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"विदेशी/द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी" लिस्बन (पुर्तगाल) में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी 7-9 जून - एक मूल्यांकन
02-Jul-2019 10:35 AM 930     

लिस्बन में ऐसे सौ तथाकथित हिंदी के विशेषज्ञ मिले थे। मतलब भाषाविज्ञान, वाङमय, साहित्य और हिंदी शिक्षा के विशेषज्ञ। यानी ऐसे लोग जो हिंदी प्रेमी और अक्सर हिंदी के प्रचारक और विश्वभाषा हिंदी के प्रेरक भी समझे जाते हैं। सब हिंदी के अध्यापक, प्राध्यापक और आचार्य थे। उनमें से कुछ लोग प्रवासी समाज के थे, जो यूरोप या अमरीका में हिंदी पढ़ाते हैं, कुछ लोग विदेशी मूल के थे और कुछ हिंदुस्तान से आए थे। कई तो आईसीसीआर से भेजे गए विदेश में हिंदी के प्राध्यापक थे। सक्रिय लोग थे जो आमतौर पर अपनी-अपनी जगहों पर अकेले बैठकर पढ़ाते हैं। यानी हिंदी पढ़ाने की ज़िम्मेदारी इनके कन्धों पर थोपी जाती है। इस तरह से हम लोग चाहे या न चाहे हिंदी के राजदूत बनते हैं और हिंदी के प्रचारक भी समझे जाते हैं।
संगोष्ठी से पहले कमेटी के समक्ष प्रतिभागियों को अपने भाषण का सारांश भेजना था। फिर कमेटी ने फैसला किया कि किस को लेंगे किसको नहीं लेंगे। ऐसे पंद्रह-बीस सारांशों को स्वीकृति नहीं मिली। इसके अलावा कई लोग आना चाहते थे पर सारांश ठीक वक़्त पर प्राप्त नहीं हुआ। सिर्फ उन लोगों को निमंत्रण भेजा गया था जिनके सारांशों को स्वीकृति मिली थी। इस पर शायद कई लोगों को नाराज़गी आई होगी। पर यही कार्यक्रम होता है अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों के साथ और होना भी चाहिए। संगोष्ठी के दौरान हर एक को 20 मिनट बोलने की दिलाई गयी थी और दर मिनट सम्वाद के लिए। दो दिनों में चार-चार सत्रों में तीन-तीन पेनल्स में ऐसे तक़रीबन अस्सी व्याख्यान थे। हर 20 मिनट के व्याख्यान के बाद दस मिनट का सवालात। तीन-चार "कीनोट स्पीचेस", पर बुकेत-वुकेत और मोमेंटो-वोमेंटो दिलाने में वक़्त नहीं बिगड़ा। यानी पूरी तरह से संगोष्ठी में गुणवत्ता ले आने की कोशिशें होती रही। और सचमुच अनुशासन होता रहा। ज़्यादातर वक्ता पूरी तैयारी करके आए थे, अच्छे पेपर्स थे। लोगों ने एक-दूसरे को सुना और सही सवाल उठाए गए। यहाँ तक संगोष्ठी बहुत अच्छी लगी। लिस्बन विश्वविद्यालय को, चीएफ़ आर्गेनाइजर शिव कुमार सिंह को भारत के विदेश मंत्रालय और आईसीसीआर को बधाई!
पूरी दुनिया में फैले हुए ऐसे विश्वविद्यालय हैं जहाँ भारतीय भाषाओं की और हिंदी की पढ़ाई होती है। आमतौर पर एक या दो हिंदी के अध्यापक हैं जो प्रारंभिक हिंदी पढ़ाते हैं और शायद साथ में दूसरे साल या तीसरे साल के छात्रों को भी। खासकर अमरीका में विरासती छात्र भी हैं या सरकार के खर्चे पर विरासती छात्रों की अलग-सी क्लासेस उपलब्ध हैं। अमरीका में हिंदी को 14 "ड़द्धत्द्यत्ड़ठ्ठथ्थ्न्र् दड्ढड्ढड्डड्ढड्ड थ्ठ्ठदढ़द्वठ्ठढ़ड्ढद्म" की सूचना में स्वीकृति मिली है, इसलिए सरकारी फ़ंडिंग अभी भी मिल रहा है हालाँकि ऑस्टिन यूनिवर्सिटी का "हिंदी-उर्दू फ्लैगशिप प्रोग्राम" का फ़ंडिंग अब ख़तम है। बस छात्रों की संख्या कम है, इसलिए सरकार ने इसे बंद किया।
यूरोप में "फ्लैगशिप प्रोग्राम" की तरह अभी भी कुछ नहीं है। वैसे कुछ जगहों पर हिंदी के लिए अलग से फ़ंड्स राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध किये जाते हैं। जैसे कि स्वीडेन में उप्साला विश्वविद्यालय को हिंदी के लिए एक "राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी" दिलाई गई थी। पर बहुत ज़्यादा फ़ंडिंग इस तरह से नहीं है। वास्तव में भारत के किसी सरकारी संस्थान की तरफ़ से इस तरह से कोई पोर्टल होना चाहिए था जहाँ पढ़ाने के लिए नए-नए टूल्स उपलब्ध किये जाएंगे। जिस तरह से विदेशों में चीनी ज़ुबान फैलाने के लिए चीनी सरकारी संस्थान पिछले 30 साल से सक्रिय होते रहे।
11वें विश्व हिंदी सम्मलेन पर मॉरीशस में पिछले साल में "निकष" के नाम से इस तरह के कार्यक्रम का उद्घाटन किया गया था, पर जहाँ तक मुझे मालूम है अभी तक सक्रिय नहीं हुआ। अगर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की औपचारिक भाषा बननी है और विश्वभाषा भी बननी है तो इसके आलावा भारत में कम से कम एक विश्वविद्यालय में "विदेशी भाषा के रूप में हिंदी" के नाम से पूरा पाठ्यक्रम भी चाहिए - बीए, एमए और पीएचडी इसमें चाहिए।
लिस्बन में हम लोग इस बार तीसरी बार मिलने आए। पहले 2012 में केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्राचार्य श्रीश चंद्र जैस्वाल ने वय्यादोलिद (स्पेन) में संगोष्ठी रखी, "यूरोप में हिंदी शिक्षण" के नाम से। उस वक़्त लगभग सारे व्याख्यान हिंदी में ही थे। और उसी साल में स्टार पब्लिकेशन्स ने दिल्ली में इन सारे व्याख्यानों का प्रकाशन किया। इसके बाद 2016 में पेरिस में संगोष्ठी रखी गयी, "हिंदी अध्ययन-अध्यापन की अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी", जिन पर कोई प्रकाशन नहीं निकला।
अनुसन्धान और अकेलापन : इस बार आईसीसीआर और विदेश मंत्रालय तीसरी बार इस तरह की संगोष्ठी की फ़ंडिंग के लिए तैयार हुआ। कई व्याख्यान हिंदी में नहीं, अंग्रेजी में थे। और हर कोई अपने सवाल या टिप्पणियां या तो हिंदी या तो अंग्रेजी में दे सकता था। ऐसा नहीं था कि हिंदुस्तान से आए हुए प्रतिभागी हिंदी बोलते थे और उपस्थित विदेशी अंग्रेजी में। दोनों दलों में अंग्रेज़ी के भक्त थे और हिंदी के भक्त। ज़्यादातर लोग दोनों ज़ुबानों में किसी तरह से वाक़िफ़ हैं। जिस तरह से भारत में भी बड़े-बड़े हिंदी के लेखक और समालोचक अंग्रेजी भी जानते हैं और अंग्रेजी रोज़-रोज़ पढ़ते हैं, उसी तरह से विदेश में भी अलग-अलग ज़ुबानों की दुनियाओं में रहने की आदत है और हम इसे स्वाभाविक भी मानते हैं।
यह सवाल पूछा जा सकता है कि इस तरह की संगोष्ठियां क्यों? क्या फ़ायदा? इसके साथ मैं यह जानकारी भी जोड़ना चाहता हूँ कि आने-जाने का खर्चा प्रतिभागियों को खुद उठाना पड़ता है। और हम लोग इसके लिए तैयार भी हैं। हम क्यों अपने खर्चे से आने के लिए तैयार हैं - क्या हम लोग इस तरह से हिंदी के भक्त हैं कि हम अपने को हिंदी के सेवक समझकर अपने पैसे देने से खुश होते हैं?
नहीं, ऐसा नहीं है। हम ज़्यादातर अपने-अपने संस्थानों में बैठकर पढ़ाते हैं और अपना अनुसन्धन करते हैं। अकेलापन है, मुसीबतों को अकेला भुगतना पड़ता है और बाहर से प्रोत्साहन कम मिलता है। संगोष्ठियों में बैठकर हम साल में जब कभी-कभी मिलने का मौक़ा मिलता है, तब खुश हो जाते हैं। और प्रोत्साहन भी मिलता है। सक्रिय लोग ज़्यादातर यह नहीं चाहते कि हम जैसे कि चिड़ियाघर में अजीब जानवरों की तरह लोगों के सामने नाचें। हम समस्याओं पर बात करना चाहते हैं। हिंदी का प्रचार इसके साथ हो या न हो, वह अलग सा एक सवाल है।
हिंदी की रामकथा : इस तरह की संगोष्ठियों में बहुत अक्सर हिंदी के गुणगान के साथ हिंदी की रामकथा भी गायी जाती है। जैसे हिंदी विश्वभाषा है, हम सब प्रचारक हैं, नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा में दिलचस्पी नहीं लेती, अंग्रेजी ज़्यादा आधुनिक है, हिंदी भूमंडलीकरण के साथ और भी पीछे फँस जाती है। इन बातों का बार-बार एक ही क़िस्म का विलाप होता है और तर्क बार-बार दुहराने से कोई फ़ायदा नहीं। फ़ायदा तब होता है कि अनुसन्धान और अनुभवों पर बात करने का मौक़ा मिलता है और दूसरों की बातें सुनने का मौक़ा भी। वह भी बहुत ज़रूरी है कि हम दूसरे की बातें सुनकर सीख लेते हैं और प्रोत्साहित होते हैं।
मैं अपना शक लेकर लिस्बन गया था। पर आखिर में खुश हुआ। संगोष्ठी की योजना करते वक़्त यानी एक साल से बहुत मेहनत की गयी थी कि सारा प्रोग्राम सकारात्मक हो, कि हर एक सोच विचार करके ही बात करें, कि हर एक व्याख्यान में गुणवत्ता हो। पर सम्मिलित होने से पहले क्या मालूम कि कोशिशें सफल रहेंगी कि नहीं। आखिर में प्रतिभागी ज़्यादातर खुश रहे और मैं भी। सही रास्ते पर चलते हैं।
शिव कुमार सिंह ने व्याख्यानों को प्रकाशित करने का वादा किया। उम्मीद है कि किताब जल्दी में प्रकाशित हो जाएगी ताकि जो लोग इस बार शामिल नहीं थे वे कम से कम पढ़ सकते हैं कि किसने क्या कहा। और दो तीन साल के अंदर दुबारा मिल सकते हैं। अगली बार हैम्बर्ग (जर्मनी) में मिलने का इरादा है।

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