ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
11वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन, मॉरीशस "ग्यारह" दिन चले अढ़ाई कोस
01-Sep-2018 08:40 PM 413     

ग्यारहवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शामिल होने के लिये पुणे-दिल्ली विमान प्रवास में अचानक ये पंक्तियाँ मन में उदित हुईं। भारत सरकार के प्रतिनिधिमंडल के साथ 16 अगस्त को देर रात दिल्ली से मॉरीशस के लिये रवाना हुए और अगली सुबह वहाँ पहुँचे।
हवाई अड्डे से होटल तक की एक घंटे की बस यात्रा ने मॉरीशस की निसर्गरम्य धरती से परिचय कराया। चारों ओर गन्ने के खेत। आम, इमली और सैकड़ों प्रकार के वृक्ष। हरे-भरे पहाड़। अत्यंत सुगढ़ता से बनी सड़कें और उन पर अनुशासित भाव से चलते वाहन। अगल बगल दीखते एक या दो मंजिले बड़े-बड़े मकान यहाँ की सम्पन्नता के द्योतक थे।
विश्व हिन्दी सम्मेलन के सरकारी आयोजन पर अनेक सवाल उठाये जाते हैं। इसका एक पक्ष यह भी है कि जब सरकार इस आयोजकत्व का भार स्वीकार करती है तब उससे एक विशिष्ट संकेत मिलता है कि इसके माध्यम से सरकार अपनी कुछ नीतियों को आगे बढ़ाना चाहती है। वे कौन-सी सरकारी नीतियाँ हैं जो हिन्दी भाषा के साथ परस्परावलंबिता का नाता रखती हैं? सम्मेलन की थीम थी - वैश्विक हिन्दी एवं भारतीय संस्कृति। इसलिये नीतिगत तीन प्रश्न उठते हैं - भारत सरकार की हिन्दी को लेकर सन्निकट नीति, मध्यावधि की नीति एवं दूरगामी नीति क्या है? यही तीन प्रश्न संस्कृति के संबंधमें भी उठते हैं और डायास्पोरा भारतीयों के हिन्दी लेखन के संबंध में भी उठते हैं।
इनके उत्तर क्या भारत सरकार की किसी नीति में परिलक्षित होते हैं? मुझे तो नहीं दीखते। सामाजिक फैशन के चलते एक नीति परिचलन में आई है कि यूएन की भाषाओं में हिन्दी को भी स्थान मिले। इस पर थोड़ा काम भी हुआ है। हाल में यूएन ने अपने रेडियो से सप्ताह में एक बार हिन्दी बुलेटिन देना आरंभ किया है। इस एक मुद्दे को छोड़ें तो सरकार के पास कोई अन्य मुद्दा ही नहीं है जिसे हिन्दी के लिये बनी नीति कहा जा सके। यह अभाव मैंने सूरीनाम और न्यूयार्क के सम्मेलनों में भी पाया था और दस मौलिक बिन्दु सुझाये थे जिन पर सरकार को अपनी नीति घोषित करनी चाहिये। लेकिन नतीजा नहीं दिखा। तो फिर विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन का यश या उसमें सरकारी यजमानत्व यश हम किस निकष पर तौलेंगे?
यहाँ मुझे कुछ मुद्दे रखने हैं जिन पर विमर्श आरंभ होना चाहिये। सम्मेलन की थीम थी - वैश्विक हिन्दी एवं भारतीय संस्कृति। उद्घाटन सत्र में भारत की विदेशमंत्री के साथ दोनों विदेश राज्यमंत्री, गोवा व पश्चिम बंगाल के राज्यपाल, गृह राज्यमंत्री एवं मानव संसाधन राज्यमंत्री उपस्थित थे। मॉरीशस के प्रधानमंत्री व शिक्षामंत्री भी थे। अर्थात् यह एक पूर्णरूपेण सामथ्र्यवान मंच था। अटलजी के दुखद निधन की शोकछाया सम्मेलन पर थी। उसे सुषमाजी ने संवेदनापूर्वक संभाल लिया। उन्होंने घोषणा कर दी कि भोजनोपरान्त सत्र अटलजी के प्रति श्रद्धांजलि निवेदन का सत्र होगा और पहला सत्र उसी प्रकार उत्साहपूर्वक चलेगा जो अटलजी जीवित होते तो उन्हें अच्छा लगता। उन्होंने पिछले दसों सम्मेलनों में की गई अनुशंसाओं को एकत्र करने की व उनके अनुपालन पर ध्यान देने की बात भी कही। लेकिन विडम्बना है कि ये अनुशंसाएँ अभी भी विश्व हिन्दी सम्मेलन के पोर्टल तक नही पहुँच पाई हैं।
सम्मेलन में समानान्तर सत्र चले। शिक्षा में संस्कृति, लोक साहित्य में संस्कृति, फिल्मों में, प्रवासी साहित्य में, बाल साहित्य में, संचार माध्यम में संस्कृति आदि संस्कृति से जुड़े विषयों के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी नामक सत्र भी था। यह ऐसा विषय है जो सूरीनाम से या शायद उससे पहले से चला आ रहा है। मेरे विचार में यह एक अत्यंत गंभीर मुद्दा है जिस पर केन्द्र सरकार न केवल उदासीन बल्कि गलत रास्ते पर भी है। इसीलिये नीति की बात मैंने उठाई।
प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सरकारी नीति सदा से हिन्दी-विरोधी और अंगरेजी परस्त रही है, जो कि शिक्षा क्षेत्र में उसी नीति का प्रतिबिम्ब है। यह घटनाक्रम मैंने 1991 से अर्थात् पिछले 28 बरसों से देखा है। राजनेता व नौकरशाह यह कहकर बचना चाहते हैं कि हम तकनीक में नहीं जायेंगे - हमारा काम तो नीति बनाने का है। तो देश में अवश्य ही कुछ ऐसी शक्तियाँ हैं जो सामान्यजन की आँखों से दूर हैं परन्तु तकनीकि विशेषज्ञों को अपनी जेब में रखती हैं। ये ही वे शक्तियाँ भी हैं जो केंद्र सरकार से ऐसी नीतियाँ बनवाती हैं जो हिन्दी को दोयम स्थान पर डाल दे और अंगरेजी को ही हर जगह प्रश्रय दे। देश में सरकार किसी भी पार्टी की हो, वे इन शक्तियों की चातुर्यभरी रणनीति से नहीं बच सकतीं। इसीलिये हमें हिन्दी की दुर्दशा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी देखने को मिलती है।
सूरीनाम के सम्मेलन में मैंने प्रेक्षक की हैसियत से यह मुद्दा उठाया था कि सी-डैक के ही कुछ वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड हर तरह से भारतीय भाषाओं के लिये सरल सुलभ है क्योंकि इसकी संरचना हमारी वर्णमाला के चार्ट की तरह उसी क्रम से की गई है। जिन भी बच्चों ने पहली कक्षा में "कखगघङ" से "क्षत्रज्ञ" तक का वर्णमाला चार्ट सीखा हो, वह चाहे चौथी कक्षा में स्कूल छोड़ दे या बारहवीं में, लेकिन वह कम्प्यूटर पर लेखन अवश्य कर सकता है। तब मंचासीन एक विद्वान ने कहा था कि बहनजी को समझना चाहिये कि देश का युवा अंगरेजी जानता है, यह देश की स्ट्रेंग्थ है, इसलिये हम सी-डैक द्वारा बनाया गया वह दूसरा की-बोर्ड अपनाते हैं जो रोमन फोनेटिक अर्थात क्वर्टी को-बोर्ड की सहायता से भारतीय भाषाएँ लिखता है। हमारा ध्यान इस ओर होना चाहिये कि कैसे हमारा युवा अधिकता से कम्प्यूटर का प्रयोग करे और यदि उसने क्वर्टी की-बोर्ड सीखा ही हुआ है तो वह दूसरे की-बोर्ड सीखने के लिये समय क्यों खराब करे।
मुझे हठात् ध्यान आया कि अरे, सूरीनाम सम्मेलन से कुछ ही महीने पूर्व सोनिया गाँधी ने विज्ञान भवन में आयोजित एक कार्यक्रम में रोमनागरी शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने अपने संभाषण में कहा कि इस देश के युवाओं को व लेखकों को रोमनागरी के माध्यम से अर्थात् फोनेटिक पद्धति से हिंदी व अन्य भारतीय भाषाएँ लिखने के लिये एक तोहफा देते हैं, हमारी सरकार सी-डैक के माध्यम से ऐसी एक करोड़ सीडी मुफ्त उपलब्ध करवायेंगी जिसे अपने कम्प्यूटर पर अपलोड करके आप डण्ठ्ठद्धठ्ठद्य लिखेंगे और स्क्रीन पर देवनागरी या कन्नड़ इत्यादि में भारत लिखा दिखाई पड़ेगा।
सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं को दोयम बनाकर रोमन लिपी को प्रस्थापित करने की एक सशक्त नीति बनाना व उसे अमल में लाना - इसका उत्तम उदाहरण उस दिन देखने में आया।
सूरीनाम के मंचासीन प्रौद्योगिकी विद्वान भी उसी रोमनागरी की जय बुलन्द कर रहे थे और हिन्दी प्रेमियों से कह रहे थे - खुशी मनाओ - कम से कम तुम्हारी स्क्रीन पर हिन्दी दिखती तो है - भले ही तुम्हें उसे रोमन स्पेलिंग के आधार से लिखना पड़ता हो।
तब से अब तक तेरह वर्ष बीत गये, चार सम्मेलन भी हो गये। ग्यारहवें सम्मेलन में भी समापन सत्र में प्रौद्योगिकी अनुशंसाएं पढ़ते हुए बड़े ही धीमे स्वर में कहा गया कि हिन्दी को देवनागरी में ही लिखा जाये। लेकिन ऐसी अनुशंसा नहीं की गई। न तो अनुशंसाकर्ता को और न मंचासीन किसी को यह पता है कि हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओं को वर्णमाला-अनुसारी इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड की सहायता से देवनागरी में लिखा जा सकता है, उनके सबके कम्प्यूटरों में यह प्रणाली विराजमान है और वह इंटरनेट पर टिकाऊ है, लेकिन उनकी आँखों पर पड़ी रोमनागरी प्रेम की पट्टी को कौन खोले?
पाठक अवश्य पूछ सकते हैं कि क्या संपूर्ण प्रौद्योगिकी में हिन्दी की बहस इतनी सी बात पर है कि अपने हिन्दी लेखन को कम्प्यूटर पर उतारने के लिये हम रोमन का सहारा लेते हैं या देवनागरी का? नहीं, लेकिन यह एक प्राथमिक मुद्दा क्यों है इसे पहले समझते हैं।
पहली बात, यदि आप हिन्दी लेखन के लिये रोमन की-बोर्ड पर निर्भर हैं तो आप अपनी लिपी को शीघ्र ही भूलने वाले हैं। बल्कि आपने भूलने की पहली सीढ़ी पार कर ली है। अपनी परीक्षा आप कर लीजिये कि आप ठ्ठडड़ड्ड से न्न्र्न्न् तक कितनी सरलता से पहुँचते हैं और "कखगघङ" से "क्षत्रज्ञ" तक पहुँचने में कितना अटकते हैं। अर्थात् वर्णमाला आप भूल ही रहे हैं। अब लिपि भूलने में भी क्या हर्ज है? गौर करिये कि आपके टीवी चैनलों पर हरेक हिन्दी प्रोग्राम के नाम रोमन में लिखे होते हैं, यहाँ तक कि सरकारी चैनल दूरदर्शन, लोकसभा व राज्यसभा टीवी पर भी। यह सारा किस मंजिल का परिचायक है?
दूसरी बात, उन 70 प्रतिशत बच्चों से संबंधित है जो आठवीं तक पहुँचने से पहले स्कूल छोड़ देते हैं या उन 85 प्रतिशत बच्चों से है जो बारहवीं से पहले शिक्षा छोड़ देते हैं। ऐसे बच्चों से हम कहते हैं - तुम्हें देवनागरी पद्धति से तुम्हारी भाषा लिखना नहीं सिखायेंगे। या तो रोमन स्पेलिंग लिखना सीखो या फिर तुम्हारे लिये प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रवेश वर्जित है, भले ही वह रेलवे रिजर्वेशन जैसी छोटी-सी बात भी क्यों न हो।
तीसरा मुद्दा आता है उन तमाम डायस्पोरा भारतीयों का जो हिन्दी या भारतीय भाषाओं में लेखन करते हैं परन्तु रोमन वर्णाक्षरों से लिखने के लिये मजबूर हैं। 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन का प्रबंध करने में मॉरीशस की विभिन्न संस्थाओं के कुल पांच-छह सौ कर्मचारी लगे हुए थे। उनमें से कइयों को मैंने मीडिया कक्ष ले जाकर इनस्क्रिप्ट द्वारा देवनागरी लेखन विधि दिखाई तो उन्होंने इसे बड़ी सरलता से सीख लिया। इसके बावजूद सभी विश्व हिन्दी सम्मेलनों में यह केवल अनुशंसा मात्र रह जाती है । इसका 10 मिनट का डेमोन्स्ट्रेशन भी नहीं दिखाया जाता। या तो मंच पर विचरने वाले प्रौद्योगिकी एक्सपर्ट इस सुविधा के विषय में पूर्ण अज्ञानी हैं या फिर रोमन के इतने अधिक शरणागत कि जानते हुए भी इस देवनागरी सुविधा को दबा जाते हैं।
तो स्पष्ट दिखता है कि अनुशंसाकर्ता देवनागरी लेखन सुविधा का मुद्दा तुच्छ मानते हुए अधिक महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी समस्याओं की बात करना चाहते हैं। उनकी अनुशंसाएँ थीं - 1. हिन्दी शिक्षा को समाज के प्रत्येक स्तर पर लागू किया जाये। 2. युनिकोड स्क्रिप्ट को सर्चेबल किया जाये। 3. बैंकिंग सेक्टर में युनिकोड का प्रचार-प्रसार किया जाये। 4. सभी निजी व सरकारी सेवाएँ हिन्दी में उपलब्ध की जाएँ। 5. बीमा, अंग्रेजी में प्राप्त आईटी सोल्यूशन को हिन्दी में किया जाये। 6. भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार हेतु सभी वेबसाइट्स द्विभाषी (अंग्रेजी और हिन्दी) स्वरूप में किया जाये तथा 7. यूनिकोड का मानकीकरण किया जाये। (संदर्भ - सम्मेलन की ओर से प्रकाशित हिन्दी विश्व का अंक-4)
उपरोक्त अनुशंसा क्रमांक 2, 3 व 7 अत्यंत ही दुर्बोध हैं और दर्शाती हैं कि इन्हें युनिकोड की ही जानकारी नहीं है। युनिकोड एक कोड ड़दृड्डड्ढ है - एक मानक है। द्वदत्ड़दृड्डड्ढ.दृद्धढ़ नामक वेबसाइट पर युनिकोड के विषय में यह लिखा है -
ड़दृथ्र्द्रद्वद्यड्ढद्धद्म त्र्द्वद्मद्य ड्डड्ढठ्ठथ् ध्र्त्द्यण् दद्वथ्र्डड्ढद्धद्म. च्र्ण्ड्ढन्र् द्मद्यदृद्धड्ढ थ्ड्ढद्यद्यड्ढद्धद्म ठ्ठदड्ड दृद्यण्ड्ढद्ध ड़ण्ठ्ठद्धठ्ठड़द्यड्ढद्धद्म डन्र् ठ्ठद्मद्मत्ढ़दत्दढ़ ठ्ठ दद्वथ्र्डड्ढद्ध ढदृद्ध ड्ढठ्ठड़ण् दृदड्ढ. एड्ढढदृद्धड्ढ छदत्ड़दृड्डड्ढ ध्र्ठ्ठद्म त्दध्ड्ढदद्यड्ढड्ड, द्यण्ड्ढद्धड्ढ ध्र्ड्ढद्धड्ढ ण्द्वदड्डद्धड्ढड्डद्म दृढ ड्डत्ढढड्ढद्धड्ढदद्य द्मन्र्द्मद्यड्ढथ्र्द्म, ड़ठ्ठथ्थ्ड्ढड्ड ड़ण्ठ्ठद्धठ्ठड़द्यड्ढद्ध ड्ढदड़दृड्डत्दढ़द्म, ढदृद्ध ठ्ठद्मद्मत्ढ़दत्दढ़ द्यण्ड्ढद्मड्ढ दद्वथ्र्डड्ढद्धद्म. च्र्ण्ड्ढद्मड्ढ ड्ढठ्ठद्धथ्न्र् ड़ण्ठ्ठद्धठ्ठड़द्यड्ढद्ध ड्ढदड़दृड्डत्दढ़द्म ध्र्ड्ढद्धड्ढ थ्त्थ्र्त्द्यड्ढड्ड ठ्ठदड्ड ड़दृद्वथ्ड्ड ददृद्य ड़दृदद्यठ्ठत्द ड्ढददृद्वढ़ण् ड़ण्ठ्ठद्धठ्ठड़द्यड्ढद्धद्म द्यदृ ड़दृध्ड्ढद्ध ठ्ठथ्थ् द्यण्ड्ढ ध्र्दृद्धथ्ड्ड"द्म थ्ठ्ठदढ़द्वठ्ठढ़ड्ढद्म. कध्ड्ढद ढदृद्ध ठ्ठ द्मत्दढ़थ्ड्ढ थ्ठ्ठदढ़द्वठ्ठढ़ड्ढ थ्त्त्त्ड्ढ कदढ़थ्त्द्मण् ददृ द्मत्दढ़थ्ड्ढ ड्ढदड़दृड्डत्दढ़ ध्र्ठ्ठद्म ठ्ठड्डड्ढद्दद्वठ्ठद्यड्ढ ढदृद्ध ठ्ठथ्थ् द्यण्ड्ढ थ्ड्ढद्यद्यड्ढद्धद्म, द्रद्वदड़द्यद्वठ्ठद्यत्दृद, ठ्ठदड्ड द्यड्ढड़ण्दत्ड़ठ्ठथ् द्मन्र्थ्र्डदृथ्द्म त्द ड़दृथ्र्थ्र्दृद द्वद्मड्ढ.च्र्ण्ड्ढद्मड्ढ ड्डत्ढढड्ढद्धड्ढदद्य ड्ढदड़दृड्डत्दढ़द्म ध्र्ड्ढद्धड्ढ ददृद्य ड़दृथ्र्द्रठ्ठद्यत्डथ्ड्ढ ध्र्त्द्यण् ड्ढठ्ठड़ण् दृद्यण्ड्ढद्ध.
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अर्थात् युनिकोड स्वयं में एक मानक है। तो जब कहा जाता है कि युनिकोड स्क्रिप्ट सर्चेबल किया जाये तो प्रश्न उठता है कि ये युनिकोड स्क्रिप्ट क्या होता है जिसे गूगल सर्च पर सर्चेबल करने की बात हो रही है? इसी प्रकार का तकनीकी अनर्थ तीनों अनुशंसाओं में है। युनिकोड का मानकीकरण - यह शब्द ही कितना हास्यास्पद है- क्योंकि युनिकोड स्वयं में ही एक मानक है। आपको अपने कम्प्यूटर लेखन की विधा को युनिकोड के मानकानुसार ढालना पड़ता है ताकि वह विश्व के किसी भी कम्प्यूटर पर खुले तो जंक न हो जाये। कभी एक मंत्री ने कहा था कि यदि हम क्लाउड पर अपना डाटा रखेंगे तो बादल फटने की या बरसने की स्थिति में सारा डाटा बह जायेगा। युनिकोड का मानकीकरण करने की बात करना कुछ ऐसा ही है। जब ऐसी अनुशंसा विश्व हिंदी सम्मेलन के मंच से की जाती हो तो अपने दुर्भाग्य पर रोने के सिवा हिन्दी और क्या कर सकती है?
एक अनुशंसा है कि सरकारी वेबसाइट्स द्विभाषी हों। ये क्यों भई? आज किसी भी सरकारी वेबसाइट को देख लीजिये - वह दोनों भाषाओं में है - अंग्रेजी में और हिन्दी या अन्य राज्यभाषा में। अर्थात् क्या हम मान लें कि अनुशंसा करने वालों ने कभी सरकारी हिन्दी वेबसाइट्स को खोलकर देखा ही नहीं? जो वे नहीं जानते वह असल बात यह है कि सरकारी हिन्दी वेबसाइटें हैं तो जरूर, लेकिन आधी अधूरी, अंग्रेजी शब्दों से भरपूर और कभी अप-टू-डेट न की जाने वाली। यहां तक कि पीएमओ की वेबसाइट भी इससे अछूती नहीं है। मुंबई की एक हिन्दी सेवी महिला इस विषय पर विभिन्न विभागों को पत्र भेजकर पूछती रहती हैं, उनकी पत्र संख्या 500 से अधिक हो गई है पर एक भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। इसके पीछे एक विशुद्ध तकनीकी कारण है जिसका उल्लेख मैंने कतिपय अन्य लेखों में किया है और उससे छुटकारे का उपाय भी इनस्क्रिप्ट ही है। लेकिन शायद सरकारी समितियाँ इस बात को भी समझती हैं कि जब तक प्रश्न का समाधान न मिले तब तक समिति व कुर्सी बरकरार रहती है। तो हो न हो समितियाँ केवल अनुशंसा ही चाहती हैं परन्तु अनुपालन नहीं।
मैं कुछ ऐसी अनुशंसाओं को शब्दांकित करना चाहूंगी जहाँ हिन्दी व प्रौद्योगिकी का एकत्र संबंध है और जो जन-जन को प्रभावित करती हैं।
पहली अनुशंसा है कि इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड जो भारतीय वर्णमाला के अनुसार बनाया होने की वजह से अत्यंत सरलतापूर्वक सीखा जा सकता है, सरकार इसी को भारतीय भाषा लेखन का मानक घोषित करे। सी-डॅक के भूतपूर्व वैज्ञानिक श्री मोहन तांबे ने 1991 में ही इसका सरलतम कैरेक्टर कोड बनाकर उसे बीआईएस द्वारा भारतीय मानक स्वीकार करवा लिया था। 1995 में युनिकोड कन्सोर्शियम ने भी इसे भारतीय भाषाओं के मानक-रूप में स्वीकार किया जिससे यह लेखन इंटरनेट पर टिकाऊ है - जंक नही होता है।
दूसरी अनुशंसा है कि यह सरलतम की-बोर्ड और उसका सरलतम कैरेक्टर कोड बनाकर उसे ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टेण्डर्ड से मानक-मान्यता दिलवाने वाले श्री मोहन तांबे को पद्मश्री से सम्मानित किया जाये। साथ ही सी-डैक के लिये करीब पचीस-तीस सुंदर से फॉण्ट-सेट बनाने वाले आर्टिस्ट व केलीग्राफर श्री र.कृ. जोशी का सम्मान किया जाये। इसी प्रकार श्रीलिपि व कृतिदेव जैसी प्राइवेट संस्थाओं के लिये सुन्दर फॉण्ट-सेट्स बनाने वाले कैलीग्राफरों का भी सम्मान किया जाये। इन सुंदर फॉण्ट-सेटों के कारण भारतीय प्रकाशकों को अतीव फायदा हुआ है और प्रकाशन क्रांति की पहली सीढ़ी - अर्थात प्रकाशन सामग्री को कम्प्यूटर से तैयार करना - हमने पार कर ली है।
तीसरी अनुशंसा है कि इन सभी फॉण्ट-सेटों के प्रोपाइटरी हक रखने वालों से कहा जाय कि इन्हें इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड पर उपलब्ध करवायें। तब प्रकाशन क्रांति की दूसरी सीढ़ी पार होगी।
प्रकाशन क्रांति की तीसरी सीढ़ी पार करना भी अत्यावश्यक है। हमारे प्रायः सभी प्रकाशक पेजमेकर नामक सॉफ्टवेयर का एक पुराना पायरेटेड संस्करण प्रयोग में लाते हैं जो युनिकोड मानांकन के साथ कम्पटेबल न होने से इनस्क्रिप्ट की लिखावट में परेशानी उत्पन्न करता है। उनके नये संस्करण में यह दोष नहीं है। परन्तु उसे पायरेट नहीं किया जा सकता, वरन खरीदना पड़ता है या फिर उनके क्लाउड से रियल टाइम पेमेंट पद्धति से प्रयोग किया जा सकता है। यह खर्चा अगर प्रकाशकों पर भारी पड़ता हो तो सरकार को इसमें कुछ कन्सेशन करवाने का प्रयास करना पड़ेगा।
कम्प्यूटर व आईटी के क्षेत्र में दुनियाभर में फैले तमाम कम्प्यूटर इंजीनियरों का आवाहन कर उनके द्वारा एडोब पेजमेकर जैसा कोई सॉफ्टवेयर भारतीय भाषाओं में बनवाना आवश्यक है। यह भी सरकारी नीति में होना चाहिये। जैसा मैं पहले भी लिख चुकी हूं कि प्रतिभावान वैज्ञानिकों की भर्ती कराने के बावजूद सी-डैक इस काम में असफल ही रहा है और रहेगा क्योंकि वे देशहित की नीति से काम नहीं करते।
सरकारी हिन्दी वेबसाइटों की दुर्दशा के सही कारण दो हैं। पहला यह कि सरकारी टंकण अभी भी पूरी तरह से इनस्क्रिप्ट आधारित नहीं है। हिन्दी टाइपिस्टों की परेशानी है कि उन्हें गूगल इनपुट का सहारा लेना हो तो पहले हर शब्द का स्पेलिंग रोमन में सोचना पड़ता है जिस कारण टाइप करने की गति कम हो जाती है। पुरानी पद्धति से टंकण करने पर वह इंटरनेट-टिकाऊ नही रहता। इसीलिये सरकारी टंकण में इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड का प्रयोग अनिवार्य कर देना चाहिये। गूगल इनपुट की तुलना में इनस्क्रिप्ट के प्रयोग में की-स्ट्रोक्स की संख्या बीस प्रतिशत कम हो जाती है। दुर्भाग्यवश गृह मंत्रालय या राजभाषा विभाग ने अभी तक इनस्क्रिप्ट के लिये कोई प्रबंध नहीं किया है।
दूसरा कारण -- सरकारी हिन्दी वेबसाइटें यथाशीघ्र अपडेट हों इसके लिये यह भी आवश्यक है कि वेब-पेजों में जो तत्काल शुद्धियाँ करनी हों, उनका उत्तरदायित्व व अधिकार उस-उस विभाग के ही एक नोडल अधिकारी को दिया जाये क्योंकि सद्यस्थिति में ऐसी शुद्धियों के पीडीएफ पेज बनवाने पड़ते हैं जिसका अपलोडिंग क्लिष्ट होने से केवल एनआईसी के पास भेजकर ही हो सकता है। तो प्रतीक्षा की जाती है कि उनकी कतार में जब नंबर आयेगा तब शुद्धि होगी।
इसके आगे हमें लिप्यंतरण ओसीआर व अनुवाद के मुद्दों पर ध्यान देना होगा। भारतीय भाषाओं के तत्काल आपसी लिप्यंतरण के लिये अपना समय व परिश्रम लगाकर अक्षरमुख सॉफ्टवेयर बनाने वाले व उसे फ्री डाउनलोड के लिये उपलब्ध करने वाले लंदन स्थित वैज्ञानिक विनोद को भी सम्मानित किया जाना चाहिये।
भारतीय भाषाओं के आपसी अनुवाद के लिये अंग्रेजी को माध्यम बनाने की बड़ी भूल सी-डैक व गूगल दोनों करते हैं। इसलिये अभी तक वे सफल नहीं हो पाये। इसकी बजाय संस्कृत को माध्यम बनाना आवश्यक है। इस दिशा में भी कुछ युवा इंजीनियर प्रयास कर रहे हैं, उन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये।
कुल मिलाकर बात वहीं आ जाती है कि सरकार यदि प्रश्नों को समझकर नीति बनाये तब तो इस प्रकार के सम्मेलनों का बहुत बड़ा उपयोग उन नीतियों को पूरा करने के लिये हो सकेगा, लेकिन घोषित नीति के बिना ये सम्मेलन विफल ही रहेंगे।

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