ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
2016 Dec
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प्रकृति अनंत
प्रकृति अनंत प्रकृति एक आम, मामूली-सी पहाड़ी-सी लड़कीसीढ़ीनुमा खेतों में  बेफ़िक्र घूमती-सी लड़कीदेखकर जल जाए कोई ख़ुशगवार-सी लड़की,पर कुछ ख़ास नहीं, क्यों? आकर्षक-सी लड़की। हिमालय की वादियाँ ही जिसकी दुन
युद्ध की कालिख
युद्ध की कालिख भूरी धरती के स्याह माथे परतुमने देखी है युद्ध की कालिख?खून, बारूद में सने बच्चे!अपने हाथों में माँ का हाथ लिएएक आवाक बेजुबां बच्ची!तुमने देखा है अपने लालच कोबम धमाकों में यूँ बदलते हुए?ये जो चुप्पियाँ तुम्
बंधन में स्पंदन
बंधन में स्पंदन तुझे क्या हुआ?तू तो ठीक है, मस्त हैपका पेड़ है, फिर भी स्वस्थ हैमेरा क्या? माँ मेरा क्या....कर्तव्यों की सूली पर चढ़ा हूँअधिकारों की बाढ़ में फंसा हूँ जरूरतें द्रौपदी का चीर हैंमन में पीर ही पीर ह
माँ का सिंगार
माँ का सिंगार निज भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए हर प्रयास तुम करो हाँ ये आस तुम करोविकास तुम करो। माँ भारती की गोद में लेखनी स्वतंत्र है है बोलने का हक़ भी विचार भी स्वतंत्र है तो सोचते हो क्या मूक मूढ़ से खड़े-खड़े
इबारत देवदास
इबारत देवदास इबारतज़िन्दगी से शिकायत अक्सर तो कभी बाद मुद्दत करते हैं,उस मुलाकात के बाद अब हम  रंगों से मुहब्बत करते हैंहम चंद हर्फ़ लिखते हैं जज़्बात से  हमे शायर न समझोवो करते हैं सजदा अक्सर और हम  ऐसे इबादत करते हैं
गीत लिखूं मैं ऐसा मेघा ऐसे बरसो तुम
गीत लिखूं मैं ऐसा मेघा ऐसे बरसो तुम इक गीत लिखूँ मैं ऐसा कल-कल झरने जैसा।दिल में सोयी आग जला देपरिवर्तन का बिगुल बजा देनिज हाथों किस्मत लिखने कामन में दृढ़ संकल्प जगा देपावन गीता के जैसा, मीरा भक्ति के जैसाइक गीत लिखूँ मैं ऐसा।पत्थर दिल को मो
बदली दिया याद घुटन
बदली दिया याद घुटन बदली आज बदली हैमेरी यादों से बचना काई हैउन राहों की फिसलन से बचना पगडण्डी सूखेगी तभीजब लम्बी धूप होगीइन्तज़ार करना।अहसासन छूनान पास आना न देखना मुझे उन आँखों सेबस यूँ ह
कहाँ है चाँद की वह चाँदनी?
कहाँ है चाँद की वह चाँदनी? कहाँ है चाँद की वह चाँदनी शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा की रजतमय वह रोशनी? प्रश्नकर्ता मैं नहीं वह है पक्षियों की मंडलीभूख प्यास को त्यागकर भ्रमण करते दूर तक आँखें उनकी थक गयी पर मिल न पायी रोशनी। कौन
एक दो
एक दो एककई साल पहले किसी ने उसके हाथ में कुछ कागज़ पकड़ाए थे जो आज पीले से बीमार पड़े हैं उसकी ज़ेब में एक पीला बीमार-सा वातावरण घेरे है ग्यारह मंज़िल की इस इमारत को मंत्रमुग्ध-साजिस पर से वो कूद गय
हिंदी रंगमंच
हिंदी रंगमंच पहली बार सुनने पर यूँ तो हिन्दी रंगमंच, यह प्रयोग ही ठीक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि भाषा का सम्बन्ध नाटक के साथ हो सकता है, रंगमंच के साथ नहीं। परन्तु नाटक जनजीवन की सांस्कृतिक मान्यताओं के अतिरिक्त एक भाषा की साहित्यिक उपलब्धियों का भी प्रतिनिधित्
हिंदी रंगमंच परिवर्तन और प्रयोगधर्मिता
हिंदी रंगमंच परिवर्तन और प्रयोगधर्मिता हिन्दी रंगमंच-नाटक का जो रूप स्वरूप, विधान आज हमारे सामने है, वह समय-समय पर हुये परिवर्तन और प्रयोगधर्मिता का ही परिणाम है। रंगमंच के नाटक ने नये आयाम स्थापित कर नये धरातलों को छुआ है, इसमें दो राय नहीं है। किन्तु साथ ही साथ आधुनिक रंगमंच ने कई प्
हिंदी नाटक कहाँ गया
हिंदी नाटक कहाँ गया अक्सर इस बात का रोना रोया जाता है कि हिंदी में अच्छे नाटक नहीं हैं। लेकिन इस बात पर कभी विचार नहीं किया जाता कि हिंदी में अच्छे नाटक क्यों नहीं हैं? क्या हिंदी के लेखक प्रतिभाशून्य हैं? क्या वे आधुनिक रंगमंच की प्रविधियों से अनभिज्ञ हैं? क्या वे र
सूत्रधार की रंगछवियाँ
सूत्रधार की रंगछवियाँ हमारी रंगपरंपरा में सूत्रधार को अपने नाम के अनुरूप महत्व प्राप्त है। भारतीय समाज में संसार को रंगमंच, जीवन को नाट्य, मनुष्य या जीव को अभिनेता और ईश्वर को सूत्रधार कहा जाता है। यह माना जाता है कि ईश्वर ही वह सूत्रधार है, जिसके हाथ में सारे सूत्र हो
अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल सम्पन्न
अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल सम्पन्न विगत 12-13 नवम्बर को अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल का आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। उद्घाटन कार्यक्रम में सुविख्यात गुजराती साहित्यकार रघुवीर चौधरी, संगीत नाट्य अकादमी के चेयरमेन योगेश गढ़वी, बॉलीवुड से फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर, ब्रिटिश
आधुनिक विमर्श के बहुआयामी सन्दर्भ
आधुनिक विमर्श के बहुआयामी सन्दर्भ लखनऊ एक्सप्रेशन द्वारा 18, 19 तथा 20 नवम्बर को लखनऊ शहर में आयोजित लिटरेचर फैस्टिवल साहित्यिक संपदाओं, विभूतियों के समागम का मेला था। इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हिन्दी-उर्दू, अंग्रेजी जुबां के साहित्य से जुड़े साहित्यकारों, कलाकारों, नाट्यकर्मी, ल
शिन नियेन (नव वर्ष)
शिन नियेन (नव वर्ष) पिंग पिंग जैसे ही अपने घर में घुसी अचानक ही दरवाज़े पर ही ठिठक गयी। यह क्या ऐसा सूना-सूना घर काटने को आ रहा था। जिस तीन बेडरूम वाले घर में सात लड़कियां रहती हैं, हर समय हो हल्ला छाया रहता है, आज उसी घर में चुप्पी विराजमान थी। पिंग पिंग को लगा
प्रेम होता है तो हो, ध्रुव उसे क्यों करते हो...
प्रेम होता है तो हो, ध्रुव उसे क्यों करते हो... किसी-किसी के लिए वह सिर्फ एक अहसास भर है और किसी के लिए आहट-सा सुनायी पड़ता है। किसी के लिए वह ऐसी खुशबू है जो पलकों में इशारों की तरह बस गयी है। किसी के लिए वह एक ख्वाब-सा है और किसी के लिए हाथों में आ गयी पूरी दुनिया-सा। किसी-किसी को उसमें उमर भर
राजनीतिक रंगमंच
राजनीतिक रंगमंच शेक्सपियर ने कहा था कि सारी दुनिया एक रंगमंच है और सभी लोग सिर्फ किरदार हैं। खैर, शेक्सपियर के अनुसार तो हम सब पैदाइशी अभिनेता हैं जिनका सूत्रधार भगवान है। जाने दीजिये। हम उन लोगों की बात कर रहे हैं जो पैदाइशी नहीं बल्कि मुखौटा पहन कर अभिनय करते ह
इस चमन के फूल को पत्थर न होने दीजिये
इस चमन के फूल को पत्थर न होने दीजिये ग़ज़ल को नए ढंग से परिभाषित करने वाले शायरों में जनाब प्रेमकिरण साहब को बिलाशक शामिल किया जा सकता है। यूं नए शायरों को पढ़ना, नए अनुभव और अपरिचित क्षेत्र की यात्रा करने जैसा होता है। जहां पता नहीं होता रास्ते में कैसे मंज़रों से मुलाकात होगी। पू
अतियों के बीच झूलता अमरीकी समाज
अतियों के बीच झूलता अमरीकी समाज मूल रूप से अमरीकी समाज सनक की सीमा तक पहुंचा हुआ समाज है जिसकी अपनी कुंठाओं से मुक्ति नहीं हुई है। वैसे तो हर समाज की अपनी कुंठाएँ होती हैं और उसे उनसे मुक्त होते हुए अपने अस्त्तित्व पर खतरा लगता है। भले ही भारतीय दर्शन वैदिक काल में बहुत मुक्त और
शिकागो में रंगमंच की दुनिया
शिकागो में रंगमंच की दुनिया रंगमंच हमें सब कुछ बता सकता है। कैसे देवताओं का स्वर्ग में वास है और कैसे कैदियों की भूल भूमिगत गुफाओं में दुर्बल है। कैसे जुनून हमें तरक्की तक लेकर जाता है और कैसे प्यार को बर्बाद कर सकता है। कैसे कोई भी इस दुनिया में एक अच्छे आदमी के तौर पर अपनी
भाषा की कशमकश
भाषा की कशमकश न्यूयॉर्क में प्रवासी भारतीयों द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। इसके लिये अलग-अलग नामों के तमाम संगठन काम कर रहे हैं, लेकिन इनके नामों की विविधता को छोड़ दिया जाये तो उनके उद्देश्य कमोबेश लगभग एक जैसे होते हैं।विगत दि
तुम निरखो, हम नाट्य करें...
तुम निरखो, हम नाट्य करें... भारत की नाट्य परम्परा पूरे संसार में अपने विशिष्ट रंग प्रयोजनों के लिये विख्यात है। भारत के रंगमंच की जड़ें आदिम और पौराणिक समय से ही बहुत गहरी होती आयी हैं। पिछले दो ढाई हजार सालों में इनमें अनेक परिवर्तन भी हुए हैं। वाल्मीकि रामायण से लेकर महाभार
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