ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आवरण (10)
महाकुंभ और वैश्विक गांगेय संस्कृति
01-Apr-2016 12:00 AM 201 महाकुंभ और वैश्विक गांगेय संस्कृति

भारत से बाहर विश्व के अन्य देशों के भारतवंशियों और भारतीयों के जीवन में भोलेशंकर बाबा से जुड़े पर्वाें का विशेष माहात्म्य है। हर माह की शिवरात्रि से लेकर महाशिवरात्रि तक का इसमें प्राधान्य रहता है ज


प्रो. डॉ. पुष्पिता अवस्थी Author : प्रो. डॉ. पुष्पिता अवस्थी, Netherlands
कुम्भ और कुम्भीपाक
01-Apr-2016 12:00 AM 201 कुम्भ और कुम्भीपाक

समुद्र-मंथन से अमृत निकलता है और विष-वारुणी भी। जब विष्णु वि?ामोहिनी का रूप धारण करके धोखे से दानवों को वारुणी और देवों को अमृत पिलाते हैं तो वे एक ही बर्तन में अन्दर से दो भाग करके अमृत और वारुणी


रमेश जोशी Author : रमेश जोशी, USA
महाकुम्भ की घड़ी
01-Apr-2016 12:00 AM 209 महाकुम्भ की घड़ी

भारतीय सनातन संस्कृति शा?ात मूल्यों और सिद्धांतों के आधार पर विकसित हुर्इं है। सनातन का अर्थ ही है - शा?ात, निरन्तर और चिरस्थायी और इस प्रकार सनातन धर्म का अर्थ - शा?ात, निरन्तर, चिरस्थायी और दृढ़ त


राजेश करमहे Author : राजेश करमहे, India
जल की महिमा अंग्रेजी से अनुवाद - संजीव त्रिपाठी
01-Apr-2016 12:00 AM 185 जल की महिमा अंग्रेजी से अनुवाद - संजीव त्रिपाठी

शायद आदि मानव की पहली कुछ खोजों में यह शामिल रहा होगा कि, जीवित रहने के लिए वायु और जल का अलग-अलग महत्व है। वायु हमारे पास आती है और हम श्वाँस लेते है, परन्तु पानी की आवश्यकता पूर्ति करने के लिए हम


डॉ. विजय मिश्र Author : डॉ. विजय मिश्र, INDIA
अखाड़ों में छलकती कुम्भ कथा
01-Apr-2016 12:00 AM 200 अखाड़ों में छलकती कुम्भ कथा

कुम्भ और कलश भारतीय संस्कृति के शुभ प्रतीक हैं। संभव है कि कुम्भ मेलों की शुरुआत इन्हीं शुभंकरों के साथ हुई हो। इसीलिए इन्हें कुम्भ कहा जाने लगा हो। इस मेले लगने के स्थान का निर्धारण राशियों की स्थ


डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा Author : डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा, CHINA
महाकाल की छाया में अमृत का प्लावन
01-Apr-2016 12:00 AM 195 महाकाल की छाया में अमृत का प्लावन

कुम्भ पर्व को सुनते ही पवित्र जल श्रोत पर एक उमड़ता महा जनसमुद्र स्मृति में कौंध जाता है। यह एक नहान (स्नान) की ओर उन्मुख तीर्थ यात्रा का आखिरी पड़ाव होता है, जिसमें भिन्न-भिन्न जाति, वर्ग, आयु और सम


प्रो. गिरीश्वर मिश्र Author : प्रो. गिरीश्वर मिश्र, India
उज्जयिनी : मोक्ष नगरी
01-Apr-2016 12:00 AM 138 उज्जयिनी : मोक्ष नगरी

कथा की शुरूआत तब से होती है, जब देवताओं ने शिव के निवास के लिये एक उपयुक्त स्थान को चुनने का काम किया। उन्होंने इसके लिये विद्वतजनों की सभा आहूत की। सभा में ऐसे विद्वान आमंत्रित किये गये, जो धर्म,


डॉ. रवीन्द्र पस्तोर Author : डॉ. रवीन्द्र पस्तोर, India
कुंभ का वैज्ञानिक पक्ष
01-Apr-2016 12:00 AM 213 कुंभ का वैज्ञानिक पक्ष

कुम्भ के दो पहलू हैं। पहला पक्ष है पुराणों से उद्धृत है, ज्योतिष शास्त्र भी मान्यता देता है लेकिन ज्योतिष शास्त्र ज्यादा पुराना है और इसे पहले से मान्यता दे रहा है। ज्योतिष शास्त्र के हिसाब से सूर्


संजीव गुप्त Author : संजीव गुप्त, INDIA
दुनिया की नज़र में कुम्भ
01-Apr-2016 12:00 AM 198 दुनिया की नज़र में कुम्भ

कुम्भ मेला केवल एक मेला ही नहीं वरन विभिन्न भाषा, संस्कृति और क्षेत्रों से आने वाले आस्तिक और नास्तिकों के मिलन का एक केंद्र है। मेले के दौरान जो विशाल जन समूह दिखता है, अगर उसे जन समुद्र का नाम दि


प्रो. शिव कुमार सिंह Author : प्रो. शिव कुमार सिंह, INDIA
कुम्भ के बहाने क्रिसमस स्मरण
01-Apr-2016 12:00 AM 200 कुम्भ के बहाने क्रिसमस स्मरण

यूरोप का ऐसा कोई बड़ा पर्व नहीं है जैसा भारत में कुम्भ मेला है कि लोग सब दिशाओं से आकर एक स्थान इकट्ठे हो जाएँ। ईसाई धर्म भी इतना प्राचीन नहीं है जितना हिंदू धर्म है। हाँ सारे यूरोप में क्रिसमस मनाय


दागमार मारकोवा Author : दागमार मारकोवा, India
रम्य रचना (2)
चलो मन गंगा-जमुना के तीर
01-Apr-2016 12:00 AM 255 चलो मन गंगा-जमुना के तीर

मन की शांति के लिए दरिया के किनारे से अच्छा स्थल और कोई नहीं हो सकता। रसखान के "कालिंदी कूल' में जितना आनंद है, उतना ही मथुरा के लोक गीतों में जमुना को लेकर है - आज ठाड़ो री बिहारी जमुना तट पे, मत ज


सुधा दीक्षित Author : सुधा दीक्षित, INDIA
कुम्भ में जल हो!
01-Apr-2016 12:00 AM 222 कुम्भ में जल हो!

कुम्भ, घड़ा, घट, कलश आदि सब एक ही परिवार के शब्द हैं। लेकिन भगवान "घट घट
 वासी' हैं, घड़े-घड़े वासी नहीं। भक्ति में कलश को कैलाश से जोड़ दिया। अधिक प्यार आया तो किसी घड़े को गागर और गगरी भी कह दिया। अधज


डॉ. विजय विवेक दीक्षित Author : डॉ. विजय विवेक दीक्षित, USA
संस्मरण (2)
स्मृतियों में कुम्भ मेला
01-Apr-2016 12:00 AM 296 स्मृतियों में कुम्भ मेला

सितबंर माह की गुलाबी ठंड का धीमे-धीमे आगमन हो रहा था जब कुम्भ में शामिल होने के लिये मैं मुम्बई से नासिक के लिये रवाना हुआ। नासिक से मुम्बई की दूरी लगभग २०० किलोमीटर की है किंतु चार-पांच घंटे की या


रजनीश कुमार यादव Author : रजनीश कुमार यादव , INDIA
श्रद्धा का समाजवादी पर्व
01-Apr-2016 12:00 AM 201 श्रद्धा का  समाजवादी पर्व

हम तीन लोग एक टेंट में सो रहे थे। साथी रिपोर्टर मनीष श्रीवास्तव, छायाकार विनय पाण्डेय और मैं। मुझे भीषण सर्दी लगी तो आंख खुल गई। बगल से दांत किटकिटाने की आवाज़ आयी तो पलटा। देखा मनीष के दांत बज रहे


आशुतोष शुक्ल Author : आशुतोष शुक्ल, India
पुस्तक अंश (2)
सुलगती टहनी
01-Apr-2016 12:00 AM 62 सुलगती टहनी

मैं इस मेले में खाली होकर आया था। सब कुछ पीछे छोड़ आया था- तर्कबुद्धि, ज्ञान, कला, जीवन का एस्थेटिक सौन्दर्य। मैं अपना दुख और गुस्सा और शर्म और पछतावा और लांछना-प्रेम और लगाव और स्मृतियाँ भी छोड़ आया


निर्मल वर्मा Author : निर्मल वर्मा , India
मेघदूत में उज्जयिनी
01-Apr-2016 12:00 AM 197 मेघदूत में उज्जयिनी

विशाला उज्जयिनी का दूसरा नाम है। यह नगरी सब प्रकार से विशाल है। शोभा, सम्पत्ति और शालीनता यहां विग्रहवती होकर वास करती हैं, इसीलिए मैं इसे "श्रीविशाला विशाला' कहता हूं। मेरा ऐसा विचार है कि स्वर्ग


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी Author : आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, India
चिन्तन (2)
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य
01-Apr-2016 12:00 AM 164 प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य

प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, ब


गंगानंद झा Author : गंगानंद झा,
प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य
01-Apr-2016 12:00 AM 164 प्रकृति, ईश्वर और मनुष्य

प्रकृति ने विधाता को प्रणाम किया, "पिता, यह किस साज में सजाया मुझे? यह विन्यास, यह परतों में गूँथा संगठन, यह सुर, छन्द, लय और ध्वनि! विविधता तथा वैचित्र्य का मनोहारी सौन्दर्य; पर साथ ही कण-कण पर, ब


गंगानंद झा Author : गंगानंद झा,
व्याख्या (1)
भारतीय अध्यात्म के अबूझ बिम्ब
01-Apr-2016 12:00 AM 203 भारतीय अध्यात्म के अबूझ बिम्ब

एक विज्ञापन में लिखा है, आध्यात्मिक वस्तुएं- माला, चन्दन, अगरबत्ती सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। इसमें अध्यात्म शब्द के प्रयोग से यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की है कि अध्यात्म "वस्तु' में हैं जिनके प्र


ब्राजेन्द्र श्रीवास्तव Author : ब्राजेन्द्र श्रीवास्तव, India
कविता (1)
कुम्भ कविताएँ
01-Apr-2016 12:00 AM 122 कुम्भ कविताएँ

(१)
एक समय था
जब देवताओं की भी मृत्यु होती थी
और असुरों की भी

गुजरते थे वे भी
जन्म और मरण के चक्र से

रहे होंगे औरों के वि·ाासों में
देवता स्वभा


मनोज कुमार श्रीवास्तव Author : मनोज कुमार श्रीवास्तव,
शिकागो की डायरी (1)
शिकागो में होली
01-Apr-2016 12:00 AM 161 शिकागो में होली

हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की पारम्परिक कथा के साथ ही आजकल होली का त्यौहार एक नए रूप में प्रचलित हो गया है। आज के माहौल का प्रखर विचार "लेट ईट गो...' पूरी तरह से होली के त्यौहार को जैसे और रंग भर देने


अपर्णा राय Author : अपर्णा राय, USA
बातचीत (1)
बाबाओं के कुम्भ में एक जिज्ञासु
01-Apr-2016 12:00 AM 296 बाबाओं के कुम्भ में एक जिज्ञासु

सब कुछ अविस्मरणीय... अकल्पनीय... सपना सच होने जैसा। धर्मप्राण जनता-जनार्दन के अंत:करण में हिलोरे मारती आस्था और व्यवस्था के बीच अव्यवस्था का आनंद। संगम स्नान के तदंतर हर चेहरे पर खिली अजब सी मुस्का


राजू मिश्र Author : राजू मिश्र, INDIA
स्मरण (1)
स्मृतिगंधा
01-Apr-2016 12:00 AM 235 स्मृतिगंधा

जैसे पूरा यथार्थ आमने-साने की पहाड़ियों के बीच फैला है। एक पहाड़ी उजाले की दूसरी अंधेरे की। उजाले में अंधेरे की पहाड़ी दिखाई देती है-- उजाले को अपने पास बुलाती, इतने पास कि उजाले की पहाड़ी अंधेरे में ड


ध्रुव शुक्ल Author : ध्रुव शुक्ल, INDIA
अनुवाद (1)
एक आध्यात्मिक नजरिया, जीने की एक राह (अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद गंगानंद झा)
01-Apr-2016 12:00 AM 192 एक आध्यात्मिक नजरिया, जीने की एक राह (अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद गंगानंद झा)

एशिया और यूरोप के बीच अन्तर स्पष्ट करने के लिए
    लोग एशियाई मन की धार्मिक रुझान एवम् यूरोपीय
    मानसिकता के वैज्ञानिक मिजाज की चर्चा करते हैं। इस अन्तर को इस तथ्य स


गंगानंद झा Author : गंगानंद झा,
सम्पादकीय (1)
अवधूता, गगन घटा गहरानी
01-Apr-2016 12:00 AM 290 अवधूता, गगन घटा गहरानी

अदिम मनुष्य बादल, आसमान, सागर, तूफान, नदी, पहाड़, विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों, जीव-    जन्तुओं के बीच अपने आपको असुरक्षित, असहाय और असमर्थ महसूस करता था। वह भय, कौतूहल और जिज्ञासा से


गंगानंद झा Author : गंगानंद झा,
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