कर बोलने वाला सच है। वे कहते हैं- सो चादर सुर-नर-मुनि ओढ़ी, ओढ़के मैली क
हमन है इश्क मस्ताना
हमन है इश्क मस्ताना भारत की सभ्यता में कबीर का योग अनूठा है। उनके युग में न तो उग्रवाद था और न आज जैसा भ्रष्टाचार। मुस्लिम ¶ाासन होने के कारण धर्म-परिवर्तन के लिये जोर-जबरदस्ती जरूर की जाती थी। कबीर के समकालीन नानक थे, जो 29 वर्ष की आयु में संत कबीर से मिले थे।
माया महा ठगनी
माया महा ठगनी     बीर सन्त भक्त कवि हैं। उनकी दृष्टि से समाज की    कौन-सी ऐसी समस्या थी जो अछूती रह गई हो।    उनकी रचनाएँ अब भी राह दिखाती हैं। प्र¶न है कि क्या आज के भौतिकवादी जीवन में जहाँ वस्तुवाद
कबिरा खड़ा बाज़ार में
कबिरा खड़ा बाज़ार में मानस में एक चित्र उभरता है, राग-द्वेष से परे, कौन है यह संत जो सबकी खैर की कामना करता है? यह संत और कोई नहीं, मध्यकालीन भारत में व्याप्त अन्धकार को अपने ज्ञान की ज्योति से ज्योतिर्मय करने वाले अग्रदूत, महान भक्त कवि और संत कबीर दास हैं। उनका पूरा
कबीर गरब न कीजिये
कबीर गरब न कीजिये कबीर ऊपरी दिखावे की बहुत आलोचना करते हैं। कुछ लोग माला तो फेरते है लेकिन उनका ध्यान कहीं और होता है। जाति-प्रथा पर चोट करते हुए वे कहते हैं कि केवल ऊँचे कुल में जन्म लेने से कुछ नहीं होता है जब तक काम भी ऊँचे न हों -ऊँचे कुल में जामिया, करनी
मन रे जागत रहिये भाई
मन रे जागत रहिये भाई मै कबीर को पढ़ता नहीं सुनता हूँ। मैंने कबीर को पढ़ कर नहीं जाना, सुन कर जाना है : कुमार गन्धर्व से सुना है, पद्मश्री भारती बन्धु से सुना है, प्रह्लाद सिंह टिपाणिया से सुना है, मधुप मुद्गल से सुना है, आबिदा परवीन से सुना है, ¶ाबनम विरमानी से सुन
भया कबीर उदास
भया कबीर उदास कबीर भारत की वो आत्मा है जिसने रूढ़ियों और कर्मकाडों से मुक्ति की कल्पना की। कबीर वो पहचान है जिन्होंने जाति-वर्ग की दीवार गिराने का जोखिम उठाया। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदे¶ाों में भी उनका समादर हो रहा है।आ
धर्म कर्म कछु नहीं उहंवां
धर्म कर्म कछु नहीं उहंवां रामानन्द के ¶िाष्य, संवादी कबीर ने स्वयं को न कभी धर्मगुरु कहा, न अवतार। वे स्वयं को न पैगंबर के रूप में देखते हैं, न नये धर्म के संस्थापक के रूप में। उनके नाम से पंथ का प्रवर्तन किया धनी धर्मदास ने - कबीर के निधन के कम से कम सौ बरस बाद। आधुन
ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया
ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया 1बहुत बरस नहीं हुए जब कबीर-गायन सुनते हुये मेरी मुलाकात एक बूढ़े ग्रामीण से हुई। उन्होंने पहले काफी संकोच से मुझसे समय पूछा और फिर मुझे कबीर में भीगता देख हल्के से पूछा, ""क्या आप जानते हैं कि ये क्या गाया जा रहा है?'' तब स्टेज पर बैठी गायिका
लागा चुनरी में दाग़
लागा चुनरी में दाग़ पण्डित कुमार गंधर्व की आवाज़ आ रही है। वे कबीर के करघे की लय पर गा रहे हैं-दास कबीर जतन सों ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीन्हीं चदरिया।झीनी-झीनी बीनी चदरिया।अपने कर्म की लय पर रचा गया कबीर का यह गीत उनके पूरे जीवन पर छाया हुआ है। कबीर
द्विविधा भंजक कबीर
द्विविधा भंजक कबीर कर्मकाण्डी समाज को और कोई क्या झकझोरेगा? आज किसी को ये बातें कह दें, सामने वाला मटियामेट कर देगा। समाज तनावग्रस्त हो जाएगा। लेकिन, कबीर साहिब साधारण, तरीका साधारण, पर बात असाधारण।सुनो! सबसे पहले मेरा एक निरंजन है। मुस्लिम आदमी, निरंजन उसका?
एक कबीर नहीं बना सकते?
एक कबीर नहीं बना सकते? रह-रह कर पूछता हूँ तुमसेइतना बनाते रहते हो तुमइतना बनाते रहते हैं हमएक कबीर ही नहीं बना सकते?पूछता हूँ लोगों से मैंजो हैं महान वैज्ञानिकआविष्कारकनूतन तत्वों के निर्माता।पूछता हूँ मैं उनसे
लोक में कबीर
लोक में कबीर बुन्देलीनैहर खेल लेव चार दिन चारीपैले लुबउवा तीन जनें आये, नाई बामन बारी।बाँह पकर माता सें बोली, अबकी गवन देव टारी।।दुजे लुबउवा ससुर जू आये, कर घोड़ा असवारी।बाँह पकर बाबुल सें बोली, अबकी गवन देव टारी।।तीजे
अमरीका में हिंदी का दीपक
अमरीका में हिंदी का दीपक न्यूयॉर्क में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का तीन दिवसीय आयोजन 29 अप्रैल से 1 मई 2016 तक सम्पन्न हुआ। भारत के जनरल कांसुलेट के हॉल में सम्पन्न समारोह में ¶ाामिल होने दे¶ा-विदे¶ा से और भारत के विभिन्न प्रदे¶ाों से हिंदी के वि&p
एडीसन में हिंदी महोत्सव सम्पन्न
एडीसन में हिंदी महोत्सव सम्पन्न न्यूजर्सी के एडिसन ¶ाहर में 21 व 22 मई को "हिंदी यूएसए' ने अपने पन्द्रहवें हिंदी महोत्सव का आयोजन किया। दो दिनों तक चले इस आयोजन में पूरी तरह से हिंदी का आधिपत्य रहा। भिन्न-भिन्न उम्र वर्ग के प्रतियोगियों ने बड़ी संख्या में नाटक मंचन, कविता पा
गुम होती पहचान
गुम होती पहचान शिष्टाचार, आदर, संस्कार भारतीय संस्कृति की सुंदर वि¶ोषताएँ कही जाती हैैं, लेकिन आधुनिक समय में क्या यह कोरे ¶ाब्द भर नहीं रह गये हैं? और धीरे-धीर अपनी चमक खो रहे हैं। हर संस्कृति के अपने ही प्रोस और कंस होते है, उसी तरह प¶िचमी संस्क
मानस प्रबंधन अंग्रेजी से अनुवाद राजेश करमहे भाग : दो
मानस प्रबंधन अंग्रेजी से अनुवाद राजेश करमहे भाग : दो असली आधुनिकता क्या है?मात्र पाँच सौ वर्ष पहले कोलंबस के द्वारा अमेरिका की खोज की गई थी। ज़ल्दी ही यह समृद्ध समाज बन गया। कठिन और चुस्त-दुरुस्त कार्यों और दृष्टिकोण की वजह से इसका सर्वांगीण विकास हुआ। दूसरी ओर, कुछ लम्बे इतिहास वाले समाज अभी भ
चल हंसा वा देस
चल हंसा वा देस अपना देश, खासकर मध्यकालीन भारत फ़क़ीरों का देश रहा है। अरबी का एक मूल है -फ़-क़-र, जिसका अर्थ है - निर्धनता। इसी मूल से फ़क़ीर शब्द की निष्पत्ति हुई है। फ़क़ीर परंपरा को मध्यकाल में देश पर बाह्र आक्रमणों के कारण हुई सामाजिक और आर्थिक विषमता की उपज माना जा
कहत कबीर सुनो भई साधो
कहत कबीर सुनो भई साधो कबीरदास बड़े ही विलक्षण व्यक्ति थे। एकदम बिंदास, बिलकुल हमारी तरह। उन्हीं की तरह हमारी भी ना किसी से दोस्ती है (अरे, दोस्त तो बहुत हैं हमारे - मगर चमचागिरी वाला रि¶ता किसी से नहीं है।) और ना ही बेकार की दु¶मनी। यूँ भी हम दु¶मन बनाने
कस्मै देवाय हविषा विधेम?
कस्मै देवाय हविषा विधेम? गर्भनाल पत्रिका, मई 2016 अंक में प्राचीन भारत में ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करते हुए वैदिक युग की वैज्ञानिक जिज्ञासाओं और संभावनाओं को रेखांकित किया गया था। इस चर्चा की शुरुआत राइबोसोम पर अपने अनुसंधान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ वर्ष 2009 का न
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