ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
स्वाधीनता
स्वाधीनता

जिस प्रकार भी हो, हमें संघ को दृढ़प्रतिष्ठ और उन्नत बनाना होगा और इसमें हमें सफलता मिलेगी- अवशय मिलेगी। "नहीं' कहने से नहीं बनेगा! और किसी बात की आवशयकता नहीं- आवशयकता है केवल प्रेम, अकपटता और धैर्य की। जीवन का अर्थ है वृद्धि, अर्थात् विस्तार, और विस्तार ही प्रेम है। इसलिए प्रेम ही जीवन है- वही जी ...

स्वराज्य
स्वराज्य

मेरे... हमारे... सपनों के स्वराज्य में जाति (रेस) या धर्म के भेदों का
कोई स्थान नहीं हो सकता। उस पर शिक्षितों या धनवानों का एकाधिपत्य
नहीं होगा। वह स्वराज्य सबके लिए-सबके कल्याण के लिए होगा।

स्वराज्य एक पवित्र शब्द है; वह एक वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्मा-शासन और आत्म-संयम है ...

नियति से वादा
नियति से वादा

कई सालों पहले, हमने नियति के साथ एक वादा (Tryst with Destiny) किया था, और अब समय आ गया है कि हम अपना वादा निभायें, पूरी तरह न सही पर बहुत हद तक तो निभायें। आधी रात के घंटे के समय, जब दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जाग जाएगा। ऐसा क्षण इतिहास में विरले ही आता है, जब हम पुराने से ...

असमान बनने की स्वतंत्रता
असमान बनने की स्वतंत्रता

मैं समाजवाद का समर्थक नहीं हूं क्योंकि स्वतंत्रता ही मेरे लिए परम मूल्य है। उससे ऊपर कुछ नहीं। और समाजवाद बुनियादी तौर पर स्वतंत्रता के खिलाफ है। उसे होना भी चाहिए, यह अपरिहार्य है क्योंकि समाजवाद की कोशिश किसी अप्राकृतिक चीज को अस्तित्व में लाने की है।
मनुष्य समान नहीं है। वे विशिष्ट हैं। व ...

स्वतंत्रता की जय
स्वतंत्रता की जय

इस शीर्षक के फूहड़पन से और उसकी नारेबाजी से मैं परिचित हूं। शायद यह पेकिंग की दीवाली पर लगे पर्चों की तरह थोथा और चीखता हुआ है। मेरी पीढ़ी के किसी आदमी के दिल में इतना उल्लास नहीं है कि वह आसमान गुंजाने वाली आवाज में "स्वतंत्रता की जय" कह सके। कहना चाहेंगे, तो स्वर फट जायेगा, जैसे जन-गण-मन के आखिर ...

शब्दों की सत्ता अनमोल
शब्दों की सत्ता अनमोल

उन्नीस सौ अट्ठाईस। चांद का फाँसी अंक बाज़ार में आया। दो सौ साल की गोरी हुक़ूमत के ज़ुल्मों का दस्तावेज़। रामप्रसाद बिस्मिल, सरदार भगतसिंह और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे देशभक्तों ने उसमें लेख और कविताएँ लिखीं थीं। आचार्य चतुरसेन इसके संपादक थे। दस हज़ार प्रतियाँ छापीं गईं। जैसे ही छपकर बाज़ार में आया, हड़कंप ...

आज़ादी की अभिधारणा
आज़ादी की अभिधारणा

भारतीय प्रायद्वीप के लिए अगस्त आज़ादी के उत्सव को मनाने का महीना है। इसी महीने इस भूभाग के दो राष्ट्र - भारत और पाकिस्तान, जो 1947 ई. के पहले ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा थे, अपने सपूतों के अथक संघर्ष, त्याग और बलिदान के बाद आज़ाद मुल्क या स्वतंत्र राष्ट्र बने।
    प्रश्न है कि आज़ ...

आजादी क्यों?
आजादी क्यों?

अजादी क्यों? सवाल बड़ा अजीब लगेगा क्योंकि प्रश्न तो यह होना चाहिये कि आजादी क्यों नहीं? पर अंग्रेजों ने 19वीं शताब्दी के अंत तक पूरे विश्व में यह बात सब के दिल-दिमाग में भर दी थी कि भारत सहित सभी काले देशों को गुलाम बना कर अंग्रेज उन पर एहसान कर रहे हैं क्योंकि इसके बिना असभ्य लोग आपस में लड़-झगड़ क ...

आज़ादी के विरोधाभाष
आज़ादी के विरोधाभाष

आज़ादी एक बहुआयामी शब्द है। मूलतः यह राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक, धार्मिक हो सकती है। किसी भी देश और सभ्यता की दीर्घकालिक उन्नति एवं सम्पन्नता के लिए यह आवश्यक है कि उसका पूर्णतः आज़ाद अस्तित्व हो। भारत सदियों से हर प्रकार से एक अत्यन्त संपन्न एवं उन्नत देश रहा था किन्तु बाद में इसे परतंत्रत ...

स्वतंत्रता और अनुशासन
स्वतंत्रता और अनुशासन

संसार के किसी विकसित देश से तुलना की जाये तो एक आम भारतीय कहीं अधिक आज़ाद है। चलती बसों में चढ़ने-उतरने से लेकर कहीं भी कचरा फैलाने, थूकने से लेकर नित्यक्रिया तक के लिये कहीं भी बैठ जाना सामान्य-सी बात है। जिसे कभी दो पैसे का निवेश करना नहीं आया वह रिज़र्व बैंक की नीतियों पर व्याख्यान दे डालता है और ...

स्वतंत्रता और प्रेम
स्वतंत्रता और प्रेम

प्रेम का जितना सघन संबंध प्रेम से है उससे कहीं अधिक विश्वास से है। विश्वास और आत्मीयता के अपरिहार्य आकर्षण से ही प्रेम की नींव पड़ती है। जिसे सौंदर्य और व्यक्तित्व के मानक अपनी तरह से रचते हैं। जिसमें किसी तरह की अविश्वसनीयता और विकर्षण की स्थिति आने पर प्रेम संबंधों में सिर्फ दरारें ही नहीं पड़ती ...

चलना है जंतर मंतर
चलना है जंतर मंतर

पहिचान ये हमारी
फू-मंतर कर दो अन्दर
देख लें क्या हो रहा है
चलना है जंतर मंतर
क्यों हो रही है शंका
गोपाल है सिकंदर
राष्ट्र की नयी स्वतन्त्रता
चलना है जंतर मंतर
गौ-भक्तों की कहानी
हट गई अनैतिक बबंडर
सबूत खुशकिस्मत
...

ईश आराधना
ईश आराधना

हवा बसंती
हलके से छुए मुझे---
सहलाए तन को,
और – स्फुरित कर दे मन को!

सुबह का सूरज
खिड़की से झाँकता सा--
अनंत आकाश को
अपने बाजुओं में समेटे --
उज्जवलित कर दे तन को --
और प्रफुल्लित कर दे मन को!!!

भीना ...

शूल
शूल

मैंने फूलों को भी
काँटों से प्यार करते देखा है
चुपचाप बातें करते देखा है
रात की अमराइयों में
सोये थे दोनों चुपचाप
सुबह देखा तो पत्ती-पत्ती
बिखरी पड़ी थी
मेरी विकलता पर कह रही थी
धैर्य धर ओ संसारी।


मैत्री है कंटक स ...

बंद अंधेरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
बंद अंधेरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम

ये चाँद ख़ुद भी तो सूरज के दम से काइम है
ये ख़ुद के बल पे कभी चांदनी नहीं देते
गज़ब के तेवर लिए छोटी-सी, प्यारी-सी शायरी की किताब "जन गण मन" के लेखक हैं ब्लॉग जगत के शायर जनाब द्विजेन्द्र द्विज। ब्लॉग पर उनकी सक्रियता अधिक नहीं रहती लेकिन वो जब भी अपनी ग़ज़लों से ...

स्वच्छंदता के उपफल
स्वच्छंदता के उपफल

आदमी समस्त सृष्टि पर तो नियंत्रण नहीं कर सकता लेकिन अपने समाज, परिवार और अपने संपर्क में आने वाले सभी मनुष्यों, पशु-पक्षियों और यहाँ तक कि प्रकृति के अवयवों और उपादानों से भी अपनी और अपने समाज की व्यवस्था के अनुसार एक विशिष्ट प्रकार के आचरण और व्यवहार की आशा करता है। यह बंधन नहीं बल्कि समाज के सु ...

साल की छुट्टियां!
साल की छुट्टियां!

पराये देश में अगर कोई देश का मिल जाए तो ख़ुशी होती है, लेकिन अगर कोई अपना ही सगा आपके शहर के नजदीक हो तो इससे बड़ी खुशी की बात क्या होगी। हमने बच्चों की गर्मियों की छुट्टियों अपने भाई के पास जाकर मनाने की योजना बनायी। वह वाशिंगटन डीसी में है। वैसे तो बाहर से आने वाले और यहां के रहवासी इस शहर को देख ...

सर्वज्ञता की खोज का मिशन
सर्वज्ञता की खोज का मिशन

आज़ादी के सही मायने आखिर हैं क्या? क्या सिर्फ नारे लगाने की छूट या बस अपने मन का करने की छूट को ही आज हम आज़ादी से जोड़ते हैं? क्या आजादी का सही अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि आप अपने देश या इस यूनिवर्स के लिए कुछ करें! कुछ ऐसा जिससे पूरी मानवता को गर्व हो।
ऐसा ही एक विज्ञान है जिसे सर्वज्ञता (Omni ...

आज़ादी की कीमत
आज़ादी की कीमत

देश केवल लोगों के रहने की जगह का नाम नहीं है, वह तो सहकार भावना से जीवन को आपस में सँवारने की जगह है। किसी भी देश के लोग कभी भी अकेले-अकेले जीवन नहीं जी सकते, उन्हें तो साथ रहकर ही जीवन की सुन्दर कल्पना करना पड़ती है। इस कल्पना के न होने से किसी भी देश का कोई भी सपना साकार नहीं हो पाता है। फिर मन ...

देशाटन का आनंद है अलग
देशाटन का आनंद है अलग

भारत की संस्कृति एक आत्मसंबद्ध निरंतर संस्कृति है इसलिए यहां का हर क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से हर दूसरे क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। हम देश के दूसरे इलाके में भोजन करते हैं, तो हम नए स्वाद का अनुभव करने के साथ देश की एकता को भी चख लेते हैं।
देश घूमना चाहिए। देशाटन बड़ा पुराना शब्द है और भारत में समय ...

पढ़ने-पढ़ाने का माध्यम
पढ़ने-पढ़ाने का माध्यम

नयी शिक्षा नीति के संबंध में कुछ सुझाव, टीएसआर सुब्रमनियम, पूर्व कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट शिक्षा मंत्रालय को सौंप दी है। केंद्र सरकार ने सारे देश से सुझाव मांगे हैं- 31 जुलाई तक। पढ़ने-पढ़ाने का माध्यम किसी भी शिक्षा-व्यवस्था का सबसे अहम् हिस्सा होता है। नयी सिफारिशो ...

बेलारूस में हिंदी समर कैंप
बेलारूस में हिंदी समर कैंप

छह से चौबीस जून 2016 तक "ज़ारनीत्सा" नामक समर कैंप सम्पन्न हुआ। बेलारूस के मिन्स्क नगर से 46 किलोमीटर की दूरी पर ओ.जे.एस.सी. इंटीग्रल द्वारा स्थापित किया गया यह हिन्दी भाषा स्टूडियो "अलंकार" आयोजन की मेहमानदारी करता रहा। इस कैंप में मेरा पूरा बचपन बीता और यहीं से मैं बड़ी होकर कई साल तक अध्यापिका क ...

चित्रकूट पर्वत श्रृंखला
चित्रकूट पर्वत श्रृंखला

जैसा कि पहले अन्य लेखों में भी देखा जा चुका है, वाल्मीकि अपने कवित्त में प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन करने में अद्वितीय है। उनके वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो कवि को राम का वन में इस तरह घूमना बहुत पसंद है, जिससे कि वह प्राकृतिक सुदंरता का विस्तार से महिमा मंडन कर सके। अनेक तरह के पौधे, फूल, ...

आज़ाद हूँ दुनिया के चमन म
आज़ाद हूँ दुनिया के चमन म

आह! यह बेरोकटोक जीने का अहसास मन को मुदित कर देता है। यूँ भी क़ैद में कौन रहना चाहता है हुज़ूर? लोग बाग़ तो धरती की सीमाओं को तोड़कर आकाश में उड़ना चाहते हैं। पर क्या यह सम्भव है? रूसो के अमर शब्दों में "आदमी आज़ाद पैदा होता, मगर हर तरफ हम उसे ज़ंजीरों में बंधा देखते हैं।" जी हाँ नियम-क़ानून, रीति-रिवाज़, ...

हम जो समझा किये
हम जो समझा किये

कागज पर कभी कोई सवाल हल नहीं हो पाता। वह उन कागजों को पढ़ डालने से भी हल नहीं होता जो सदियों से लिखे पड़े हैं। कई पीले पड़कर सड़ गये, कई हवा में उड़ गये। दुनिया कागज सँभालकर थक गयी है पर उन्हें रोज कोई न कोई गूदता ही रहता है। कागजों पर संसार का कोई नक्शा आज तक बन नहीं पाया। ईश्वर का कोई रूप थिर नहीं ह ...

पॉल की तीर्थयात्रा
पॉल की तीर्थयात्रा

अर्चनाजी पैन्यूली के उपन्यास "पॉल की तीर्थयात्रा" ने वर्जीनिया वुल्फ़ के 1925 में प्रकाशित उपन्यास "मिसिज डेलोवेे" की याद दिला दी जो मनश्चेतन-प्रवाह-पद्धति (Stream of Consciousness) का संभवत: प्रथम उपन्यास था। "पॉल की तीर्थयात्रा" और "मिसिज डेलोवेे" में कई समानताएं हैं। दोनों सीमित-कालीन हैं (पॉल ...

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